देश में आगामी महीनों में होने वाले परिसीमन (delimitation) को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण सुझाव सामने आया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के एक वर्किंग पेपर में सुझाव दिया गया है कि भारत को देश की सभी लोकसभा सीटों पर एक समान नियम लागू करने के बजाय एक "लक्षित मानदंड" (targeted criterion) अपनाना चाहिए। इसके तहत देश के 170 बड़े लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों को विभाजित करने का प्रस्ताव दिया गया है, जिससे निचले सदन (लोकसभा) की कुल सदस्य संख्या 543 से बढ़कर 824 हो जाएगी। लेकिन लोकसभा की 824 सीटों से किसका भला होने जा रहा है। यह विश्लेषण इस रिपोर्ट के अंत में पढ़ने को मिलेगा। पहले जानिए कि सरकार को सुझाव क्या दिया गया है।

170 बड़ी सीटों को दो और तीन हिस्सों में बांटने का फॉर्मूला

आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य शमिका रवि और भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) के मुदित कपूर ने इस पेपर को तैयार किया है। इस वर्किंग पेपर में सीटों को बांटने का एक स्पष्ट फॉर्मूला सुझाया गया है:
  • 59 निर्वाचन क्षेत्रों को दो भागों (Two-way split) में विभाजित किया जाए।
  • 111 निर्वाचन क्षेत्रों को तीन भागों (Three-way split) में विभाजित किया जाए।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस टारगेटेड परिसीमन के कारण अगले आम चुनाव में मतदाताओं के मतदान (voter turnout) में 0.3 से 2.3 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में लगभग 90 लाख से लेकर 2.3 करोड़ तक अतिरिक्त मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए प्रेरित होंगे।

सीटों का गणित: दक्षिण और उत्तर में संतुलन

इस मॉडल के अनुसार, सीटों के विभाजन का असर देश के विभिन्न राज्यों पर इस प्रकार पड़ेगा:
  • दो-तरफा विभाजन (Two-way splits): प्रस्तावित 59 सीटों में से 22 सीटें अकेले केरल और तमिलनाडु राज्यों से होंगी।
  • तीन-तरफा विभाजन (Three-way splits): इसमें सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश (17 सीटें) का होगा। इसके बाद महाराष्ट्र (12 सीटें), बिहार (10 सीटें) और पश्चिम बंगाल (10 सीटें) का नंबर आता है।

संशोधन के बाद राज्यों में सीटों की नई स्थिति:

  • दक्षिण भारत: तेलंगाना में सीटें 17 से बढ़कर 26, आंध्र प्रदेश में 25 से 38, कर्नाटक में 28 से 42, तमिलनाडु में 39 से 59 और केरल में 20 से बढ़कर 30 हो जाएंगी।
  • उत्तर और पश्चिम भारत: महाराष्ट्र में सीटें 48 से बढ़कर 72, राजस्थान में 25 से 38, उत्तर प्रदेश में 80 से 120, मध्य प्रदेश में 29 से 44, गुजरात में 26 से 39 और बिहार में 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी।
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क्या क्षेत्रीय हिस्सेदारी बरकरार रहेगी

पीएम कमेटी रिपोर्ट की सबसे खास बात यह है कि इस नए फॉर्मूले को लागू करने के बाद भी संसद में दक्षिणी राज्यों और अधिक आबादी वाले उत्तरी व पश्चिमी राज्यों की कुल सीटों की हिस्सेदारी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। दक्षिण भारत की हिस्सेदारी वर्तमान के 23.6% के मुकाबले 23.7% रहेगी, जबकि उत्तर और पश्चिमी राज्यों की हिस्सेदारी 45.2% से मामूली बदलकर 45.6% होगी। इससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर उठने वाले विवादों को शांत करने में मदद मिलेगी।

बड़े निर्वाचन क्षेत्रों की चुनौतियाँ और प्रतिनिधित्व की कमी

वर्किंग पेपर में इस बात पर चिंता जताई गई है कि देश में लोकसभा क्षेत्रों का आकार लगातार बढ़ रहा है, जो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिए एक बड़ी चुनौती है।

  • साल 2024 के आंकड़ों के अनुसार, एक औसत (median) लोकसभा क्षेत्र में 18.2 लाख पंजीकृत मतदाता थे।
  • देश के कुछ सबसे बड़े निर्वाचन क्षेत्रों में तो मतदाताओं की संख्या 32 लाख से भी अधिक हो चुकी है।

इतने बड़े निर्वाचन क्षेत्रों के कारण मतदाताओं का बोझ बहुत अधिक बढ़ जाता है, जिससे अलग-अलग समूहों की भागीदारी असमान हो जाती है और प्रतिनिधित्व का अंतर (representation gaps) गहरा जाता है।

क्या इससे उत्तर भारत का पलड़ा लोकसभा में भारी हो जाएगा?

