ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट में ₹13,000 करोड़ के नए एयरपोर्ट को मंजूरी मिल गई है। नेता विपक्ष नेता राहुल गांधी और स्थानीय आदिवासियों ने तमाम चिंताएं जताई थीं। Approval granted for new ₹13,000-crore airport under great Nicobar Project. Leader of Opposition Rahul Gandhi and tribal communities raised various concerns.
द ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
केंद्र सरकार ने रणनीतिक रूप से संवेदनशील ग्रेट निकोबार द्वीप पर ₹81,000 करोड़ की मेगा विकास परियोजना के तहत एक नए ₹13,000 करोड़ के ग्रीनफील्ड सिविल-मिलिट्री हवाई अड्डे के निर्माण को मंजूरी दे दी है। सरकार ने पहले से मौजूद नौसैनिक हवाई अड्डे 'आईएनएस बाज' (INS Baaz) का विस्तार करने के बजाय एक बिल्कुल नया रनवे और एयरपोर्ट बनाने का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि आईएनएस बाज के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और पहाड़ों को काटने की जरूरत पड़ती, जो तकनीकी रूप से व्यावहारिक नहीं था। क्या इस प्रोजेक्ट से अडानी समूह को फायदा होगा। इसकी चर्चा इसी रिपोर्ट में आगे होगी।
नए एयरपोर्ट की मंजूरी का फैसला ऐसे समय में आया है जब इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय जनजातीय समुदायों, पर्यावरणविदों और राजनीतिक दलों का विरोध बेहद तेज हो गया है।
विपक्ष और राहुल गांधी के गंभीर आरोप
राहुल गांधी ने यहां के दौरे के बाद कहा कि "यह देश की प्रकृति और आदिवासियों के खिलाफ अपराध है।" राहुल गांधी ने पिछले दिनों ग्रेट निकोबार के इंदिरा पॉइंट का दौरा किया और वहां के आदिवासियों और स्थानीय लोगों से मुलाकात की। उन्होंने समुद्र में स्कूबा डाइविंग कर वहां की प्राचीन कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) का भी जायजा लिया। इस दौरे के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने सरकार को आड़े हाथों लिया है।
क्या ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से अडानी समूह को फायदा है
राहुल गांधी का आरोप है कि BJP का यह दावा पूरी तरह से एक "झूठ" है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा और सामरिक (strategic) नज़रिए से महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना का असली मकसद उद्योगपति गौतम अडानी की मदद करना है।अप्रैल में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के अपने दौरे पर आधारित 16 मिनट का एक वीडियो जारी करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि ग्रेट निकोबार में केंद्र सरकार की इस मेगा-डेवलपमेंट परियोजना से बड़े पैमाने पर पर्यावरण का विनाश होगा और स्थानीय समुदाय विस्थापित होंगे। उनका आरोप है कि यह प्रोजेक्ट निजी व्यावसायिक हितों को पूरा करने के लिए लाया गया है, जिसके तहत एक ट्रांसशिपमेंट हब, एक हवाई अड्डा और एक पर्यटन टाउनशिप बनाई जानी है।
उन्होंने तर्क दिया कि अगर रणनीतिक और सुरक्षा के कारण सबसे महत्वपूर्ण होते, तो सरकार को निकोबार द्वीप समूह में स्थित नौसैनिक एयर स्टेशन 'आईएनएस बाज' (INS Baaz) का विस्तार करना चाहिए था, जिसका कांग्रेस भी पूरी तरह समर्थन करती। लेकिन सरकार ने मंगलवार को जो फैसला लिया, उसके मुताबिक आईएनएश बाज को इस परियोजना में शामिल ही नहीं किया गया है। राहुल गांधी ने कहा:
"नौसेना पिछले पांच वर्षों से इसके विस्तार की मांग कर रही है। अगर आप सैन्य दृष्टिकोण से तर्क देना चाहते हैं, तो आईएनएस बाज का विस्तार कीजिए। उसके लिए प्राचीन वर्षावनों (Rainforests) को नष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है। बात बस इतनी है कि वे मिस्टर अडानी की मदद करना चाहते हैं और ये अपराधी भारतीय भूमि को चुराने के लिए नौसेना और हमारे सुरक्षा बलों के पीछे छिप रहे हैं। वे कह रहे हैं कि वे एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनाना चाहते हैं, लेकिन यह योजना पहले से ही विफल है क्योंकि वे मुख्य भूमि (केरल) में पहले से ही एक ऐसा पोर्ट बना रहे हैं। इसलिए यह उनका पहला झूठ है।"
आदिवासियों और पर्यावरण के लिए क्या खतरनाक है ये प्रोजेक्ट
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इस परियोजना का उद्देश्य होटल और कैसीनो जैसी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है। इसके कारण 1.5 करोड़ से अधिक पेड़, प्राचीन वर्षावन और कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) गंभीर खतरे में हैं। उन्होंने बताया कि जिस क्षेत्र को इस प्रोजेक्ट के लिए विकसित किया जा रहा है, वह नई दिल्ली के आकार से भी चार गुना बड़ा है।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट में राहुल गांधी ने लिखा कि उन्होंने इंदिरा पॉइंट का दौरा किया था, जहां उन्होंने स्थानीय आदिवासियों और वहां बसे लोगों (settlers) से मुलाकात की। उन्होंने आरोप लगाया कि 'वन अधिकार अधिनियम' (Forest Rights Act) का उल्लंघन करके आदिवासी समुदायों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है और विस्थापित होने वाले लोगों को उचित मुआवजा भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने देश के युवाओं से सवाल पूछते हुए कहा: "आप किस तरह का भारत विरासत में पाना चाहते हैं? ऐसा भारत जहां कैसीनो के लिए वर्षावनों पर बुलडोजर चला दिया जाए, कोरल रीफ को नक्शे से मिटा दिया जाए, आदिवासियों को उनकी जमीन से खदेड़ दिया जाए और जिस हवा में हम सांस लेते हैं वह जहर बन जाए? या ऐसा भारत जहां हमारी प्राकृतिक विरासत सुरक्षित हो, आदिवासी समुदाय महफूज हों और प्रगति प्रकृति के खिलाफ नहीं बल्कि उसके साथ मिलकर काम करे?"
निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर मुख्य आरोप क्या हैं
- सुरक्षा के नाम पर 'झूठ' का दावा: राहुल गांधी ने सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा के लिए जरूरी बताया जा रहा है। उन्होंने कहा:"अगर सरकार का मकसद सिर्फ देश की सुरक्षा है, तो वह पिछले 5 साल से लंबित 'आईएनएस बाज' (INS Baaz) नौसैनिक अड्डे का विस्तार क्यों नहीं कर रही? नौसेना इसकी मांग कर रही है, लेकिन उसे नजरअंदाज किया गया। विपक्ष सुरक्षा के लिए आईएनएस बाज के विस्तार का 100% समर्थन करेगा, लेकिन विकास के नाम पर विनाश का नहीं।"
- 1.5 करोड़ पेड़ों की कटाई और पर्यावरण को नुकसान: विपक्ष का आरोप है कि इस ₹81,000 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए लगभग 1.5 करोड़ पेड़ों को काटा जाएगा और 160 वर्ग किलोमीटर में फैले प्राचीन वर्षावनों (Rainforests) को नष्ट कर दिया जाएगा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकारी नक्शों से कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) के डेटा को जानबूझकर मिटाया जा रहा है ताकि व्यावसायिक गतिविधियों का रास्ता साफ हो सके।
- कॉर्पोरेट हितों को फायदा पहुंचाने का आरोप: विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह प्रोजेक्ट देश की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि "एक विशेष उद्योगपति" (अडानी समूह की ओर इशारा करते हुए) को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है, ताकि वहां होटल और कैसीनो बनाए जा सकें।
निकोबार के आदिवासी समूह चिंतित क्यों हैं
इस द्वीप पर सदियों से रह रहे शॉमपेन (Shompen) और निकोनारी (Nicobarese) जनजातीय समुदायों के अस्तित्व पर इस प्रोजेक्ट के कारण बड़ा संकट मंडरा रहा है। जनजातीय समूहों और नागरिक संगठनों का कहना है कि स्थानीय आदिवासियों की जमीन छीनने के लिए 'फॉरेस्ट राइट्स एक्ट' का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। उनकी सहमति के बिना उनके पारंपरिक जंगलों को डायवर्ट किया जा रहा है। आदिवासियों के साथ-साथ वहां बसाए गए पूर्व सैनिकों (Settlers) को भी डर है कि उन्हें अपनी जमीन से बेदखल कर दिया जाएगा और सरकार उन्हें उचित मुआवजा भी नहीं देने वाली।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर सरकार का रुख
विपक्ष के भारी विरोध के बीच, रक्षा मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय मिलकर इस नए डुअल-यूज (नागरिक और सैन्य) हवाई अड्डे को अगले 5 वर्षों में तैयार करने का लक्ष्य रख रहे हैं। सरकार का तर्क है कि ₹13,000 करोड़ का हवाई अड्डा नागरिक उड़ानें और नौसैनिक एयर स्टेशन को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के पास भारतीय नौसेना की निगरानी क्षमता को बढ़ा देगा। इससे इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांस-शिपमेंट पोर्टगैलाथिया बे (Galathea Bay) में अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह कोलंबो और सिंगापुर जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम कर देगा। टाउनशिप और पावर प्लांट आधुनिक शहर और बिजलीघर क्षेत्र का आर्थिक विकास करेंगे और यहां एक लाख से अधिक रोजगार पैदा होंगे।
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि पर्यावरण और आदिवासियों की सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। द्वीप का केवल 166 वर्ग किलोमीटर हिस्सा ही विकास के लिए लिया जाएगा, जबकि 81% से अधिक इलाका जंगलों, बायोस्फीयर रिजर्व और जनजातीय संरक्षण क्षेत्रों के रूप में सुरक्षित रहेगा। साथ ही, वन्यजीवों और कोरल रीफ को बचाने के लिए ₹2,220 करोड़ का विशेष संरक्षण पैकेज भी तैयार किया गया है। राजनीतिक गतिरोध और स्थानीय विरोध को देखते हुए यह साफ है कि सामरिक महत्व और पर्यावरण संरक्षण के बीच छिड़ी यह जंग आने वाले दिनों में और तेज होने वाली है।