E20 पर ही मचे बवाल के बीच अब केंद्र सरकार ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन कर 100% इथेनॉल यानी E100 से चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के निर्माण और प्रमाणन का रास्ता साफ़ कर दिया है। इसका क्या असर होगा?
केंद्र सरकार ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 में संशोधन कर E100 यानी लगभग शुद्ध इथेनॉल से चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के निर्माण और प्रमाणन का रास्ता साफ़ कर दिया है। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मौजूदा पेट्रोल कारों में भी E100 ईंधन डाला जा सकेगा। ऐसे वाहनों के इंजन, फ्यूल सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल को खास तौर पर तैयार करना होगा। इस बदलाव से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटने की संभवना है, लेकिन माइलेज, ईंधन की लागत, पानी की खपत और खेती पर इसके असर को लेकर सवाल भी हैं।
भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने को लेकर पहले से बहस चल रही है। E20 यानी 20 फीसदी इथेनॉल मिले पेट्रोल के इस्तेमाल को लेकर वाहन चालकों के बीच माइलेज और इंजन पर असर जैसी चिंताएं उठती रही हैं। इसी बीच केंद्र सरकार ने एक और कदम उठाते हुए 100 फ़ीसदी तक इथेनॉल वाले ईंधन पर चलने में सक्षम फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए नियामकीय रास्ता खोल दिया है। लेकिन इस फैसले को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि E100 क्या है, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन सामान्य पेट्रोल कारों से कैसे अलग होते हैं और इस बदलाव से आम वाहन चालकों को क्या फायदा या नुकसान हो सकता है।
E100 क्या है?
E100 ऐसे ईंधन को कहा जाता है जिसमें लगभग पूरा ईंधन इथेनॉल होता है। इसकी तुलना में E20 पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल और शेष मुख्य रूप से पेट्रोल होता है। केंद्र सरकार के नियमों में संशोधन का मकसद उन वाहनों के निर्माण और प्रमाणन का रास्ता साफ़ करना है, जिन्हें ज़्यादा मात्रा में इथेनॉल वाले ईंधन पर चलने के लिए तैयार किया जाएगा।इसका मतलब यह है कि अब वाहन निर्माता ऐसे फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए नियामकीय मंजूरी हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, जो अपनी डिजाइन और प्रमाणन के अनुसार E100 तक इस्तेमाल कर सकें। नियमों में वाहन वर्गीकरण से जुड़े कुछ तकनीकी बदलाव भी किए गए हैं। इनमें हल्के पेट्रोल और डीजल वाहनों के लिए वजन की सीमा 3000 किलोग्राम से बढ़ाकर 3500 किलोग्राम करना शामिल है। हालाँकि, इस संशोधन का मतलब यह नहीं है कि भारत में चल रही हर पेट्रोल कार अब E100 पर चलने लगेगी। सरकार ने ईंधन के इस्तेमाल की अनुमति का दायरा बढ़ाया है, सभी मौजूदा वाहनों को E100 के अनुकूल नहीं बनाया है।
क्या मौजूदा कारों में E100 चलेगा?
इस फैसले के बाद वाहन चालकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे अपनी मौजूदा पेट्रोल कार में E100 भरवा सकते हैं। इसका जवाब है- नहीं, जब तक वाहन को इसके लिए खास तौर पर डिजाइन और प्रमाणित न किया गया हो। E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने के लिए मंजूर सामान्य कार को E85 या E100 जैसे ज्यादा इथेनॉल वाले ईंधन पर चलाना सुरक्षित नहीं माना जा सकता है। पेट्रोल और इथेनॉल के गुण अलग-अलग होते हैं। इसलिए इंजन, ईंधन पहुंचाने वाली प्रणाली और दूसरे जरूरी पुर्जों को उसी हिसाब से तैयार करना पड़ता है।अगर किसी सामान्य पेट्रोल कार में उसकी तय सीमा से अधिक इथेनॉल वाला ईंधन डाल दिया जाए तो ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर असर पड़ सकता है और इंजन के सही ढंग से काम करने में परेशानी हो सकती है।
क्या होते हैं फ्लेक्स-फ्यूल वाहन?
फ्लेक्स-फ्यूल का पूरा नाम फ्लेक्सिबल फ्यूल है। ये ऐसे वाहन होते हैं जिन्हें पेट्रोल, इथेनॉल या दोनों के अलग-अलग मिश्रणों पर चलने के लिए बनाया जाता है। सामान्य पेट्रोल कार में इंजन और ईंधन प्रणाली को एक खास तरह के ईंधन के हिसाब से तैयार किया जाता है। इसके उलट, फ्लेक्स-फ्यूल वाहन का इंजन ईंधन में इथेनॉल की मात्रा के अनुसार अपने काम करने के तरीके में बदलाव कर सकता है। यह क्षमता वाहन की डिजाइन और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणाली पर निर्भर करती है।ऐसे वाहनों में सामान्य पेट्रोल कारों के कई पुर्जे इस्तेमाल हो सकते हैं, लेकिन अधिक इथेनॉल वाले ईंधन के अनुकूल कुछ विशेष हिस्सों की जरूरत होती है। इनमें फ्यूल पंप, इंजेक्शन सिस्टम, पाइप, सील और इंजन कंट्रोल मॉड्यूल से जुड़े बदलाव शामिल हो सकते हैं। इंजन कंट्रोल मॉड्यूल यानी ECM ईंधन के प्रकार और उसकी विशेषताओं के अनुसार इंजन के काम करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। इससे अलग-अलग अनुपात वाले पेट्रोल-इथेनॉल मिश्रणों पर इंजन को चलाने में मदद मिलती है।
देश में अभी कितने फ्लेक्स-फ्यूल वाहन हैं?
