देश भर में छात्र प्रोटेस्टरों के ख़िलाफ़ दर्ज FIR रद्द कराने के मामले में सीजेपी के पाँच सितंबर के मार्च का समय नज़दीक आते ही मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुँच गई! कॉकरोच जनता पार्टी ने एफआईआर रद्द करने सहित कई वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगा हफ्ते भर पहले दिल्ली में मार्च की घोषणा की है। सीजेपी के इसी मार्च से कुछ दिन पहले केंद्र सरकार एफआईआर को रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया जाए।

सीजेपी का आरोप है कि सरकार ने 25 जुलाई को आंदोलन ख़त्म कराने के लिए जो वादे किए थे, उनमें सबसे अहम वादा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने का था जो अब तक पूरा नहीं किया गया। इसने लगातार कहा है कि बार-बार वादा याद दिलाने के बाद भी सरकार इस पर सक्रियता नहीं दिखा रही थी। सीजेपी ने हफ्ते भर पहले ही कहा था कि 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में भी उसने सरकार के रवैये पर सवाल उठाए थे। पार्टी के मुताबिक़, अदालत ने केंद्र सरकार से देशभर में प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर की सूची देने को कहा था ताकि उन मामलों को एक साथ खत्म करने पर विचार किया जा सके, लेकिन सरकार ने इस पर साफ़ सहमति नहीं दी। तब सीजेपी ने कहा था कि यदि सरकार वास्तव में समझौते को लागू करना चाहती तो अदालत के सामने यह प्रक्रिया आसान हो सकती थी।
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अब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने क्या कहा?

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का तत्काल उल्लेख किया। उन्होंने अदालत से कहा कि केंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए आवेदन दाखिल कर रही है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि आवेदन किस बारे में है, तो तुषार मेहता ने जवाब दिया, 'यह उसी प्रदर्शन से जुड़ा मामला है। हम अनुच्छेद 142 के तहत एफआईआर रद्द कराने की मांग कर रहे हैं।' इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'ठीक है, आप आवेदन दाखिल कीजिए। अगर दोनों पक्ष समझौते की दिशा में बढ़ रहे हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है।'

अनुच्छेद 142 का सहारा क्यों?

18 अगस्त को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है। अदालत को बताया गया था कि एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद उसे वापस लेना कानूनी रूप से आसान नहीं होता।

पुलिस केवल क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है और उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास होता है। इसी क़ानूनी जटिलता को देखते हुए अब केंद्र सरकार ने सीधे अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सभी मामलों को ख़त्म करने की मांग की है।

सीजेपी ने क्या दी प्रतिक्रिया?

सीजेपी के मार्च से पहले छात्र प्रोटेस्टरों के ख़िलाफ़ देश भर में दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए केंद्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट पहुँचने की ख़बर पर कॉकरोच जनता पार्टी ने सिर्फ़ 'ओके' लिखा है। 

पहले सुनवाई में क्या कहा था केंद्र ने?

पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया था कि 2873 लोगों को छोड़कर बाकी छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को ख़त्म किया जा सकता है। उन्होंने कहा था कि जिन लोगों पर हत्या, बलात्कार, अपहरण या अन्य गंभीर अपराधों के आरोप हैं, उनके मामले अलग हैं। लेकिन सामान्य छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर समाप्त की जा सकती है। सरकार का कहना था कि आंदोलन में कुछ असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए थे, जिनकी जाँच जारी रहनी चाहिए।

5 सितंबर को क्यों हो रहा है बड़ा मार्च?

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने एक सप्ताह पहले घोषणा की थी कि वह 5 सितंबर को नई दिल्ली में बड़ा युवा मार्च निकालेगी। पार्टी के अनुसार यह मार्च इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक निकाला जाएगा। इसमें उन परिवारों को भी शामिल किया जाएगा, जिनके बच्चों की कथित तौर पर नीट से जुड़े मामलों में मौत हुई। इसके अलावा 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई में घायल छात्र भी मार्च में भाग लेंगे।
सीजेपी का कहना है कि सरकार ने आंदोलन ख़त्म कराने के लिए जो भरोसा दिलाया था, उसे पूरा नहीं किया गया, इसलिए दोबारा आंदोलन शुरू किया जा रहा है।

सीजेपी का सरकार पर क्या आरोप?

सीजेपी का कहना है कि उसने 25 जुलाई को सरकार के आश्वासन पर भरोसा करते हुए अपना जंतर-मंतर आंदोलन ख़त्म किया था। उस समय सरकार की ओर से कई वादे किए गए थे, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे-
  • प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना।
  • पुलिस कार्रवाई से प्रभावित छात्रों को राहत देना।
  • नीट से जुड़े आत्महत्या पीड़ित परिवारों को मुआवजा देना।
  • परीक्षा सुधारों पर आगे बातचीत जारी रखना।
  • सभी आश्वासनों को लिखित रूप में देना।
  • पार्टी का आरोप है कि इन वादों पर अब तक पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले सरकार से क्या कहा था?

18 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से देशभर में छात्र प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर की पूरी सूची मांगी थी ताकि एक साथ सभी मामलों पर विचार किया जा सके।
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सीजेपी का कहना है कि अगर सरकार उसी समय इस दिशा में कदम उठाती तो समझौते को लागू करना आसान हो सकता था। अब 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च से ठीक पहले केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना इसी विवाद के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मार्च रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 5 सितंबर के प्रस्तावित सीजेपी मार्च को रोकने की मांग वाली याचिका पर तत्काल हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अभी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि प्रस्तावित मार्च से कानून-व्यवस्था की समस्या जरूर पैदा होगी।

अदालत ने कहा, 'हम मानकर चलेंगे कि सभी पक्ष जिम्मेदारी और शांति के साथ व्यवहार करेंगे। अभी ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिससे लगे कि कुछ गलत होने वाला है।' अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी चिंताओं के साथ केंद्र सरकार के पास जाने की सलाह दी।

BRICS सम्मेलन का भी दिया गया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि सितंबर के पहले सप्ताह में दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के कारण सुरक्षा बेहद संवेदनशील है। इसलिए इस समय बड़े प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और यदि भविष्य में कोई गंभीर स्थिति बनती है तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करेंगे।

अब केंद्र सरकार का आवेदन सुप्रीम कोर्ट के सामने आएगा, जिसमें वह अनुच्छेद 142 के तहत छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर समाप्त करने की मांग करेगी। उधर, सीजेपी ने साफ कर दिया है कि यदि सरकार अपने सभी वादे पूरी तरह लागू नहीं करती तो 5 सितंबर का मार्च तय कार्यक्रम के अनुसार आयोजित किया जाएगा।