दावा है कि इस फॉर्मूले को इसी विवाद को सुलझाने के लिए डिज़ाइन किया गया है, लेकिन इसके व्यावहारिक नतीजे उत्तर भारत के पक्ष में झुक सकते हैं।
कागज़ पर संतुलन: वर्किंग पेपर के अनुसार, यदि देश की 170 बड़ी सीटों को ही बांटा जाता है, तो दक्षिण भारत की लोकसभा में कुल हिस्सेदारी वर्तमान के 23.6% से मामूली बढ़कर 23.7% हो जाएगी। वहीं उत्तर और पश्चिमी राज्यों की हिस्सेदारी 45.2% से सिर्फ 45.6% होगी। यानी अनुपात में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखेगा।
सीटों की संख्या का वास्तविक अंतर : भले ही प्रतिशत में अंतर न दिखे, लेकिन संसद के भीतर 'वोटों की शुद्ध संख्या' (Absolute Numbers) में उत्तर भारत का दबदबा बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा।
उत्तर प्रदेश की मौजूदा 80 सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी। उसे 40 सीटों को फायदा होगा। बिहार की मौजूदा 40 सीटें बढ़कर 60 हो जाएंगी। उसे 20 सीटों का फायदा होगा। तमिलनाडु की मौजूदा 39 सीटें बढ़कर  59 हो जाएंगी। उसे 20 सीटों का फायदा है। केरल की मौजूदा 20 सीटें बढ़कर 30 हो जाएंगी। उसे 10 सीटों का फायदा होगा।
इसका प्रभाव क्या पड़ेगाः नकारात्मक प्रभाव: अकेले उत्तर प्रदेश और बिहार को मिलाकर 60 नई सीटें मिल रही हैं, जबकि पूरे तमिलनाडु और केरल को मिलाकर सिर्फ 30 नई सीटें मिलेंगी। संसद में कोई भी बिल पास कराने या सरकार बनाने के लिए सीटों की 'संख्या' मायने रखती है, प्रतिशत नहीं। ऐसे में उत्तर भारत के राज्यों का राजनीतिक वजन स्वाभाविक रूप से काफी बढ़ जाएगा।

120 सीटों के परिसीमन से देश पर क्या बोझ बढ़ेगा

इससे देश के खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 824 करने का मतलब है 281 नए सांसदों का जुड़ना। इसके कारण होने वाले खर्चों को दो हिस्सों में देखा जा सकता है:
  • सांसदों का प्रत्यक्ष खर्च: प्रत्येक नए सांसद को वेतन, भत्ते, मुफ्त यात्रा, चिकित्सा सुविधाएं, दिल्ली में सरकारी आवास और पेंशन देनी होगी।
  • MPLAD फंड का बोझ: वर्तमान में हर सांसद को अपने क्षेत्र के विकास के लिए हर साल ₹5 करोड़ का 'सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना' (MPLAD) फंड मिलता है। 281 नए सांसदों का मतलब है कि सरकार को केवल इस फंड के लिए हर साल ₹1,405 करोड़ अतिरिक्त खर्च करने होंगे।
  • प्रशासनिक खर्च: नई सीटों के लिए नए चुनाव कार्यालय, अतिरिक्त सुरक्षा बल, चुनाव कराने का खर्च और परिसीमन आयोग का अपना प्रशासनिक खर्च भी अरबों रुपये में होगा।

सिर्फ 170 सीटों का परिसीमन क्या लोकतांत्रिक सिद्धांत का उल्लंघन है

अगर सिर्फ 170 बड़ी सीटों को ही बांटा जाता है और बाकी को छोड़ दिया जाता है, तो देश में एक नया असंतुलन पैदा हो जाएगा। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के एक नए छोटे निर्वाचन क्षेत्र में शायद 10-12 लाख मतदाता होंगे, जबकि किसी अन्य राज्य में (जहां सीट नहीं बांटी गई) एक सांसद के नीचे अभी भी 18-20 लाख मतदाता हो सकते हैं। यह असमानता पैदा करेगा।
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प्रशासनिक और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ

अचानक लोकसभा की सदस्य संख्या 824 करने से संसद के सुचारू संचालन में दिक्कतें आ सकती हैं। हालांकि नए संसद भवन (सेंट्रल विस्टा) में लोकसभा में 888 सीटें बनाई गई हैं, लेकिन इतने बड़े सदन में: हर सांसद को अपनी बात रखने या बहस में भाग लेने का समय मिलना लगभग असंभव हो जाएगा। संसदीय समितियों (Committees) का प्रबंधन जटिल हो जाएगा।

राज्यों की विधानसभाओं पर दबाव

लोकसभा सीटों के बढ़ने से राज्यों की विधानसभा सीटों (MLAs) का गणित भी पूरी तरह बदल जाएगा। आमतौर पर एक लोकसभा सीट के अंदर 6 से 8 विधानसभा सीटें आती हैं। लोकसभा सीटों में इस तरह के 'टारगेट बदलाव' से राज्यों के भीतर जिलों और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं बेहद पेचीदा हो जाएंगी, जिससे प्रशासनिक विसंगतियां पैदा होंगी।