मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर चुनाव आयोग ने दो महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। पहला, जिन मतदाताओं के नाम पहले मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन SIR के दौरान जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में उनके नाम गायब हैं, वे दोबारा नाम जुड़वाने के लिए Form-6 भर सकते हैं। दूसरा, आयोग ने Form-6 के ऑनलाइन आवेदन से SIR से संबंधित विवादित घोषणा को अलग कर दिया है। अब ECINET पोर्टल पर Form-6 और SIR Declaration अलग-अलग दस्तावेजों के रूप में उपलब्ध होंगे।
इन दोनों फैसलों को मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान पैदा हुई कानूनी और प्रशासनिक उलझनों को दूर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि Form-6 में SIR से जुड़ी घोषणा को शामिल करने के फैसले पर चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने ही गंभीर आपत्ति जताई थी।

पहले से वोटर रहे लोगों को Form-6 भरने की अनुमति

हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने 3 नवंबर को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि SIR के दौरान जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में नहीं हैं, वे Form-6 के जरिए अपना नाम दोबारा शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। आयोग के सामने यह मामला आया था कि ऐसे कई मतदाता आवेदन करने से हिचक रहे हैं, जिनके नाम पहले भी मतदाता सूची में दर्ज थे। इसकी वजह Form-6 में शामिल वह घोषणा थी, जिसमें आवेदक को यह बताना होता है कि वह पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर रहा है।
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फॉर्म-6 भरने पर मुकदमे का डर गलत: चुनाव आयोग

चुनाव आयोग ने अपने पत्र में कहा है कि उसे जानकारी मिली है कि एसआईआर के दौरान जिन पुराने मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं आए हैं, वे फॉर्म-6 भरने से हिचक रहे हैं। इसकी वजह फॉर्म में शामिल यह घोषणा है कि आवेदक का नाम पहली बार मतदाता सूची में दर्ज किया जा रहा है। ऐसे मतदाताओं को डर है कि पहले मतदाता रह चुके होने के बावजूद पहली बार नाम जुड़वाने की घोषणा करना जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 31 के तहत अपराध माना जा सकता है। इस धारा में गलत घोषणा करने पर दंड का प्रावधान है।
लेकिन आयोग ने साफ किया है कि पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज होना और एसआईआर के बाद ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं होना, अपने आप में फॉर्म-6 के जरिए दोबारा आवेदन करने को गलत नहीं बनाता। आयोग के मुताबिक, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) केवल इस आधार पर किसी मतदाता के खिलाफ धारा 31 के तहत कार्रवाई शुरू नहीं कर सकता कि उसका नाम पिछली मतदाता सूची में था और उसने एसआईआर के दौरान या उसके बाद फॉर्म-6 जमा किया है।

क्या हैं फिर से फॉर्म 6 भरने की शर्तें

हालांकि इसके लिए एक महत्वपूर्ण शर्त है। आवेदक का नाम किसी दूसरी लोकसभा या विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में पहले से दर्ज नहीं होना चाहिए और उसके द्वारा की गई घोषणा कानून के अनुरूप होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति पहले से किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में दर्ज है या उसने वास्तव में गलत अथवा गैरकानूनी घोषणा की है, तो मामला अलग होगा। चुनाव आयोग ने इस संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट के 14 अक्टूबर के फैसले का भी हवाला दिया है। आयोग के अनुसार, अदालत ने फॉर्म-6 में पहली बार नाम दर्ज कराने की घोषणा को लेकर याचिकाकर्ता की आशंका को गलत माना था।

दिल्ली के 43 लाख मतदाताओं का मामला बना पृष्ठभूमि

चुनाव आयोग का यह स्पष्टीकरण सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें दिल्ली के लगभग 43 लाख लोगों का मामला उठा था। इन लोगों के नाम मतदाता सूची से इसलिए हटाए गए थे क्योंकि एसआईआर के दौरान वे अपने पुराने पते पर नहीं मिले थे।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा था कि जिन लोगों के नाम 2026 की मतदाता सूची में पहले दर्ज थे, उन्हें नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे लोगों के नाम बहाल करने के लिए फॉर्म-8 या गणना प्रक्रिया का इस्तेमाल किए जाने का सुझाव दिया गया था।

