आरएसएस नेता पाकिस्तान से बातचीत करने के पक्ष में लगातार बयान देते रहे हैं। अब संघ के ही राम माधव की पाकिस्तानी अधिकारी से कोलंबो में मुलाकात पर विवाद नए सिरे से खड़ा हो गया है। विपक्ष ने मोदी सरकार से तमाम सवाल किए हैं।
आरएसएस के तमाम प्रमुख लोग पाकिस्तान से बातचीत जारी रखने की वकालत लगातार कर रहे हैं। इस सिलसिले में संघ प्रमुख मोहन भागवत और दत्तात्रेय होसबाले के बयान पहले से ही चर्चा में हैं। लेकिन इस विवाद ने तब तूल पकड़ लिया जब श्रीलंका की राजधानी कोलंबो के एक होटल में संघ विचारक राम माधव की पाकिस्तान के टॉप रैंक अधिकारी के साथ कथित तौर पर मुलाकात हुई। हालांकि राम माधव ने इसका खंडन किया और भारत सरकार ने सारे मामले से दूरी बना ली। खुद राम माधव ने मुलाकात का खंडन किया। लेकिन विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे पर मोदी सरकार को घेर लिया।
भारत और पाकिस्तान के बीच आधिकारिक बातचीत लंबे समय से बंद है, लेकिन कोलंबो से आई एक कूटनीतिक रिपोर्ट ने भारत के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। खबरों के मुताबिक, ब्रिटिश थिंक-टैंक 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर Strategic Studies' (IISS) के एक कार्यक्रम के इतर भारतीय और पाकिस्तानी डेलिगेशन के बीच करीब डेढ़ दिन तक अनौपचारिक (Track 2) बातचीत हुई है। इसे बैकचैनल बातचीत भी कहा जाता है।
बैठक में कौन-कौन हुआ शामिल?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय प्रतिनिधिमंडल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता और बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव, पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे और पूर्व राजनयिक रुचि घनश्याम शामिल थे। वहीं पाकिस्तान की ओर से वहां के विदेश मंत्रालय के मौजूदा महानिदेशक (DG South Asia) सज्जाद हैदर खान और पीपीपी नेता शेरी रहमान मौजूद थीं। बताया जा रहा है कि इस गुप्त चर्चा में आतंकवाद, जल विवाद और दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने जैसे मुद्दों पर बात हुई। यह पूरी तरह गैर सरकारी कार्यक्रम था।विपक्ष ने सरकार से पूछे सवाल
कांग्रेस मोदी सरकार के 'दोहरे मापदंड' को लेकर निशाना साध रही है। कांग्रेस का कहना है कि जब भी देश में आतंकी हमले होते हैं, बीजेपी विपक्ष पर पाकिस्तान-परस्त होने का आरोप लगाती है और राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाती है। लेकिन पर्दे के पीछे खुद आरएसएस और बीजेपी के बड़े नेता पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। कांग्रेस इसे बीजेपी का "छद्म राष्ट्रवाद" (Hypocrisy) बता रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने सरकार की 'कथनी और करनी' के अंतर पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार देश की जनता के सामने कहती है कि पाकिस्तान से कोई बात नहीं होगी, लेकिन कोलंबो में गुपचुप तरीके से रेड कारपेट बिछाकर पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बैठकें की जा रही हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह स्पष्ट करे कि क्या राम माधव और पूर्व सेना प्रमुख को सरकार की मंजूरी के साथ भेजा गया था या यह उनकी निजी यात्रा थी?
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने टीवी बहसों और बयानों में सवाल उठाया कि अगर विपक्ष का कोई नेता किसी पाकिस्तानी से मिल ले, तो उस पर तुरंत 'देशद्रोही' का ठप्पा लगा दिया जाता है। लेकिन जब संघ के इतने बड़े नेता और पूर्व सेना प्रमुख एक ऐसे पैनल में बैठते हैं जहाँ पाकिस्तान के मौजूदा अधिकारी और पूर्व आईएसआई (ISI) से जुड़े लोग मौजूद हैं, तो इसे 'नेशनल सर्विस' या बौद्धिक विमर्श का नाम देकर क्यों बचाया जा रहा है?
