प्रस्तावित परिसीमन योजना का विरोध दक्षिण भारत में बढ़ता जा रहा है। तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों ने खुलकर इसका विरोध किया है। इंडिया गठबंधन के दल भी विरोध में हैं। इसके तहत लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है।
बाएं से रेवंत रेड्डी (तेलंगाना), एमके स्टालिन (तमिलनाडु), सिद्धारमैया (कर्नाटक)
केंद्र सरकार ने लोकसभा सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने और 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण करने की योजना पेश कर दी है। गुरुवार 16 अप्रैल से शुरू हो रहे विशेष संसद सत्र में यह विधेयक आने वाला है। विधेयक के सामने आते ही दक्षिणी भारत के मुख्यमंत्रियों ने तीखा विरोध दर्ज कराया। इसके अलावा अन्य विपक्षी दलों ने भी जबरदस्त विरोध किया है। इंडिया गठबंधन ने बुधवार को इस मुद्दे पर बैठक भी बुलाई है, जिसमें संसद के विशेष सत्र में इस विधेयक के विरोध में रणनीति बनाई जाएगी। इस बीच सरकार के एक अधिकारी ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री मंत्री अमित शाह संसद सत्र के दौरान विधेयक की पूरी जानकारी देंगे।
तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों ने इस विधेयक का खुलकर विरोध किया है। सिद्धारमैया, एम.के. स्टालिन और रेवंत रेड्डी ने कहा कि दक्षिणी राज्यों को नए परिसीमन प्रस्ताव में नुकसान उठाना पड़ेगा। डीएमके नेता स्टालिन ने 1950 और 1960 के दशक के उग्र एंटी-हिंदी आंदोलनों जैसी व्यापक जन-आंदोलन की चेतावनी दी है।
लोकसभा की सीटों को अधिकतम 850 तक बढ़ाने के प्रस्ताव के साथ ही 1976 से लागू वह “फ्रीज” भी समाप्त हो जाएगा, जिसके तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को आवंटित सीटों की संख्या स्थिर रखी गई थी। वर्तमान सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना पर आधारित है। विस्तारित लोकसभा में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। महिला आरक्षण विधेयक भी विशेष सत्र में पेश होगा लेकिन पास होने पर उसे लागू 2029 में किया जाएगा।
सरकार द्वारा प्रस्तावित तीन विधेयकों डिलिमिटेशन बिल, 2026; संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026; और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 में ये अहम बदलाव शामिल हैं। इन विधेयकों को इस सप्ताह होने वाले संसद के विशेष सत्र से पहले लोकसभा सदस्यों के बीच वितरित किया जा चुका है। उसी के बाद प्रतिक्रियाओं ने ज़ोर पकड़ा है।
रेवंत रेड्डी ने दक्षिण भारत के नेताओं को एकजुट होने को कहा
मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी ने परिसीमन विधेयक का विरोध करते हुए दक्षिणी राज्यों से एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने चेतावनी दी कि प्रस्तावित परिसीमन से उनकी सामूहिक आवाज कमजोर हो सकती है। संसद में क्षेत्रीय असंतुलन गहरा सकता है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के मुख्यमंत्रियों एमके स्टालिन, एन चंद्रबाबू नायडू, सिद्धारमैया, पिनारयी विजयन और एन रंगस्वामी को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि "आधी अधूरी प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं होगी।" रेड्डी ने कहा- राष्ट्रीय स्तर पर दक्षिणी राज्यों की चिंताओं का प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए समन्वित भागीदारी करनी होगी।
रेवंत ने चेतावनी दी कि मौजूदा नज़रिए से राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानताओं को संस्थागत रूप देने का खतरा है। उन्होंने लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एक "हाइब्रिड मॉडल" का प्रस्ताव रखा। उन्होंने इसे "महज़ एक सुझाव, एक संभावित नज़रिया" बताया और कहा कि परामर्श और संसदीय बहस से एक "न्यायसंगत और स्वीकार्य" निष्कर्ष तक पहुंचने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह मॉडल तय करेगा कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बनाए रखते हुए और सभी क्षेत्रों को उचित आवाज देते हुए किसी भी राज्य को प्रगति के लिए दंडित न किया जाए।
