द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के ECINET प्लेटफॉर्म पर राज्य के अधिकारियों की पहुंच केंद्रीय चुनाव आयोग से चालू या बंद की जा सकती है। यानी पूरा कंट्रोल सेंट्रलाइज़ है। इस खुलासे से पारदर्शिता और चुनावी डेटा पर नियंत्रण को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं।
ईसीआईनेट का कंट्रोल बटन केंद्रीय चुनाव आयोग के पास है
चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET की कार्यप्रणाली को लेकर एक नई रिपोर्ट में गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म पर राज्यों के अधिकारियों की पहुंच को केंद्रीय स्तर से कभी भी बंद या चालू किया जा सकता है। इससे चुनावी प्रक्रिया से जुड़े डेटा और डिजिटल व्यवस्था पर राज्यों के नियंत्रण को लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं।
अंग्रेजी अखबार द हिंदू में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, नागरिक तकनीक से जुड़े एनजीओ ‘चर्चाग्राम’ (Charchagram) के एक ऑडिट में ECINET प्लेटफॉर्म पर ऐसी व्यवस्था की पहचान की गई है, जिसके जरिए राज्य के नोडल अधिकारियों की पहुंच को निष्क्रिय किया जा सकता है। यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है, जब चुनाव आयोग के भीतर भी ECINET और मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर आपत्तियां उठने की खबरें आई हैं।
ECINET में क्या मिला? राज्य के नोडल अधिकारियों को निष्क्रिय करने का विकल्प
चर्चाग्राम की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, ECINET में राज्य नोडल अधिकारियों (State Nodal Officers यानी SNOs) के प्रबंधन के लिए एक अलग मॉड्यूल मौजूद है। इसमें अधिकारियों को बनाने, उनका प्रबंधन करने और उनकी जानकारी अपडेट करने के विकल्पों के साथ उन्हें निष्क्रिय करने की सुविधा भी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि आधिकारिक लॉगिन के पीछे मौजूद इस मॉड्यूल में हर राज्य नोडल अधिकारी के नाम के सामने ‘Disable’ बटन दिया गया है। इसे दबाने पर एक संदेश दिखाई देता है, जिसका अर्थ है कि संबंधित अधिकारी को निष्क्रिय करने के बाद वह एप्लिकेशन का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा।
इसका महत्व इसलिए है कि यह केवल किसी अधिकारी के खाते को बंद करने का मामला नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision यानी SIR) से जुड़े फॉर्म का विवरण देखने की सुविधा भी राज्यवार चालू या बंद की जा सकती है।
पोर्टल पर इस सुविधा के लिए संदेश दिखाई देता है कि चुने गये राज्य के लिए ‘View Enumeration Form Details’ विकल्प सक्रिय नहीं है। इस तरह, राज्य के हिसाब से निर्धारित सेटिंग के जरिये संबंधित अधिकारियों की फॉर्म देखने की सुविधा नियंत्रित की जा सकती है। यानी यूपी के किसी भी जिले के नोडल अधिकारी को चुनाव आयोग में बैठा अधिकारी एक बटन दबाकर उसे निष्क्रिय कर सकता है यानी वो नोडल अधिकारी बिना केंद्रीय मर्जी के फॉर्म नहीं देख सकता।
चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां और ये खुलासा
इस रिपोर्ट का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने ECINET तथा मतदाता सूची के डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण (सेंट्रलाइज़्ड) को लेकर आपत्तियां उठाई थीं। चुनाव आयोग का ECINET प्लेटफॉर्म चुनाव से जुड़ी विभिन्न डिजिटल सेवाओं को एक जगह उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसमें मतदाता रजिस्ट्रेशन, मतदाता सूची में नाम खोजना, आवेदन की स्थिति देखना और चुनाव अधिकारियों से संपर्क जैसी सुविधाएं शामिल हैं। लेकिन इस पर नियंत्रण केंद्रीय चुनाव आयोग के पास है।लेकिन यदि राज्य स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की पहुंच केंद्रीय स्तर से नियंत्रित की जा सकती है, तो यह सवाल उठता है कि चुनाव संबंधी कामकाज में राज्य और स्थानीय अधिकारियों की व्यावहारिक भूमिका कितनी स्वतंत्र रहती है।
SIR और मतदाता सूची के प्रबंधन पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (Electoral Registration Officer यानी ERO) और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (Assistant Electoral Registration Officer यानी AERO) की भूमिका अहम होती है। यदि संबंधित अधिकारी मतदाताओं के फॉर्म या उनसे जुड़े दस्तावेज नहीं देख पाते, तो उनके लिए मामलों की जांच और निपटारा करने में व्यावहारिक कठिनाई पैदा हो सकती है। यही वजह है कि चुनावी डेटा तक पहुंच को नियंत्रित करने वाली किसी भी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण है।इस संदर्भ में ECINET के तकनीकी ढांचे पर उठे सवाल सिर्फ सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं हैं। वे चुनावी प्रक्रिया में अधिकारों के बंटवारे, अधिकारियों की जिम्मेदारी और मतदाता सूची के प्रबंधन की विश्वसनीयता से भी जुड़े हैं।
रिपोर्ट की सीमाएं क्या हैं?
इस मामले में एक जरूरी तथ्य यह है कि चर्चाग्राम की ऑडिट रिपोर्ट में बताई गई तकनीकी सुविधा और उसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच अंतर है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, ECINET पर राज्य नोडल अधिकारियों को निष्क्रिय करने का विकल्प मौजूद है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि किसी राज्य में अधिकारियों की पहुंच वास्तव में बंद की गई थी।
- द हिंदू की रिपोर्ट के आधार पर फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि ECINET की केंद्रीकृत पहुंच-नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल उठे हैं और इस व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर स्पष्टीकरण की जरूरत है।
बड़ा सवाल: चुनावी तकनीक पर नियंत्रण किसका?
ECINET जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म चुनावी सेवाओं को एकीकृत करने और कामकाज को अधिक सुविधाजनक बनाने में मदद कर सकते हैं। लेकिन चुनावी प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल तभी भरोसेमंद माना जाएगा, जब अधिकारियों की पहुंच, उनके अधिकारों और सिस्टम में बदलाव करने की शक्तियों के बारे में स्पष्ट नियम हों।इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को बंद या चालू करने का अधिकार किन अधिकारियों के पास है, ऐसे फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं और क्या उनका रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है। इन सवालों का स्पष्ट जवाब चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था में पारदर्शिता और मतदाता सूची पर जनता के भरोसे के लिए महत्वपूर्ण होगा।
ECINET के ऑडिट में सामने आई सुविधा चुनावी डेटा के केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। हालांकि, किसी तकनीकी विकल्प का मौजूद होना अपने आप में दुरुपयोग का प्रमाण नहीं है। वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रतिक्रिया, सिस्टम के तकनीकी ऑडिट और पहुंच नियंत्रित करने की प्रक्रिया का विवरण सामने आना ज़रूरी है। इसके लिए केंद्रीय चुनाव आयोग की जवाबदेही ज़रूरी है।