विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली को लेकर उठे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए दावा किया है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण से संबंधित सभी प्रमुख फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों ने सर्वसम्मति से लिए थे। आयोग ने इस आरोप को भी खारिज किया है कि ज्ञानेश कुमार ने दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा निर्णय लिए।
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में यह भी कहा है कि मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया। आयोग के मुताबिक, SIR के दौरान मांगी गई अतिरिक्त घोषणा फॉर्म 6 से अलग दस्तावेज है। हालांकि, उसने स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में इस घोषणा को जिस तरह दिखाया गया, उससे यह भ्रम पैदा हो सकता था कि फॉर्म में बदलाव कर दिया गया है।
दूसरी ओर, आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग पर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होते हैं।
ये दलीलें ऐसे समय आई हैं, जब चुनाव आयोग के कामकाज, SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयुक्तों के बीच कथित मतभेदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं विचाराधीन हैं। इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू की रिपोर्टों के मुताबिक, आयोग ने अपने फैसलों की वैधानिकता और संस्थागत सर्वसम्मति का बचाव किया है।
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SIR के तीनों आदेशों पर आयोग का दावा: तीनों आयुक्तों की सहमति थी

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित तीनों प्रमुख आदेश आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों के आधार पर जारी किए गए थे।
ये आदेश तीन तारीखों पर जारी किए गए थे:
  • - 24 जून 2025: SIR से संबंधित पहला आदेश।
  • - 27 अक्टूबर 2025: दूसरे चरण के पुनरीक्षण से संबंधित आदेश।
  • - 14 मई 2026: आगे के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR कराने से संबंधित आदेश।
आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने इन आदेशों पर सहमति जताई थी। 
यह जवाब उन मीडिया रिपोर्टों के बाद आया है, जिनमें दावा किया गया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR से संबंधित कई फैसलों पर सवाल उठाए थे। इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट में फाइलों पर दर्ज टिप्पणियों और आपत्तियों का उल्लेख किया गया था।

दोनों चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों का विवाद क्या है?

विवाद की मुख्य वजह चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल हैं। याचिका में आरोप लगाया गया कि 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने 14 महत्वपूर्ण मामलों में आपत्तियां दर्ज की थीं। आरोप था कि कुछ फैसले दोनों आयुक्तों की मंजूरी के बिना आयोग के नाम पर लिए गए। याचिका में सत्ता के कथित केंद्रीकरण, एजेंडा और बैठकों के विवरण समय पर उपलब्ध न कराने, मतदाता सूची तैयार करने वाले अधिकारियों की डिजिटल प्रणाली तक पहुंच सीमित होने और मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव जैसे मुद्दे उठाए गए।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों के जवाब में कहा कि किसी फाइल पर आयुक्त की टिप्पणी, सवाल, सुझाव या असहमति अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होती। फैसला सभी संबंधित विचारों पर विचार करने के बाद सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिया जाता है। आयोग ने यह भी कहा कि उसके यहां फाइलें सामान्यतः पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती हैं। आपात परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है और उसे बाद में फाइल पर दर्ज किया जाता है। आयोग ने अपने जवाब में 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि फैसले यथासंभव सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए और सर्वसम्मति न होने पर बहुमत के आधार पर निर्णय किया जा सकता है।

दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को क्या पत्र लिखा था

चुनाव आयोग के हलफनामे में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक घटनाक्रम की भी पुष्टि की गई है। आयोग के मुताबिक, 28 जुलाई 2026 को आयोग में प्रतिनियुक्ति पर तैनात अतिरिक्त सचिव स्तर के एक आईएएस अधिकारी ने आंतरिक कार्य-विभाजन से संबंधित कार्यालय आदेश जारी किया था। यह आदेश वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से संबंधित था। इसके बाद 29 जुलाई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस आदेश तथा अधिकारी के आचरण को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे।
आयोग ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों के 30 जुलाई के संयुक्त निर्देश के बाद 28 जुलाई वाला आदेश कभी लागू नहीं किया गया। इस तरह आयोग ने पत्र लिखे जाने की घटना को स्वीकार किया, लेकिन इसे इस बात का प्रमाण मानने से इनकार किया कि SIR के फैसले एकतरफा तरीके से लिए गए थे।

फॉर्म 6 में बदलाव पर विवाद: आयोग ने क्या सफाई दी?

फॉर्म 6 उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं। SIR के दौरान इस फॉर्म के साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र की मांग को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। इस घोषणा-पत्र के तहत आवेदक को अपने या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम का संबंध पिछली गहन पुनरीक्षण अवधि की मतदाता सूची से बताना था। इसके लिए 2002-2003 की पुरानी मतदाता सूचियों से संबंधित जानकारी मांगी जा रही थी। आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना फॉर्म 6 में बदलाव करने का अधिकार था। यह भी चिंता जताई गई कि पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध न होने पर पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों को अतिरिक्त कठिनाई हो सकती है।

चुनाव आयोग ने जवाब में कहा: फॉर्म 6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया। इस वैधानिक फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। SIR के लिए मांगा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है। पुराने मतदाता रिकॉर्ड से आवेदक का मिलान हो जाने पर अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की जरूरत कम हो सकती है।

