एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सरकार से सवाल पूछने वालों और वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को बीजेपी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स पर 'दिमागी नक्सल' कहकर निशाना बनाए जाने की निंदा की है। गिल्ड ने कहा कि किसी पत्रकार को सिर्फ इसलिए सार्वजनिक रूप से बदनाम करना कि वह सरकार से सवाल पूछता है या उसकी नीतियों का विश्लेषण करता है, लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है।

एडिटर्स गिल्ड का यह कड़ा बयान उस मामले में आया है जिसमें बीजेपी ने एक वीडियो जारी कर सरकार से सवाल पूछने वालों को 'दिमागी नक्सल' बताया है। 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में किया था। इसके बाद बीजेपी नेताओं और पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार के आलोचकों, कुछ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को इसी शब्द से संबोधित किया जाने लगा।
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एडिटर्स गिल्ड ने क्या कहा?

एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान में कहा कि पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई को 'दिमागी नक्सल' बताना पूरी तरह ग़लत है। गिल्ड ने कहा कि राजदीप सरदेसाई ने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में समाचारों और राजनीतिक घटनाक्रमों का पेशेवर और निष्पक्ष विश्लेषण किया है। ऐसे पत्रकार को इस तरह के राजनीतिक लेबल देना न केवल उनकी प्रतिष्ठा पर हमला है बल्कि पूरे मीडिया जगत के लिए चिंताजनक संकेत है।

गिल्ड ने कहा कि सबसे गंभीर बात यह है कि यह हमला किसी अनजान समूह या सोशल मीडिया ट्रोल की ओर से नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किया गया है।

'मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला'

एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि लोकतंत्र में पत्रकारों का काम सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और जनता तक तथ्य पहुंचाना है। यदि पत्रकारों को राजनीतिक विरोधी या दुश्मन की तरह पेश किया जाएगा तो इससे मीडिया की स्वतंत्रता कमजोर होगी। गिल्ड ने कहा कि भारत के संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जो गारंटी दी गई है, ऐसे हमले उसकी भावना के विपरीत हैं।

एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान में रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2026 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स रिपोर्ट का भी ज़िक्र किया। गिल्ड ने कहा कि भारत का स्थान इस सूची में 180 देशों में 157वाँ है। उसके अनुसार इसका एक बड़ा कारण स्वतंत्र मीडिया के लिए लगातार कम होती जगह और पत्रकारों पर बढ़ता दबाव है। गिल्ड का कहना है कि पत्रकारों को डराने या उन्हें राजनीतिक पहचान देने की कोशिश भारत की लोकतांत्रिक छवि को नुक़सान पहुँचाती है।

बीजेपी के वीडियो में क्या कहा गया?

बीजेपी के आधिकारिक हैंडल से 20 अगस्त को वीडियो पोस्ट किया गया। इस वीडियो में लिखा है 'Who is a दिमागी Naxal?' सवाल के साथ क्लिप्स और इमेजेस दिखाए गए हैं। इसमें मुख्य रूप से विपक्षी नेताओं और आलोचकों को दिमागी नक्सल के रूप में पेश किया गया है। वीडियो में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल, पत्रकार राजदीप सरदेसाई, एक्टर प्रकाश राज, ध्रुव राठी, विशाल ददलानी जैसे चेहरों को दिखाया गया है।

बीजेपी नेता ने क्या कहा था?

दिमागी नक्सल पर यह विवाद बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के बयान के बाद और बढ़ गया था। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था कि 'दिमागी नक्सल' वे लोग हैं जो नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखते हैं, उन्हें वैचारिक समर्थन देते हैं, सुरक्षा बलों की मौत पर खुशी जताते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय सड़क पर आंदोलन की राजनीति को बढ़ावा देते हैं। इसके बाद बीजेपी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ पत्रकारों और सरकार के आलोचकों को भी इसी श्रेणी में दिखाने वाले पोस्ट सामने आए।

प्रधानमंत्री ने क्या कहा था?

15 अगस्त को लाल क़िले से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जंगलों में सक्रिय नक्सलवाद अब काफी हद तक समाप्ति की ओर है, लेकिन 'दिमागी नक्सल' अभी भी समाज में मौजूद हैं। उन्होंने कहा था कि ऐसे लोग वर्षों तक विभिन्न संस्थानों और समितियों के माध्यम से नीतियों को प्रभावित करते रहे और अब उनकी पहचान कर समाज से अलग करना ज़रूरी है।

विपक्ष ने उठाए पीएम के भाषण पर सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण के बाद विपक्षी दलों ने भी 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, सीपीआई (एम) समेत कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार आलोचकों, बुद्धिजीवियों और विपक्षी नेताओं को नए राजनीतिक लेबल देकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस ने बताया 'हताशा'

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा था कि पहले सरकार अपने विरोधियों को 'अर्बन नक्सल' कहती थी और अब 'दिमागी नक्सल' कह रही है। उनके अनुसार यह सरकार की हताशा को दिखाता है। पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि यह शब्द पहले इस्तेमाल किए गए 'अर्बन नक्सल', 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' और 'राष्ट्रविरोधी' जैसे राजनीतिक विशेषणों की अगली कड़ी है। 

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा था कि हिंसा का समर्थन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन हर असहमति रखने वाले व्यक्ति को ऐसे शब्दों से संबोधित करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। वहीं कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं, छात्रों और अपने आलोचकों के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें अलग-अलग नाम देकर बदनाम करने की कोशिश कर रही है।
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जंतर-मंतर आंदोलन से क्या संबंध?

यह पूरा विवाद उस समय और तेज हुआ जब हाल के महीनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा गड़बड़ियों और शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े छात्र आंदोलन हुए। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन आंदोलनों और उनसे जुड़े सवालों का जवाब देने के बजाय आलोचकों को निशाना बना रही है।

हालांकि सरकार और बीजेपी का कहना है कि देश में हिंसा या अराजकता फैलाने वाली विचारधाराओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाना जरूरी है और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाले तत्वों की पहचान की जानी चाहिए।

बहरहाल, एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान के अंत में बीजेपी से अपील की कि वह अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पत्रकारों को बदनाम करने के लिए न करे। गिल्ड ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, सवाल पूछना और स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा हैं। इन्हें देशविरोध या किसी अन्य राजनीतिक पहचान से जोड़ना सही नहीं है।