इस मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया था कि क्या एसआईआर के दौरान नाम कटने वाले पुराने मतदाताओं को भी नए मतदाता की तरह आवेदन करना पड़ेगा? और क्या ऐसा करने पर वे कानूनी मुश्किल में फंस सकते हैं? अब चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि जिनका नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, वे फॉर्म-6 के जरिए नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

फॉर्म-6 विवाद में चुनाव आयोग का एक और यू-टर्न

इस पूरे मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग के ऑनलाइन पोर्टल ECINet पर फॉर्म-6 में एसआईआर से संबंधित अतिरिक्त घोषणा को लेकर है। इंडियन एक्सप्रेस की 4 नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने अब यह अतिरिक्त घोषणा फॉर्म-6 से अलग कर दी है। यह बदलाव उन राज्यों में भी लागू किया गया है जहां एसआईआर की प्रक्रिया अभी चल रही है।
इससे पहले फॉर्म-6 के ऑनलाइन आवेदन में दो हिस्सों के बीच एसआईआर से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। आवेदकों के लिए इसका जवाब देना अनिवार्य था। इसमें तीन विकल्प दिए गए थे:
  • 1. आवेदक का नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुई पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में दर्ज था।
  • 2. आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था।
  • 3. न तो आवेदक का और न ही उसके माता-पिता का नाम उस सूची में दर्ज था।
इस घोषणा के बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ सकता था। यानी एक सामान्य मतदाता पंजीकरण फॉर्म के साथ एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी देना अनिवार्य कर दिया गया था।
  • इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अब यह घोषणा फॉर्म-6 का हिस्सा नहीं है। ECINet पोर्टल पर इसे अलग दस्तावेज के रूप में उपलब्ध कराया गया है।

दो चुनाव आयुक्तों ने बदलाव को बताया था गैरकानूनी

फॉर्म-6 में एसआईआर से संबंधित अतिरिक्त घोषणा जोड़ने के फैसले पर चुनाव आयोग के भीतर भी गंभीर मतभेद सामने आए थे। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक:
- 16 मई 2026: चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कहा था कि फॉर्म-6 में इस तरह का बदलाव कानूनी संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता।
- 19 मई: सुखबीर सिंह संधू ने जोशी की आपत्ति का समर्थन किया।
- जुलाई 2026: दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद ECINet पर फॉर्म-6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ दी गई।
- 13 अगस्त: संधू ने इस बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तत्काल हटाने की मांग की।
- 23 सितंबर: इंडियन एक्सप्रेस ने दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से संबंधित अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की।
- 26 सितंबर: चुनाव आयोग ने कहा कि एसआईआर के दौरान अतिरिक्त घोषणा लागू रहेगी, जबकि सामान्य अवधि में 1960 के नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म इस्तेमाल होंगे।
- 21 अक्टूबर: आयोग के इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने फॉर्म-6 और एसआईआर घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला किया।
- 26 अक्टूबर: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में इस फैसले का उल्लेख किया।
- 4 नवंबर: ECINet पोर्टल पर एसआईआर की अतिरिक्त घोषणा को फॉर्म-6 से अलग कर दिया गया।

आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या सफाई दी थी?

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा था कि फॉर्म-6 के साथ एसआईआर घोषणा को जोड़ने का उद्देश्य केवल आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाना था। आयोग का तर्क था कि अगर फॉर्म-6 और एसआईआर घोषणा अलग-अलग होते तो आवेदकों को दो बार OTP और दो बार ई-सिग्नेचर की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती। दोनों को एक साथ रखने से एक ही OTP और एक ही ई-सिग्नेचर से आवेदन पूरा हो सकता था।
लेकिन आयोग ने बाद में स्वीकार किया कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर घोषणा जिस तरह फॉर्म-6 के भीतर दिखाई जा रही थी, उससे यह भ्रम पैदा हो सकता था कि आयोग ने वैधानिक फॉर्म में संशोधन कर दिया है। आयोग ने अपने हलफनामे में यह भी कहा कि फॉर्म-6 में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। इसी वजह से 21 अक्टूबर को दोनों दस्तावेजों को अलग करने का फैसला लिया गया। अब ऑनलाइन आवेदन में भी वही व्यवस्था लागू की गई है जो कागजी आवेदन में थी। यानी एक तरफ निर्धारित नियमों के मुताबिक फॉर्म-6 और दूसरी तरफ एसआईआर से संबंधित अलग घोषणा।