भारत में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की संख्या अभी सीमित है। कारों में मारुति सुजुकी की वैगनआर का फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल और टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस का हाइब्रिड फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप इस श्रेणी के उदाहरण हैं।दोपहिया वाहनों में हीरो मोटोकॉर्प ने इस साल जून में अपनी लोकप्रिय कम्यूटर मोटरसाइकिलों स्प्लेंडर+ और HF Deluxe के फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण पेश किए थे। हालांकि, किसी वाहन का फ्लेक्स-फ्यूल होना अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि वह E100 पर भी चल सकता है। वाहन कितने प्रतिशत इथेनॉल वाले ईंधन का इस्तेमाल कर सकता है, यह उसकी तकनीकी क्षमता और प्रमाणन पर निर्भर करेगा।
क्या E100 से इंजन सुरक्षित है?
हां, इंजन को इस तरह डिजाइन किया जा सकता है कि वह लगभग शुद्ध इथेनॉल पर भी काम करे। लेकिन इसके लिए इंजन और ईंधन प्रणाली में कुछ बड़े बदलाव जरूरी होते हैं। पेट्रोल और इथेनॉल दोनों ज्वलनशील ईंधन हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा क्षमता और रासायनिक विशेषताएं अलग हैं। इसलिए E100 पर चलने वाले वाहन को सामान्य पेट्रोल कार की तरह ही मानना सही नहीं होगा।
पेट्रोल में मिलाने की जरूरत क्यों?
अगर इथेनॉल से वाहन चलाया जा सकता है तो पेट्रोल में इसे मिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है? इसके पीछे मुख्य रूप से दो वजहें हैं। पहली वजह मौजूदा व्यवस्था के साथ तालमेल है। देश में बड़ी संख्या में पेट्रोल वाहन पहले से चल रहे हैं और ईंधन वितरण की मौजूदा व्यवस्था भी काफी हद तक पेट्रोल पर आधारित है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से बिना पूरे वाहन बेड़े को बदले ही पेट्रोल की कुछ मात्रा की जगह इथेनॉल का इस्तेमाल किया जा सकता है।दूसरी वजह कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाना है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है। पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल की मिलावट से पेट्रोलियम ईंधन की मांग का कुछ हिस्सा पूरा किया जा सकता है। इससे तेल आयात पर खर्च घटाने की संभावना बनती है।
इथेनॉल उत्पादन से किसानों और इससे जुड़े उद्योगों के लिए बाजार भी तैयार हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों या दूसरे कारणों से तेल की आपूर्ति प्रभावित होने पर घरेलू ईंधन विकल्पों का महत्व और बढ़ जाता है।
E20 पर विवाद तो E100 क्यों?
E20 पेट्रोल को लेकर वाहन चालकों की एक बड़ी चिंता माइलेज को लेकर रही है। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में कम ऊर्जा होने के कारण ज्यादा इथेनॉल वाले ईंधन से प्रति लीटर दूरी कम हो सकती है। इसीलिए E100 के लिए नियमों में बदलाव को केवल वैकल्पिक ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने के फैसले के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि ऐसे वाहन खरीदने और चलाने की कुल लागत कितनी होती है।
किसी ईंधन का प्रति लीटर सस्ता होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उससे वाहन चलाना भी सस्ता पड़ेगा। यदि माइलेज में कमी आती है, तो प्रति किलोमीटर खर्च बढ़ भी सकता है।
इथेनॉल उत्पादन से खेती, पानी पर क्या असर?
इथेनॉल का उत्पादन गन्ने और अनाज जैसी फसलों से किया जा सकता है। इसे कृषि अवशेषों और दूसरे पौधों से मिलने वाली सामग्री से भी बनाया जा सकता है। भारत में गन्ना और अनाज इथेनॉल उत्पादन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। लेकिन बड़े पैमाने पर इथेनॉल बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में कृषि सामग्री की जरूरत होगी। इससे खेती, पानी, जमीन और खाद्य उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका भी उठती है। उदाहरण के लिए, गन्ने की खेती में काफी पानी लगता है। यदि ईंधन की मांग बढ़ने पर गन्ने की खेती का विस्तार होता है, तो पानी के इस्तेमाल और जमीन के उपयोग से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हो सकते हैं।क्या इथेनॉल से प्रदूषण पूरी तरह खत्म हो जाएगा?
इथेनॉल के इस्तेमाल से जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से कुछ प्रदूषकों, जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर से जुड़े प्रदूषकों, के उत्सर्जन में कमी आ सकती है। लेकिन इसका असर इंजन, ईंधन के मिश्रण और वाहन की तकनीक पर निर्भर करता है। यह मानना सही नहीं होगा कि इथेनॉल से चलने वाला वाहन पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त हो जाएगा। वाहन चलने के दौरान उत्सर्जन बना रह सकता है और ग्रीनहाउस गैसों पर कुल असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि इथेनॉल कैसे उगाया, बनाया और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया गया।