बॉम्बे हाईकोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि SIR से लग रहा है कि धारा 22 को प्रभावी रूप से रोक दिया गया है। उनकी जगह सॉफ्टवेयर सिस्टम लागू किया जा रहा है। चुनाव आयोग ऐसा कैसे कर सकता है। कानून सबसे ऊपर है।
एसआईआर में वोटर लिस्ट कंट्रोल करने का पूरा बंदोबस्त किया गया
गोवा में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कानून और नियम सबसे ऊपर हैं, सॉफ्टवेयर नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि SIR के दौरान ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती, जिससे Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के प्रावधान प्रभावी रूप से निलंबित हो जाएं।
बॉम्बे हाईकोर्ट की पणजी पीठ में जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और अमित जामसंदेकर की डिवीजन बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें गोवा के सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र के एक परिवार के छह सदस्यों के नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। परिवार ने पता बदलने की सूचना देने के लिए Form 8 जमा किया था, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
Form 8 जमा करने के बावजूद छह लोगों के नाम हटे
याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर ने अदालत को बताया कि वह और उनके परिवार के सदस्य उसी विधानसभा क्षेत्र के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर रहने चले गए थे। उन्होंने SIR के दौरान पता बदलने के लिए निर्धारित Form 8 जमा किया। इसके बावजूद बाद में उन्हें पता चला कि परिवार के छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने अदालत को बताया कि SIR की enumeration प्रक्रिया के दौरान सिस्टम Form 8 को प्रोसेस करने की अनुमति नहीं देता था। आयोग के मुताबिक, परिवार को बाद में नए मतदाता के रूप में शामिल होने के लिए Form 6 भरने को कहा गया था, लेकिन परिवार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। The Times of India के मुताबिक यही दलील हाईकोर्ट के सवालों के केंद्र में रही।
“सॉफ्टवेयर की समस्या मतदाता क्यों भुगते?”
अदालत ने सवाल किया कि अगर Form 8 कानून में मौजूद है और परिवार ने तय समय में उसे जमा भी किया था, तो सिर्फ इसलिए उसे क्यों नहीं माना गया क्योंकि चुनावी सॉफ्टवेयर उसे स्वीकार नहीं कर रहा था। पीठ ने सवाल उठाया कि “यह आपके सॉफ्टवेयर की समस्या है”, तो इसका नतीजा यह कैसे हो सकता है कि मतदाताओं के नाम ही सूची से गायब हो जाएं। जब पता बदलने के लिए Form 8 की व्यवस्था है, तो मतदाताओं से Form 6 भरने पर जोर क्यों दिया जा रहा है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाया
चुनाव आयोग क्या आंखों में धूल झोंक रहा है
पिछली सुनवाई के दौरान भी अदालत ने इसी मामले में चुनाव आयोग से पूछा था कि परिवार के सदस्य अपना नाम मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए कौन-सा फॉर्म भरें। उस समय आयोग ने अदालत को बताया था कि एक बार नाम हट जाने के बाद सिस्टम उसे उसी प्रक्रिया के तहत वापस बहाल करने की अनुमति नहीं देता।
- इस पर अदालत ने चुनाव आयोग से समाधान तलाशने को कहा था और टिप्पणी की थी कि “पूरा देश” इस तरह की समस्या का सामना कर रहा है और आयोग को इसका रास्ता निकालना होगा।
“कानून को सॉफ्टवेयर के अधीन नहीं किया जा सकता”
बुधवार की सुनवाई में हाईकोर्ट ने इससे आगे बढ़कर SIR की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि SIR की प्रक्रिया के कारण ऐसा लग रहा है कि Representation of the People Act की धारा 22 और संबंधित नियमों को प्रभावी रूप से रोक दिया गया है, जबकि उनकी जगह सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली को लागू किया जा रहा है। पीठ ने सवाल किया कि चुनाव आयोग ऐसा कैसे कर सकता है कि कानून कहता कुछ हो और सॉफ्टवेयर की सीमाओं के कारण अधिकारियों को कुछ और करना पड़े।अदालत ने स्पष्ट किया कि ERO यानी Electoral Registration Officer के पास सॉफ्टवेयर पर आवश्यक अधिकार होना चाहिए। ERO को किसी तीसरे व्यक्ति या केवल सॉफ्टवेयर के निर्देशों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
- पीठ ने कहा कि ERO के पास सॉफ्टवेयर की “चाबी” होनी चाहिए, ताकि वह अपने वैधानिक आदेश के अनुसार नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की कार्रवाई कर सके। अदालत के मुताबिक, यदि ERO किसी तकनीकी सिस्टम के आदेशों पर निर्भर और असहाय हो जाए तो यह उचित व्यवस्था नहीं है।
“Act को फॉलो करना है, टेक्नोलॉजी को नहीं”