चुनाव आयोग के भीतर 10 महीने में 14 बार उठीं आपत्तियां

इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर है। अखबार के मुताबिक, पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कई फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आपत्तियों का संबंध केवल फॉर्म-6 तक सीमित नहीं था। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने, हटाए गए नामों को बहाल करने, अपील की प्रक्रिया और मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल थे। दोनों आयुक्तों ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे को लेकर भी सवाल उठाए थे। 28 जुलाई के एक प्रशासनिक आदेश के तहत वरिष्ठ अधिकारियों के काम का आवंटन बदला गया था। इसमें आईटी से संबंधित काम भी शामिल था। दोनों आयुक्तों की आपत्ति के बाद अगले दिन इस आदेश को संयुक्त रूप से रद्द कर दिया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठाए थे। उनकी आपत्तियों में आयोग की बैठकों के एजेंडे और कार्यवाही के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने का मुद्दा भी शामिल था। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि पिछले पांच सप्ताह में आयोग ने उन कई मुद्दों पर अपने फैसलों में बदलाव किया है जिन पर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। इनमें आयोग की बैठकों की प्रक्रिया, अधिकारियों की विदेश यात्राओं की मंजूरी, नए आईटी सिस्टम की स्वीकृति और ECINet के ऑडिट जैसे विषय शामिल हैं।

ECINet और मतदाता सूची के प्रबंधन पर भी सवाल

चुनाव आयोग ने ECINet के कामकाज की जांच के लिए अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों की एक समिति भी गठित की है। यह समिति यह जांच करेगी कि पोर्टल और उसके विभिन्न मॉड्यूल संबंधित कानूनों और नियमों के अनुरूप काम कर रहे हैं या नहीं। इस समिति में वरिष्ठ चुनाव अधिकारी, विभिन्न राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और आईआईटी बॉम्बे तथा IISc बेंगलुरु के स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हैं।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने पहले इस बात पर चिंता जताई थी कि मतदाता सूची का प्रबंधन और उस तक पहुंच का नियंत्रण धीरे-धीरे केंद्रीयकृत होता जा रहा है, जबकि कानून के तहत मतदाता सूची से जुड़े कई अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO), जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) और मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) के पास हैं।
रिपोर्ट में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया है। इन लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए थे। बाद में उन्होंने दस्तावेज पेश किए और स्थानीय अधिकारियों ने उनकी पात्रता स्वीकार कर ली, लेकिन ECINet सॉफ्टवेयर में उनके नाम बहाल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। चुनाव आयोग के हलफनामे के अनुसार, इन 97 में से 88 लोगों ने फॉर्म-6 भर दिया था और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए थे। छह लोग देश से बाहर थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे। आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को शेष मतदाताओं के मामलों में भी जरूरी कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

इस पूरे विवाद का राजनीतिक महत्व क्या है?

एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने और उन्हें दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया पहले से ही राजनीतिक विवाद का विषय रही है। अब फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग की सफाई और ECINet में बदलाव ने आयोग के कामकाज, उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ आयोग कह रहा है कि पुराने मतदाता भी फॉर्म-6 भर सकते हैं और केवल पुराने पंजीकरण के आधार पर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। 
दूसरी तरफ इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि आयोग को अपने ही दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को वापस लेना पड़ा और एसआईआर घोषणा को अलग दस्तावेज बनाना पड़ा। यह मामला केवल एक फॉर्म में बदलाव का नहीं है। यह सवाल भी है कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में चुनाव आयोग के पास कितनी प्रशासनिक स्वतंत्रता है, वैधानिक नियमों की सीमा क्या है और आयोग के भीतर लिए जाने वाले फैसलों में पारदर्शिता कितनी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात: एसआईआर की ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपना मताधिकार खो चुका है। पात्र मतदाता निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है। कुल मिलाकर, Form 6 का विवाद चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, उसकी पारदर्शिता और मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। दो चुनाव आयुक्तों की लगातार आपत्तियों, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और मीडिया की पड़ताल के बाद आयोग को अपने कई फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ा है। हालांकि, पुराने मतदाताओं के नाम बहाल करने की प्रक्रिया और ECINet की जवाबदेही को लेकर उठे सभी सवालों का समाधान अभी बाकी है।