अलग-अलग पत्रों में उन्होंने विस्तार से बताया कि प्रस्तावित मॉडल किस प्रकार दक्षिणी राज्यों और उत्तर प्रदेश के बीच प्रतिनिधित्व के अंतर को और बढ़ा सकता है। चंद्रबाबू नायडू को लिखे पत्र में उन्होंने कहा: “आंध्र प्रदेश में वर्तमान में 25 लोकसभा सीटें हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं, यानी 55 सीटों का अंतर है। उनके प्रस्तावित मॉडल के तहत, आंध्र प्रदेश की सीटें 25 से बढ़कर लगभग 38 हो जाएंगी, जबकि उत्तर प्रदेश की सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी। इससे राजनीतिक अंतर 55 सीटों से बढ़कर 82 सीटों तक पहुंच जाएगा, जिससे प्रतिनिधित्व में संरचनात्मक असंतुलन और बढ़ जाएगा।”
सिर्फ उत्तर भारत को फायदाः सिद्धारमैया
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता देने वाले राज्यों जैसे कर्नाटक के साथ अन्याय होगा। उन्होंने कहा, “लोकसभा क्षेत्रों की बढ़ोतरी से उत्तरी भारत के राज्य लाभान्वित होंगे। जनसंख्या नियंत्रण में सफल कर्नाटक जैसे राज्यों के साथ यह अन्याय होगा। सीमा पुनर्विभाजन से संसद में दक्षिणी राज्यों की आवाज कमजोर नहीं होनी चाहिए।”
स्टालिन ने आंदोलन की चेतावनी दी
स्टालिन ने X पर पहले ही एक वीडियो संदेश जारी कर दिया है। जिसका शीर्षक था- “माननीय प्रधानमंत्री, यह तमिलनाडु की अंतिम चेतावनी है।” उन्होंने कहा कि यह वीडियो तमिलनाडु के सामने खड़े गंभीर खतरे को उजागर करने और केंद्र सरकार को स्पष्ट चेतावनी देने के लिए है। अपने तमिल संदेश में स्टालिन ने केंद्र पर आरोप लगाया कि वह चुनावों के बीच जबरन संसद का विशेष सत्र बुलाकर डिलिमिटेशन पर संवैधानिक संशोधन को “थोपने” की कोशिश कर रही है। उन्होंने 1950-60 के दशक के आंदोलन जैसी चेतावनी देते हुए कहा: “भारत एक बार फिर 1950 और 1960 के दशक की डीएमके की भावना देखेगा। इसे धमकी न समझें, यह चेतावनी है… अगर तमिलनाडु प्रभावित हुआ तो हम पूरे देश का ध्यान आकर्षित करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी, मैं दोहराता हूं- यह अंतिम चेतावनी है। तमिलनाडु लड़ेगा और जीतेगा।”
सीपीएम का भी ज़ोरदार हमला
सीपीएम के राज्यसभा सदस्य जॉन ब्रिटास ने इन विधेयकों को “चालाक रणनीति” बताते हुए आरोप लगाया कि इसके जरिए दक्षिण भारत को उत्तर का राजनीतिक उपनिवेश बनाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा, “जब दक्षिणी राज्यों के घटते प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता जताई गई, तो प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं ने कहा था कि सभी राज्यों के लिए ‘अनुपातिक वृद्धि’ होगी। लेकिन मसौदा विधेयकों में ऐसी कोई गारंटी नहीं है। यदि 1971 की बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर डिलिमिटेशन किया गया, तो उत्तरी राज्यों की सीटें तेजी से बढ़ेंगी, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटेगा या स्थिर रहेगा।”
यह परिसीमन विधेयक असंवैधानिक हैः वेणुगोपाल
कांग्रेस महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल ने कहा, “महिला आरक्षण की आड़ में भाजपा एक गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण, असंवैधानिक और संघीय ढांचे के खिलाफ डिलिमिटेशन प्रक्रिया को जबरन लागू करना चाहती है। 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उन राज्यों को सजा देगा जिन्होंने परिवार नियोजन और विकास आधारित जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। जब नई जनगणना शुरू होने वाली है, तो 15 साल पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है?”विपक्ष की मुख्य चिन्ता
विपक्षी नेताओं का तर्क है कि 1971 की जनगणना के आधार पर अंतिम बार सीमा निर्धारण हुआ था। अब 2011 की जनगणना पर महिला आरक्षण लागू करने और प्रस्तावित 2026 जनगणना को नजरअंदाज करने से दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) को सजा मिल रही है, जबकि उत्तरी राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश आदि) को फायदा हो रहा है। इससे प्रतिनिधित्व की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में असंतुलन पैदा होगा और दक्षिणी राज्यों का संसद तथा वित्तीय फैसलों में प्रभाव कम हो जाएगा। पंजाब सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस मुद्दे पर चर्चा की और प्रतिनिधित्व संकट का सामना करने के लिए रणनीति बनाने पर जोर दिया। विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से व्यापक परामर्श की मांग की है और चेतावनी दी है कि दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया तो बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन होंगे।