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान जोर देकर कहा कि पहले कानून का पालन होगा और उसके बाद तकनीक की भूमिका आएगी।
अदालत ने कहा कि पूरी व्यवस्था को मतदाता के हित में काम करना चाहिए। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई पात्र मतदाता मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।- पीठ ने यह भी सवाल किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाया जाना है तो उसे पहले सुनवाई का अवसर क्यों नहीं दिया जाता।
- अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना कानून की मूल आवश्यकता है।
SIR कानून और सामान्य पुनरीक्षण से अलग कोई स्वतंत्र प्रक्रिया नहीं
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि SIR के दौरान Form 8 को प्रोसेस नहीं किया जा सकता था और उस अवधि में नामों में बदलाव नहीं किया गया।
इस पर हाईकोर्ट ने इस तर्क पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि SIR को इस तरह नहीं चलाया जा सकता कि उसके कारण मौजूदा कानून और नियमों को कुछ समय के लिए किनारे कर दिया जाए।पीठ ने कहा कि SIR अपने आप में कानून से अलग कोई स्वतंत्र प्रक्रिया नहीं हो सकती। अदालत के अनुसार SIR को संबंधित नियमों और Representation of the People Act के प्रावधानों के अनुरूप ही चलना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावी पुनरीक्षण चाहे जितनी बार किया जाए, वह ऐसी स्थिति पैदा नहीं कर सकता जिसमें मतदाता Form 6, Form 7 या Form 8 के माध्यम से मिलने वाले अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल ही न कर सके।
“कितने और मतदाता अदालत नहीं पहुंच पाए होंगे?”
छह मतदाताओं के नाम हटने के मामले को लेकर अदालत ने एक बड़ा सवाल भी उठाया। पीठ ने कहा कि जब ये छह लोग अदालत तक पहुंच गए हैं तो यह पता लगाना जरूरी है कि ऐसे कितने और मतदाता हैं, जिनके नाम हट गए लेकिन वे अदालत तक नहीं पहुंच पाए। यही चिंता इस मामले को केवल एक परिवार की समस्या से आगे ले जाती है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि तकनीकी व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं, तो चुनाव आयोग को इस व्यवस्था की समीक्षा करनी होगी।चुनाव आयोग का इनकार किया
आयोग के वकील ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग की किसी मतदाता का नाम जानबूझकर हटाने की मंशा नहीं थी।
लेकिन अदालत ने इसके जवाब में मूल कानूनी प्रक्रिया पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना जरूरी है।
- इस तरह सुनवाई में मुख्य विवाद यह नहीं था कि आयोग ने जानबूझकर मतदाताओं के नाम हटाए या नहीं, बल्कि यह था कि क्या सॉफ्टवेयर की तकनीकी सीमाओं के कारण किसी वैधानिक प्रक्रिया को रोका जा सकता है और क्या तकनीकी सिस्टम कानून से ऊपर हो सकता है।
पहले भी सामने आया था सॉफ्टवेयर का विवाद
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब गोवा में SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं।
TOI की पिछली रिपोर्ट के मुताबिक, सांता क्रूज के इसी मामले में चुनाव आयोग ने कहा था कि SIR की enumeration अवधि में Form 8 प्रोसेस नहीं किया जा सकता था। बाद में परिवार को Form 6 भरने को कहा गया। अदालत ने तब भी सवाल उठाया था कि जब परिवार ने Form 8 के जरिए पता बदलने की जानकारी दी थी तो उसे नजरअंदाज क्यों किया गया। गोवा में SIR के दौरान सॉफ्टवेयर से जुड़ी दूसरी शिकायतों को लेकर भी विवाद हुआ है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने पहले 97 ऐसे मतदाताओं के मामलों पर स्पष्टीकरण दिया था जिनके नाम अंतिम सूची में नहीं थे और कहा था कि पात्र मतदाताओं को फिर से शामिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
हाईकोर्ट की टिप्पणी का बड़ा मतलब
बॉम्बे हाईकोर्ट की इस सुनवाई का केंद्रीय संदेश यह है कि चुनाव प्रक्रिया को तकनीकी सिस्टम की सीमाओं के हिसाब से नहीं, बल्कि वैधानिक प्रावधानों के अनुसार चलना चाहिए। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि यदि किसी सॉफ्टवेयर में कोई फॉर्म स्वीकार करने या किसी नाम को बहाल करने की सुविधा नहीं है, तो इसका खामियाजा मतदाता को नहीं भुगतना चाहिए। चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों को ऐसी तकनीकी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी जो कानून के अनुरूप काम करे। यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है और हाईकोर्ट की टिप्पणियां सुनवाई के दौरान उठाए गए सवालों और प्रथमदृष्टया चिंताओं को दर्शाती हैं; इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।