चुनाव आयोग के अंदर मतदाता सूची के प्रबंधन और उसके डिजिटल सिस्टम को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक एक्सक्लूसिव जांच के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कई बार चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आईटी सिस्टम में बदलाव और मतदाता सूची के नियंत्रण के केंद्रीकरण पर आपत्ति दर्ज की। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी अपनी आपत्तियों से अवगत कराया। उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी तक अपनी आपत्तियां पहुंचाईं। लेकिन सीईसी और कैबिनेट सेक्रेटरी ने चुप्पी साध ली।
मामला इतना गंभीर हुआ कि जुलाई 2026 में दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग पत्र लिखकर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को भी चुनाव आयोग के प्रशासनिक और आईटी ढांचे में हुए बदलाव की जानकारी दी। यह कदम चुनाव आयोग के भीतर जारी मतभेदों के लिहाज से असाधारण माना जा रहा है।

ECINET क्या है और विवाद क्यों उठा?

चुनाव आयोग ने 22 जनवरी 2026 को ECINET नाम का नया डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किया था। इसके जरिए आयोग के 40 से ज्यादा ऐप और पोर्टल को एक ही तकनीकी ढांचे के अंतर्गत लाया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसके लॉन्च के समय कहा था कि यह सिस्टम कानून के अनुरूप बनाया गया है। आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना ने भी इसे पारदर्शिता, विश्वसनीयता और जनता के भरोसे को मजबूत करने वाला सिस्टम बताया था।
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लेकिन कुछ ही महीनों बाद इसी सिस्टम को लेकर आयोग के भीतर सवाल उठने लगे। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने के लिए कानूनन जिम्मेदार अधिकारियों को कुछ मामलों में सिस्टम पर अपेक्षित अधिकार नहीं मिल पा रहे थे।

मतदाता सूची का अधिकार किसके पास है?

Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के लिए एक Electoral Registration Officer यानी ERO होता है। आमतौर पर ERO एसडीएम या जिला प्रशासन के समान स्तर का अधिकारी होता है। मतदाता सूची तैयार करने, दावों और आपत्तियों की सुनवाई करने तथा किसी नाम को सूची में रखने या हटाने का निर्णय लेने की जिम्मेदारी उसी की होती है।

यह व्यवस्था जानबूझकर विकेंद्रीकृत (decentrlized) रखी गई है। इसका उद्देश्य यह है कि मतदाता सूची पर किसी एक व्यक्ति या केंद्रीय टीम का पूरा नियंत्रण न हो।

  • इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब 10 महीनों में कई राज्यों में ऐसी स्थितियां सामने आईं जहां ERO कानूनन निर्णय लेने के बावजूद सॉफ्टवेयर में उस निर्णय को दर्ज नहीं कर पा रहे थे। 
  • रिपोर्ट के अनुसार, किसी नाम को जोड़ना, हटाना, पहले लिए गए निर्णय को बदलना या अपील की प्रक्रिया आगे बढ़ाना सॉफ्टवेयर स्तर पर संभव नहीं हो पा रहा था और इन अधिकारों का नियंत्रण दिल्ली स्थित आईटी डिवीजन के स्तर पर केंद्रित था।

नवंबर 2025 से उठने लगी थीं आपत्तियां

इस विवाद की शुरुआत ECINET के लॉन्च से पहले ही हो गई थी।
  • 4 नवंबर 2025
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू के निर्देश पर तत्कालीन उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार ने आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना और आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखा।
  • इसमें कहा गया कि ERO, DEO और CEO के वैधानिक अधिकार उन्हीं अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने चाहिए और किसी अन्य व्यक्ति या व्यवस्था द्वारा उन्हें सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
  • पत्र में यह भी कहा गया कि आईटी सिस्टम को हर स्थिति में कानून के अनुरूप होना चाहिए।
  • 2 जनवरी 2026
उस समय 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR चल रहा था। आईटी डिवीजन ERO के लिए नोटिस जारी करने और सुनवाई से संबंधित नया मॉड्यूल तैयार कर रहा था।
  • संजय कुमार ने सीमा खन्ना से कहा कि सिस्टम इस तरह बनाया जाए कि ERO का अपने वैधानिक विवेक के इस्तेमाल का अधिकार प्रतिबंधित न हो।
इसके लगभग 20 दिन बाद ECINET लॉन्च हुआ।
  • 22 जनवरी 2026: ECINET लॉन्च
चुनाव आयोग ने ECINET को अपने डिजिटल चुनावी ढांचे के रूप में लॉन्च किया। इसके जरिए 40 से ज्यादा ऐप और पोर्टल को एकीकृत किया गया।
अप्रैल में चुनाव आयुक्त संधू ने जताई आपत्ति: 16 अप्रैल 2026 को सुखबीर सिंह संधू ने दर्ज किया कि आईटी डिवीजन ने पिछले कुछ महीनों में कई नए मॉड्यूल और पोर्टल विकसित किए हैं, लेकिन इनकी जानकारी आयोग के सभी सदस्यों को नहीं दी गई। संधू ने लिखा कि उन्हें कुछ नए विकासों की जानकारी मीडिया के जरिए मिली। उन्होंने मांग की कि आईटी डिवीजन के काम के बारे में आयोग के सभी सदस्यों को जानकारी दी जाए और जरूरी अनुमोदन लिए जाएं।
SIR स्कैम सामने आया, दोनों आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद कुछ नहीं हुआ
SIR स्कैमः इंडियन एक्सप्रेस का खुलासा