  • हालांकि आयोग ने एक महत्वपूर्ण बात स्वीकार की। उसने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फॉर्म 6 और अतिरिक्त घोषणा-पत्र को जिस तरीके से प्रदर्शित किया गया था, उससे यह समझा जा सकता था कि फॉर्म में संशोधन कर दिया गया है।
  • इस समस्या को दूर करने के लिए आयोग ने 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में फॉर्म 6 और SIR घोषणा-पत्र को अलग-अलग हिस्सों में रखने का फैसला किया। यह व्यवस्था भौतिक आवेदन प्रक्रिया के अनुरूप है।

पुराने रिकॉर्ड से नाम का मिलान नहीं होने पर मतदाताओं को राहत

SIR के दौरान जिन मतदाताओं का विवरण पुरानी मतदाता सूचियों से नहीं मिल पाता, उन्हें लेकर भी आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। 
  • आयोग के मुताबिक, ऐसे मतदाताओं को सामान्यतः अपने दस्तावेजों के साथ निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) या सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (AERO) के कार्यालय में व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी।
  • इसके बजाय बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) उनके घर जाकर जरूरी दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं और उन्हें ECINet प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर सकते हैं।
  • आयोग ने कहा कि सुनवाई केवल असाधारण परिस्थितियों में होनी चाहिए और जहां संभव हो, उसे ऑनलाइन आयोजित किया जाना चाहिए।
यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नाम का मिलान न हो पाना SIR प्रक्रिया से जुड़ी प्रमुख चिंताओं में से एक रहा है।

ECINet पोर्टल पर नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार किसे है?

मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन से संबंधित आरोपों पर चुनाव आयोग ने कहा कि ECINet प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसी मतदाता की प्रविष्टि तभी जोड़ी, हटाई या बदली जा सकती है, जब संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी का आदेश हो। आयोग ने स्पष्ट किया कि ECINet की टीम का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी कानून के तहत अपने सभी अधिकारों का इस्तेमाल बिना तकनीकी बाधा के कर सकें।
प्लेटफॉर्म के नियमों और अनुपालन की समीक्षा के लिए आयोग ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के विशेषज्ञों वाली समिति गठित किए जाने की जानकारी भी दी। आयोग की यह सफाई उन आरोपों के संदर्भ में आई है, जिनमें मतदाता सूची तैयार करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की डिजिटल प्रणाली तक पहुंच और उनके अधिकारों को लेकर सवाल उठाए गए थे।

गोवा में 97 मतदाताओं के मामले पर आयोग की सफाई

गोवा में मतदाता सूची से कथित रूप से छूट गए 97 लोगों के मामले में चुनाव आयोग ने कहा कि इनमें से 88 लोगों के नाम पहले ही मतदाता सूची में दर्ज किए जा चुके थे। आयोग के मुताबिक, छह लोग विदेश में थे, जबकि तीन लोगों के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे। यह विवरण आयोग ने उन सवालों के जवाब में दिया, जो SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के छूटने और उनके नाम दर्ज होने की स्थिति को लेकर उठे थे।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर अपीलों पर भी जवाब

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली अपीलों का मुद्दा भी विवाद का हिस्सा है। चुनाव आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन में दाखिल की थीं। आयोग के अनुसार, इन मामलों को उसके समक्ष अलग से नहीं लाया गया था। इस मुद्दे पर आयोग ने अपने जवाब में प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला दिया और कहा कि संबंधित कार्रवाई को आयोग के भीतर निर्णयों पर असहमति का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर आयोग का जवाब

इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उन्हें कार्य करने से रोकने की मांग है। चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए लागू होते हैं। इस आधार पर आयोग ने दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद का काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका स्वीकार्य नहीं है।
आयोग ने यह भी कहा कि उसने किसी समाचार एजेंसी को आंतरिक फाइल या नोट जारी नहीं किया था और न ही उन्हें जारी करने की अनुमति दी थी। उसके मुताबिक, याचिका मुख्यतः एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित है, जिसे आयोग ने आरोपों को साबित करने के लिए अपर्याप्त बताया। आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की विश्वसनीयता को लेकर उठाई गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया और कहा कि ऐसे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विचार कर चुका है। उसने यह जवाब दशहरा अवकाश के दौरान संक्षिप्त हलफनामे के रूप में दाखिल किया और मामले में विस्तृत, बिंदुवार जवाब दाखिल करने की अनुमति भी मांगी।

सुप्रीम कोर्ट में अब आगे क्या होगा?

5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यशैली और चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर चुनाव आयोग तथा केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। अदालत ने उस समय ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने या निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया था। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ कर रही है, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
अब आयोग का हलफनामा उसके पक्ष का औपचारिक जवाब है। इससे आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकलता। अदालत को यह देखना होगा कि आयोग की निर्णय प्रक्रिया संबंधित कानून के अनुरूप थी या नहीं और क्या उठाई गई आपत्तियों के आधार पर किसी न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत है। आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए SIR के आदेशों को सर्वसम्मत बताया है, लेकिन फॉर्म 6 के ऑनलाइन प्रदर्शन को लेकर भ्रम की संभावना स्वीकार करना भी इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू है।