देश भर में SIR में गड़बड़ियों पर बवाल के बीच अब चुनाव आयोग ने दिल्ली के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों यानी ERO के लिए ECINET पोर्टल में कुछ नए विकल्प जोड़े हैं। इन विकल्पों के बाद अब ईआरओ किसी नोटिस पाने वाले मतदाता को बिना दस्तावेज जमा कराए और कुछ मामलों में बिना सुनवाई तय किए भी अंतिम मतदाता सूची के लिए योग्य घोषित कर सकते हैं। हालाँकि, इसके लिए ईआरओ को एक अनिवार्य आदेश अपलोड करना होगा, जिसमें उन्हें यह घोषित करना होगा कि मतदाता की पात्रता की जांच पूरी कर ली गई है और वे उसे मतदाता सूची में शामिल करने से संतुष्ट हैं। दिल्ली में क़रीब 33 लाख वोटरों को नोटिस दिए जाने, पिछले एक महीने में इनमें से सिर्फ़ 5 लाख नोटिसों का ही निपटारा होने और 30 नवंबर को इनके निपटारे की आख़िरी तारीख़ होने के बीच यह बदलाव किया गया है।

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ की 2 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक़ ये नए विकल्प 30 सितंबर से पहले पोर्टल पर उपलब्ध नहीं थे। यह बदलाव तब हुआ है जब ECINET पोर्टल के ज़रिए चुनाव अधिकारियों के कामकाज को केंद्रीय स्तर पर नियंत्रित किए जाने और ERO के अधिकार सीमित होने को लेकर विवाद चल रहा है। इसको लेकर चुनाव आयोग पर बेहद गंभीर आरोप लग रहे हैं।
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क्या बदला है ECINET पोर्टल पर?

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, ECINET पोर्टल पर अब ईआरओ के सामने मतदाता की पात्रता तय करने के लिए नए विकल्प उपलब्ध हैं। इनमें दो अहम विकल्प हैं। एक, बिना सुनवाई के पात्र घोषित करना है। ईआरओ किसी मतदाता को सुनवाई की तारीख तय किए बिना ही अंतिम मतदाता सूची के लिए योग्य घोषित कर सकता है। दूसरा, यदि मतदाता निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पा रहा है, लेकिन ERO उसकी पात्रता से संतुष्ट है तो उसे दस्तावेजों के बिना भी योग्य घोषित किया जा सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार दोनों ही स्थितियों में ईआरओ को एक ‘हियरिंग ऑर्डर’ यानी सुनवाई संबंधी आदेश अपलोड करना होगा। इसमें अधिकारी को यह घोषणा करनी होगी कि उसने मतदाता की पात्रता की जांच कर ली है और वह उसे अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए संतुष्ट है।

ECINET पर नये विकल्प वाले इस बदलाव से ईआरओ को उन मामलों में निर्णय लेने की अधिक गुंजाइश मिली है, जिनमें मतदाता तय दस्तावेज जुटाने में कठिनाई का सामना कर रहे हैं।

पहले क्या थी प्रक्रिया?

पहले किसी नोटिस के बाद मतदाता को दस्तावेज जमा करने और सुनवाई की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ और ईआरओ की भूमिका होती थी। ‘नो-मैपिंग’ यानी जिन मामलों में मतदाता का पुरानी मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पाया था, उनमें जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीईओ की जांच भी शामिल थी।

पहले की प्रक्रिया के मुताबिक बीएलओ मतदाता के दस्तावेज, उसका घोषणा-पत्र और सुनवाई में उपस्थिति से जुड़ी तस्वीर पोर्टल पर अपलोड करता था। ईआरओ मामले की जांच करता था। ‘नो-मैपिंग’ वाले मामलों को आगे सत्यापन के लिए डीईओ के पास भेजा जाता था। डीईओ की प्रतिक्रिया के आधार पर ERO मतदाता को अंतिम सूची में शामिल करने का निर्णय लेता था। लेकिन नए विकल्प इस प्रक्रिया को बदलते हैं। अब ईआरओ कुछ मामलों में दस्तावेजों के बिना और सुनवाई तय किए बिना भी मतदाता को अंतिम सूची में शामिल करने की प्रक्रिया पूरी कर सकता है।
द हिंदू की रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाले से यह भी बताया गया है कि जिन मतदाताओं को कोई नोटिस नहीं मिला है, उनके नाम भी अंतिम सूची में अपने आप शामिल नहीं होते। ईआरओ को ऐसे मामलों में भी अलग-अलग निर्णय लेना पड़ता है।