29 मई: विवेक जोशी ने 'केंद्रीकरण' पर जताई चिंता

29 मई 2026 को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त, संधू और संजय कुमार को पत्र लिखकर मतदाता सूची के डेटाबेस के "क्रमिक केंद्रीकरण" पर चिंता जताई। जोशी ने सुझाव दिया कि इस पूरे सिस्टम का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। उन्होंने IIT के किसी बाहरी विशेषज्ञ को शामिल करने का प्रस्ताव रखा ताकि यह प्रमाणित किया जा सके कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ उन्हीं वैधानिक अधिकारियों के पास हो जिन्हें कानून ने यह अधिकार दिया है।
जोशी ने दो स्तर की निगरानी व्यवस्था का सुझाव दिया: पहली समिति नियमित रूप से सिस्टम की समीक्षा करे और प्रमाणित करे कि केवल वैधानिक अधिकारियों के पास मतदाता डेटाबेस बदलने की अनुमति है। दूसरी समिति यह जांचे कि ECINET कानून के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं और ERONET तथा ECINET में होने वाले नीतिगत या प्रक्रियात्मक बदलाव आयोग के सामने रखे जा रहे हैं या नहीं। जोशी के अनुसार, इस तरह की आंतरिक ऑडिट व्यवस्था आयोग पर केंद्रीकरण से जुड़े आरोपों का जवाब देने में भी मदद कर सकती थी।
आंतरिक ऑडिट व्यवस्था पर आयुक्त विवेक जोशी का सुझाव क्यों नहीं माना गया
SIR स्कैमः इंडियन एक्सप्रेस का खुलासा

13 जुलाई: संधू ने भी ऑडिट प्रस्ताव का समर्थन किया

13 जुलाई को संधू ने जोशी के प्रस्ताव का समर्थन किया और कहा कि इससे सिस्टम में सुधार होगा तथा इसे आयोग के सामने रखा जाना चाहिए। लेकिन 14 अगस्त को संधू ने फिर दर्ज किया कि इन दोनों चुनाव आयुक्तों के नोट्स पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है।

28 जुलाई: आईटी डिवीजन की निगरानी व्यवस्था बदली

विवाद जुलाई के अंत में और गहरा गया। उस समय वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजय कुमार, जो उप चुनाव आयुक्त थे, चुनाव आयोग के आईटी डिवीजन के काम की निगरानी कर रहे थे और उसकी फाइलें तीन सदस्यीय आयोग तक पहुंचाते थे। 28 जुलाई को वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग को प्रशासन का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। इसके कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने काम के बंटवारे में बदलाव कर दिया और संजय कुमार को आईटी महानिदेशक की निगरानी से हटा दिया। संधू और जोशी के अनुसार, यही वह निगरानी व्यवस्था थी जिसके जरिए वे आईटी डिवीजन से नियमित जानकारी और सिस्टम के ऑडिट की मांग कर रहे थे।

कैबिनेट सचिव को पत्र क्यों लिखा गया?

