तालिबान के सत्ता संभालने के लगभग पाँच साल बाद, मुफ्ती नूर अहमद नूर अफ़गान दूतावास के चार्ज डी'अफेयर्स के रूप में नई दिल्ली पहुंचे। भारत ने औपचारिक मान्यता के बिना ही अफ़गानिस्तान के साथ संबंध और मजबूत किए। क्या तालिबान के नाम से आतंकी संगठन का ठप्पा हट गया।
दिल्ली की अफगान एम्बैसी में मुफ्ती नूर अहमद नूर नियुक्त
लगभग पांच साल बाद, जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, पहली बार तालिबान द्वारा नियुक्त एक राजनयिक भारत पहुंचा है। वो नई दिल्ली में अफगानिस्तान दूतावास की कमान संभालेंगे।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक मुफ्ती नूर अहमद नूर, जो तालिबान के विदेश मंत्रालय में प्रथम राजनीतिक विभाग के महानिदेशक हैं, दिल्ली पहुंचे हैं। वो अफगान दूतावास में चार्ज डी'एफेयर्स (कार्यवाहक राजदूत) के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगे।
यह घटनाक्रम अक्टूबर 2025 में तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा के बाद सामने आया है, जिसमें उन्हें विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मेजबानी दी थी। उस यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और दिल्ली में तालिबान द्वारा राजनयिक नियुक्त करने पर सहमति जताई थी। 21 अक्टूबर 2025 को भारत ने काबुल में अपनी तकनीकी मिशन को "दूतावास" का दर्जा दिया था, जिससे अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी मजबूत हुई।
भारत ने स्पष्ट किया है कि वह तालिबान को अफगानिस्तान की वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता है, क्योंकि तालिबान ने अगस्त 2021 में बलपूर्वक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई अशरफ गनी सरकार को हटाया था। फिर भी, क्षेत्रीय शांति और हितों को ध्यान में रखते हुए भारत ने तालिबान के साथ व्यावहारिक संपर्क बढ़ाया है। चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान और कई खाड़ी देशों की तरह भारत भी अब तालिबान के साथ जुड़ाव बढ़ा रहा है।
पहले अप्रैल 2023 में तालिबान द्वारा नियुक्त एक राजनयिक को दूतावास के कर्मचारियों ने रोक दिया था और उन्हें परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया गया था। वर्तमान में दूतावास में पूर्व सरकार के प्रतिनिधि मोहम्मद इब्राहिमखिल कार्यवाहक के रूप में कार्यरत थे, लेकिन अब मुफ्ती नूर अहमद नूर के आने से बदलाव की उम्मीद है।
सूत्रों के अनुसार, मुफ्ती नूर ने अभी औपचारिक नियुक्ति पत्र सौंपा नहीं हैं और उनका नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। उम्मीद है कि अगले सप्ताह वे पूर्ण रूप से दूतावास की कमान संभाल लेंगे। इस दौरान दूतावास में पुराना अफगान झंडा (लाल, हरा और काला तिरंगा) और पूर्व कर्मचारी बने रहेंगे, हालांकि नियंत्रण लेने के बाद इसमें बदलाव संभव है।
मुंबई और हैदराबाद में अफगान वाणिज्य दूतावासों में पहले ही तालिबान द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि काम कर रहे हैं।
यह कदम भारत और तालिबान प्रशासन के बीच संबंधों में एक महत्वपूर्ण प्रगति दर्शाता है, हालांकि भारत की गैर-मान्यता वाली नीति बरकरार है। यूएन की सूची में तालिबान आज भी आतंकवादी संगठन है। हालांकि तालिबान से अमेरिका बराबर बातचीत करता रहा था। लेकिन अंत में अमेरिका को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा। इससे पहले रूस के साथ भी यही हो चुका है। लेकिन भारत समेत तमाम देश तालिबान सरकार से तालमेल बिठा रहे हैं।