पहले भी उठा था विवाद

ECINET पोर्टल पर ERO के अधिकारों को कथित रूप से सीमित किए जाने को लेकर पहले विवाद हुआ था। इसके बाद 26 सितंबर को चुनाव आयोग ने एक बयान जारी कर कहा था कि पोर्टल में कुछ तकनीकी सुधार किए गए हैं, ताकि अधिकारियों को कामकाज में अधिक लचीलापन मिल सके। आयोग ने यह भी कहा था कि यदि ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों को आगे किसी अतिरिक्त सुविधा की ज़रूरत होगी, तो उसे भी लागू किया जाएगा।

आयोग के पहले के स्पष्टीकरण के मुताबिक़ जिन मतदाताओं को विभिन्न विसंगतियों यान डिस्क्रिपेंसीज के कारण नोटिस जारी किए गए हैं, उन्हें सामान्य तौर पर सुनवाई के लिए बुलाने की ज़रूरत नहीं होगी। बीएलओ उनके घर जाकर दस्तावेज जमा करेंगे। हालाँकि, विशेष मामलों में ईआरओ सुनवाई का फैसला कर सकते हैं। लेकिन ईआरओ का कहना है कि सुनवाई से छूट देने का विकल्प शुरुआत से ही उपलब्ध होना चाहिए था, ताकि अधिकारी हर मामले की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय ले सकें।
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‘द हिंदू’ ने दिल्ली के एक ERO के हवाले से बताया कि पहले अधिकारियों के पास ऐसे मामलों को निपटाने के लिए पर्याप्त विकल्प नहीं थे, जिनमें मतदाता निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पा रहे थे। एक ERO ने अख़बार से कहा कि सुनवाई को मामले के हिसाब से छोड़ने का विकल्प शुरुआत से होना चाहिए था। उनके मुताबिक, अधिकारियों को उन मामलों में भी निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए थी, जहां मतदाता के पास निर्धारित दस्तावेजों में से कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।

एक अन्य ERO ने बताया कि उन्होंने बुधवार को पहली बार पोर्टल पर ये नए विकल्प देखे। उन्होंने कहा कि अब यदि वे ऐसे मामलों में मतदाता की पात्रता को लेकर संतुष्ट हैं तो जांच पूरी होने की घोषणा अपलोड कर सकते हैं और मामले का निपटारा कर सकते हैं। इस अधिकारी के मुताबिक, नए विकल्प मिलने के बाद वे प्रतिदिन सैकड़ों मामलों का निपटारा कर पा रहे हैं, जबकि पहले एक दिन में 50 से अधिक मामले निपटाना भी संभव नहीं हो पा रहा था।

एक महीने में 5 लाख से कम मामलों का निपटारा

दिल्ली में SIR के दौरान जारी नोटिसों के निपटारे की रफ्तार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। 33.1 लाख नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन एक महीने में 5 लाख से भी कम मामलों की कार्यवाही पूरी हो सकी है। यानी बड़ी संख्या में मतदाताओं के मामले अभी लंबित हैं। पश्चिमी दिल्ली की एक विधानसभा सीट पर अब तक केवल दो मामलों का निपटारा होने की जानकारी भी रिपोर्ट में दी गई है। नोटिसों के निपटारे की अंतिम तारीख 30 नवंबर है। ऐसे में ईआरओ के पास लंबित मामलों को तय समय में पूरा करने की चुनौती बनी हुई है।
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350 से अधिक मतदाता ‘अयोग्य’ चिह्नित

रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई में शामिल नहीं होने के कारण 350 से अधिक मतदाताओं को ‘अयोग्य’ चिह्नित किया गया था। इस मामले में दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अशोक कुमार ने ERO को चेतावनी दी थी कि ठीक सत्यापन के बिना किसी मतदाता को अयोग्य घोषित करने का विकल्प न चुना जाए। यह मामला इसलिए बड़ा है क्योंकि मतदाता सूची में नाम शामिल होने या हटने का सीधा संबंध नागरिक के मतदान के अधिकार से है। ऐसे में किसी मतदाता को अयोग्य घोषित करने से पहले उसके मामले की सही जांच और निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

‘द हिंदू’ ने पोर्टल में नए विकल्प जोड़े जाने और प्रक्रिया के इस चरण में बदलाव किए जाने को लेकर दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय और चुनाव आयोग से प्रतिक्रिया मांगी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। इसलिए यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि नए विकल्पों को 30 सितंबर के बाद ही क्यों उपलब्ध कराया गया और क्या इन्हें पहले से लागू करने की कोई योजना थी।

बहरहाल, ECINET पोर्टल में किए गए बदलावों से ERO को मामलों के निपटारे में अधिक लचीलापन मिला है। लेकिन यह बदलाव ऐसे समय आया है जब दिल्ली में लाखों मतदाताओं के नोटिस लंबित हैं और अंतिम तारीख नज़दीक है।