29 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग पत्र लिखकर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को इस प्रशासनिक बदलाव की जानकारी दी। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने इस आदेश को कानून का "स्पष्ट उल्लंघन" बताया और मनीष गर्ग के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की। यह कदम इसलिए असाधारण था क्योंकि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने पहली बार इस तरह आयोग के अंदर लिए गए किसी प्रशासनिक आदेश को लेकर देश के शीर्ष नौकरशाह को सीधे शिकायत की।

30 जुलाई: दोनों आयुक्तों ने आदेश पलट दिया: कैबिनेट सचिव को पत्र भेजने के अगले ही दिन, 30 जुलाई को संधू और जोशी ने संयुक्त रूप से मनीष गर्ग के काम के बंटवारे वाले आदेश को अलग रख दिया। दोनों ने कहा कि बदलाव के पीछे कोई पर्याप्त कारण या औचित्य नहीं बताया गया है। उन्होंने निर्देश दिया कि पुरानी व्यवस्था तब तक जारी रहे जब तक आयोग किसी बदलाव पर सहमति नहीं बना लेता। इसकी जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी दी गई।

14 अगस्त: संधू की सबसे गंभीर आपत्ति

14 अगस्त 2026 को संधू ने मतदाता सूची और आईटी सिस्टम को लेकर अपनी सबसे विस्तृत चिंता दर्ज की। उन्होंने कहा कि CEO, DEO और ERO ही मतदाता सूची के लिए कानूनन जिम्मेदार अधिकारी हैं। लेकिन कई अधिकारियों ने उन्हें बताया था कि उन्हें ERONET पर "उचित और पूर्ण एक्सेस" नहीं मिल रहा है। संधू के अनुसार, इससे अधिकारी अपने वैधानिक दायित्वों को ठीक से पूरा नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके अधिकारों को ERONET के DG(IT) स्तर पर केंद्रीकृत नियंत्रण के कारण सीमित किया गया है।

संधू ने यह सवाल भी उठाया कि जब मतदाता सूची की जिम्मेदारी वैधानिक अधिकारियों की है तो उसके सिस्टम का एक्सेस नियंत्रण आईटी महानिदेशक के स्तर पर केंद्रीकृत क्यों है। उन्होंने तत्काल सभी संबंधित अधिकारियों को पूरा एक्सेस देने का निर्देश दिया और आईटी महानिदेशक से यह प्रमाणित करने को कहा कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के CEO की पुष्टि के आधार पर वैधानिक अधिकारियों के पास ERONET का पूरा एक्सेस है और वे बिना किसी प्रतिबंध के अपना काम कर सकते हैं।

विवाद का असर क्या है

यह विवाद केवल किसी तकनीकी सॉफ्टवेयर या प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध मतदाता सूची से है। मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ना, हटाना या संशोधित करना चुनाव प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। कानून के तहत यह अधिकार स्थानीय स्तर के निर्धारित चुनाव अधिकारियों को दिया गया है। इसलिए यदि अधिकारी किसी व्यक्ति के संबंध में कानून के मुताबिक निर्णय ले सकते हैं, लेकिन सॉफ्टवेयर उन्हें उस निर्णय को लागू करने की अनुमति नहीं देता, तो कानूनी अधिकार और तकनीकी नियंत्रण के बीच अंतर पैदा होने का सवाल उठता है। यही वह मुद्दा है जिसे संधू और जोशी ने अपनी आपत्तियों में उठाया है।

SIR और ECINET विवाद का व्यापक संदर्भ

मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण को लेकर यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब चुनाव आयोग का Special Intensive Revision (SIR) अभियान देश के बड़े हिस्से में चल रहा है। PIB के अनुसार, SIR के तीसरे चरण में 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था। इस चरण में 3.94 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारी करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं के घर-घर जाकर सत्यापन करने वाले थे। इसी व्यापक SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने, नए मतदाताओं के पंजीकरण और अपील की प्रक्रियाओं को लेकर भी बहस चल रही है। इसलिए ECINET और ERONET पर उठे सवालों का महत्व इस बात से जुड़ जाता है कि मतदाता सूची में किसी फैसले का अंतिम डिजिटल नियंत्रण किसके पास है और कानून द्वारा अधिकृत स्थानीय अधिकारी वास्तव में अपने अधिकारों का इस्तेमाल किस हद तक कर सकते हैं।

अंत में याद रखिये, क्या हुआ था

इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण, ERO के सिस्टम एक्सेस, आईटी डिवीजन की निगरानी और बिना पर्याप्त आयोगीय जानकारी/सिफारिश के नए मॉड्यूल विकसित किए जाने पर बार-बार सवाल उठाए। मामला जुलाई में कैबिनेट सचिव तक पहुंचा और अगस्त में संधू ने ERONET के केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर विस्तृत आपत्ति दर्ज की। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त और कैबिनेट सेक्रेटरी और पूरा सिस्टम चुप रहा। कहीं कोई कार्रवाई नहीं। इस तरह एक तरह से संविधान को ताक पर रखकर देशद्रोह जैसा कृत्य किया गया।