विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC की ओर से जारी नए नियमों पर केंद्र सरकार अब पुनर्विचार कर सकती है। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह यूजीसी के समानता वाले नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेष समिति गठित करने पर विचार कर रही है। इससे इन नियमों में बदलाव किए जाने या सरकार के अपने रुख पर पुनर्विचार करने की संभावना बढ़ गई है।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों का मक़सद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना और छात्रों के लिए समान अवसर मुहैया कराना था। हालाँकि, नियमों की कुछ शर्तों को लेकर विवाद शुरू हो गया। मुख्य तौर पर सामान्य वर्ग के कुछ समूहों ने इन नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को इन नियमों पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान गुरुवार को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इन नियमों पर पुनर्विचार के लिए एक समिति गठित करने की योजना बना रही है।

नियम हर छात्र के हितों की रक्षा करें: SC

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने यूजीसी के नियमों पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने केंद्र सरकार से कहा कि उसे इन नियमों पर फिर से विचार करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी के हितों की रक्षा हो सके।
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सीजेआई ने कहा, 'आप इन नियमों पर फिर से विचार क्यों नहीं करते, ताकि आने वाली पीढ़ी का ध्यान रखा जा सके? इन नियमों को हर छात्र के हितों की रक्षा करनी चाहिए।' इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार एक समिति नियुक्त करने पर विचार कर रही है। सरकार के इस बयान को यूजीसी के नए नियमों की समीक्षा की दिशा में बड़ा क़दम माना जा रहा है। हालाँकि, अभी यह साफ़ नहीं है कि समिति कब गठित होगी और नियमों में किस तरह के बदलाव किए जाएंगे।

जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा पर विवाद

यूजीसी के नए नियमों में सबसे अधिक विवाद जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर हुआ है। नियमों के प्रावधान 3(1)(c) में जाति आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। इस पर आपत्ति जताने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस परिभाषा में सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को जाति आधारित भेदभाव के खिलाफ विशेष सुरक्षा से बाहर रखा गया है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र या शिक्षक के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है तो उसे भी नियमों के तहत और प्रभावी सुरक्षा मिलनी चाहिए। हालाँकि, यूजीसी के नियमों में भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा भी दी गई है। इसके तहत जाति के आधार पर किसी भी संबंधित व्यक्ति के साथ अनुचित या अलग व्यवहार को भेदभाव माना गया है।

यही वजह है कि नियमों की भाषा और उनके वास्तविक दायरे को लेकर क़ानूनी विवाद पैदा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर सवाल उठाया है कि जाति आधारित भेदभाव की अलग परिभाषा देने का मक़सद क्या है, जबकि भेदभाव की व्यापक परिभाषा पहले से मौजूद है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए थे कई सवाल

यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन पर रोक लगा दी थी। अदालत ने नियमों के कई प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए थे। अदालत ने मुख्य रूप से चार बड़े मुद्दों पर विचार करने की ज़रूरत बताई थी-
1. क्या जाति आधारित भेदभाव की अलग परिभाषा जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने नियम 3(1)(c) पर सवाल उठाया था। अदालत ने पूछा था कि जाति आधारित भेदभाव की अलग परिभाषा देने का क्या तार्किक आधार है, जबकि नियमों में भेदभाव की एक व्यापक और समावेशी परिभाषा पहले से मौजूद है। अदालत ने यह भी पूछा था कि जब जाति आधारित भेदभाव के लिए कोई अलग प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई है तो इस अलग परिभाषा का उद्देश्य क्या है?
2. क्या अति पिछड़ी जातियों को पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि नए नियम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर मौजूद अति पिछड़ी जातियों को भेदभाव और सामाजिक असमानता से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा देते हैं या नहीं। अदालत ने पूछा था कि क्या इन नियमों के तहत उन समुदायों को प्रभावी संरक्षण मिलेगा जो सामाजिक और संरचनात्मक असमानताओं का सामना करते हैं।
3. क्या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो सकता है?
नियमों में हॉस्टल, कक्षाओं, मेंटरशिप समूहों और अन्य शैक्षणिक या आवासीय व्यवस्थाओं में अलग-अलग व्यवस्था किए जाने का भी उल्लेख है। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था कि यदि ऐसी व्यवस्था पारदर्शी और भेदभाव रहित मानदंडों पर आधारित हो, तब भी क्या इससे ‘अलग लेकिन समान’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है? अदालत ने इस संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार तथा संविधान की प्रस्तावना में दिए गए बंधुत्व के सिद्धांत पर विचार करने की जरूरत बताई थी।
4. रैगिंग को भेदभाव क्यों नहीं माना गया?
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नियमों में रैगिंग को भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के तौर पर शामिल नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया था। अदालत ने पूछा था कि क्या नियमों से रैगिंग का उल्लेख हटाना एक पीछे ले जाने वाला कदम है? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी विचार करने को कहा था कि क्या इससे भेदभाव के शिकार छात्रों को न्याय मिलने के अवसरों में असमानता पैदा होती है और क्या यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन हो सकता है।

पायल तड़वी, रोहित वेमुला केस के बाद बने थे नियम

यूजीसी के इन नियमों के मद्देनज़र उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव के गंभीर मामले रहे हैं। इन नियमों की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट में 2019 में दायर एक याचिका से जुड़ी है। यह याचिका पायल तड़वी और रोहित वेमुला की माताओं ने दायर की थी। दोनों की मौत कथित जाति आधारित भेदभाव के बाद आत्महत्या से हुई थी।
पायल तड़वी की मौत 2019 में हुई थी, जबकि रोहित वेमुला की मौत 2016 में हुई थी। दोनों मामलों ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव, छात्रों के उत्पीड़न और संस्थागत जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए मजबूत और प्रभावी व्यवस्था लागू की जाए। इसी के मद्देनज़र यूजीसी ने 2026 के नए समानता नियम अधिसूचित किए थे।

क्या केंद्र सरकार नियमों पर यू-टर्न लेगी?

केंद्र सरकार की ओर से समिति गठित करने पर विचार करने का बयान तब आया है जब UGC के नियमों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है। एक तरफ उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। दूसरी तरफ नियमों की परिभाषा, उनके दायरे और सभी छात्रों को समान सुरक्षा दिए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ़ संकेत दिया है कि नियमों का उद्देश्य केवल किसी एक वर्ग के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि हर छात्र को समान और प्रभावी सुरक्षा देना होना चाहिए। अब केंद्र सरकार की प्रस्तावित समिति इन नियमों की समीक्षा करेगी या नहीं, और यदि समिति बनती है तो वह किन प्रावधानों में बदलाव की सिफारिश करती है, इस पर नजर रहेगी।

फिलहाल यूजीसी के 2026 के समानता नियम सुप्रीम कोर्ट की रोक के दायरे में हैं। केंद्र सरकार ने समिति गठित करने पर विचार करने की बात कही है, लेकिन अभी नियमों को वापस लेने या उनमें संशोधन करने का कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट में सरकार के ताजा बयान से इन नियमों की समीक्षा की संभावना जरूर बढ़ गई है।