इस्तीफा देने के बाद पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का बयान सामने आया है। वो कह रहे हैं कि नैरेटिव खतरनाक चीज़ है। अगर कोई इसके चक्रव्यूह में फंसा तो निकलना मुश्किल है। लेकिन मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूं। धनखड़ के इन इशारों को समझना मुश्किल नहीं।
पूर्व उपराष्ट्रपति की यह मुद्रा लंबे समय तक चर्चा में रही है। फाइल फोटो
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जुलाई में अचानक इस्तीफे के बाद पहली सार्वजनिक टिप्पणी में कहा कि लोग “नैरेटिव” के जाल में न फँसें, क्योंकि इस “चक्रव्यूह” से निकलना बहुत मुश्किल होता है।
भोपाल में आरएसएस के एक नेता की किताब के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए धनखड़ ने राज्यसभा के अपने दिनों की तरह अपनी अनोखी शैली में भाषण शुरू किया और सबसे पहले अपनी लंबी सार्वजनिक अनुपस्थिति का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “चार महीने बाद, इस अवसर पर, इस किताब पर, इस शहर में मुझे बोलने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।”
धनखड़ ने भाषण के बीच में कहा- "भगवान न करे कोई नैरेटिव के चक्कर में फंस जाए। इस चक्रव्यूह में कोई फंस गया तो निकलना बड़ा मुश्किल है, मैं अपना उदाहरण नहीं दे रहा हूं।" उनके इतना कहते ही वहां तालियां बज उठीं। हालांकि बहुत स्पष्ट है कि धनखड़ ने अपने इस बयान से किस पर निशाना साधा। धनखड़ का ये बयान अब धीरे-धीरे वायरल हो रहा है।
RSS के मनमोहन वैद्य की किताब के विमोचन के मौक़े पर धनखड़ ने कहा- “ऐसा समय है जिसमें कुछ लोग नैतिकता और आध्यात्मिकता से दूर होते जा रहे हैं। लेकिन मैं फ़्लाइट पकड़ने की चिंता से अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकता… और मेरा हाल का इतिहास इसका उदाहरण है।”
74 वर्षीय धनखड़ ने 21 जुलाई को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया था। यह इस्तीफा संसद के मानसून सत्र शुरू होने के ठीक एक दिन बाद आया था। हालाँकि राजनीतिक हलकों में किसी ने भी स्वास्थ्य के इस बहाने पर यकीन नहीं किया। आम राय यही थी कि स्पष्टवादी धनखड़ और सत्तारूढ़ भाजपा के बीच गहरे मतभेद के चलते उनका कार्यकाल अगस्त 2027 में खत्म होने से दो साल पहले ही समाप्त हो गया।
धनखड़ ने किस पर साधा निशाना
पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का “चक्रव्यूह” वाला बयान स्पष्ट रूप से मोदी सरकार और भाजपा के उस वर्ग पर निशाना था जिसने उन्हें पहले ऊँचा पद दिया और फिर अचानक हाशिए पर धकेल दिया। भोपाल के अपने भाषण में धनखड़ ने सीधे किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन “नैरेटिव का चक्रव्यूह” कहकर उन्होंने इशारा किया कि एक सुनियोजित मीडिया और राजनीतिक अभियान के जरिए उनकी छवि को जिस तरह खराब किया गया और उन पर इस्तीफे का दबाव डाला गया, वह कोई संयोग नहीं था। सूत्रों की मानें तो जुलाई 2025 में मानसून सत्र शुरू होने के ठीक बाद उनका इस्तीफा स्वास्थ्य कारणों का बहाना मात्र था; असल वजह थी प्रधानमंत्री कार्यालय और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से बढ़ती दूरी।
धनखड़ की संघ से नज़दीकी को लेकर बीजेपी असहज थी
धनखड़ लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे और संघ की पृष्ठभूमि के कारण ही 2022 में उन्हें उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति का पद मिला था। शुरूआती दो साल तक सब कुछ ठीक चला। धनखड़ ने विपक्ष के लगभग हर हंगामे को कुचलते हुए सरकार के पक्ष में सख्ती से कुर्सी चलाई। लेकिन 2024 के बाद स्थिति बदली। कहा जाता है कि धनखड़ कुछ मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राय रखने लगे थे और कई बार उन्होंने सरकार के मंत्रियों को भी सार्वजनिक रूप से टोक दिया था। संघ के भी कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों से उनकी निकटता को लेकर दिल्ली में असहजता बढ़ने लगी थी। यही वह दरार थी जो अंततः खाई बन गई।
जुलाई 2025 में इस्तीफे से ठीक पहले के हफ्तों में दिल्ली के गलियारों में खबरें थीं कि धनखड़ को “या तो खुद चले जाओ या फिर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाएगा” का अल्टीमेटम दिया गया था। स्वास्थ्य कारण बताकर इस्तीफा देने के बावजूद उन्होंने न तो कोई विदाई भाषण दिया और न ही संसद में अंतिम सत्र में हिस्सा लिया। चार महीने की चुप्पी के बाद भोपाल में जब वे बोले तो उनके लहजे में पुराना सभापति वाला आक्रामक तेवर लौट आया था। “चार महीने बाद मुझे बोलने में संकोच नहीं होना चाहिए”- यह वाक्य अपने आप में बहुत कुछ कह गया।
अब सवाल यह है कि धनखड़ आगे क्या करेंगे। संघ से उनका पुराना रिश्ता फिर से सक्रिय हो सकता है और 2027 में हरियाणा या राजस्थान में भाजपा के लिए वे बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं। लेकिन अभी उनका तीखा बयान बता रहा है कि जिस पार्टी ने उन्हें शिखर पर पहुँचाया, उसी ने उन्हें नीचे भी उतारा। “चक्रव्यूह” का जिक्र करके धनखड़ ने संकेत दे दिया है कि वे इस खेल को अच्छी तरह समझते हैं और चुप नहीं बैठने वाले। आने वाले दिनों में हो सकता है कि पूर्व उपराष्ट्रपति खुद को पीड़ित की बजाय विद्रोही की भूमिका में पेश करें।