मोदी सरकार ने पल्ला झाड़ा
भारत सरकार के आधिकारिक सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि भारत का स्टैंड आज भी वही है कि 'आतंकवाद और बातचीत' एक साथ नहीं चल सकते। इस तरह के अनौपचारिक संपर्कों (Track 2) का सरकार की आधिकारिक कूटनीति से कोई लेना-देना नहीं है। न इसके आयोजन में भारत शामिल था और न ही किसी सरकारी अधिकारी ने इसमें हिस्सा लिया था।
राम माधव पाकिस्तानी दल से कहां मिले थे
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोलंबो के हिल्टन होटल में मुलाकात हुई थी। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल में ये चेहरे शामिल थे:सज्जाद हैदर खान (Sajjad Haider Khan): पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के मौजूदा महानिदेशक (Director General - South Asia and SAARC)। इनके शामिल होने की वजह से विपक्ष इसे और भी गंभीर मान रहा है क्योंकि वह एक मौजूदा सरकारी अधिकारी हैं। शेरी रहमान (Sherry Rehman): पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) की वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री। मेजर जनरल (रिटायर्ड) इस्फंदयार अली खान पटौदी: पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी।
संघ के दो बड़े नेता पाकिस्तान से बातचीत की वकालत कर चुके हैं
आरएसएस (RSS) के दो सबसे शीर्ष नेताओं ने पाकिस्तान के संदर्भ में बातचीत और दरवाज़े खुले रखने का समर्थन किया है। इस बयान की शुरुआत मई 2026 में संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबोले ने की थी, जिसका जून 2026 में सरसंघचालक (संघ प्रमुख) मोहन भागवत ने खुलकर बचाव और समर्थन किया। दोनों नेताओं ने अपने बयानों में जो मुख्य बातें कहीं, वो इस तरह हैं:
संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने क्या कहा
मई 2026 में एक इंटरव्यू में दत्तात्रेय होसबाले ने सुरक्षा के साथ-साथ कूटनीतिक संवाद का विकल्प खुला रखने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि "किसी भी देश की सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा करना सबसे आवश्यक है और मौजूदा सरकार को इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही, हमें (बातचीत के) दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। हमें हमेशा उनके (पाकिस्तान) साथ संवाद (Dialogue) के लिए तैयार रहना चाहिए।" उन्होंने देश की सुरक्षा (पुलवामा जैसे हमलों का कड़ा जवाब देना) को सर्वोपरि बताते हुए यह भी संकेत दिया था कि कूटनीतिक संबंध, व्यापार और वीज़ा जैसी चीज़ों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय इसके लिए एक खिड़की खुली रखी जानी चाहिए।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने क्या कहा
दत्तात्रेय होसबाले के बयान पर जब विपक्ष ने हंगामा खड़ा किया, तो केरल के तिरुवनंतपुरम में संघ के एक कार्यक्रम के दौरान खुद मोहन भागवत ने होसबाले के बयान का मजबूती से बचाव किया और इसके पीछे की संघ की सोच को स्पष्ट किया। भागवत ने स्पष्ट किया कि होसबाले का मतलब पाकिस्तान की सरकार या वहां की राज्य व्यवस्था से बात करना नहीं था, बल्कि वहां के आम लोगों से था। पाकिस्तान में आज भी एक बहुत बड़ा ऐसा वर्ग है जो मानता है कि भारत का विभाजन (Partition) एक ऐतिहासिक भूल थी। वहां कई पत्रकार और आम लोग हैं जो 'टू-नेशन थ्योरी' (दो राष्ट्र के सिद्धांत) के खिलाफ हैं और मानते हैं कि हमारा साथ रहना ज्यादा बेहतर विकल्प था। ऐसे लोगों के लिए संवाद की संभावनाएं खत्म नहीं होनी चाहिए।
भागवत ने भारत के स्वभाव का हवाला देते हुए एक बड़ा बयान दिया, "हम हिटलर की तरह नहीं हैं। यह हमारा स्वभाव या हमारी संस्कृति नहीं है। इसलिए हमें कुछ दरवाज़े खुले रखने होंगे। हमें अन्याय और अत्याचार को तो नष्ट करना ही है, लेकिन जो कुछ भी वहां अच्छा (Good) है, उसे बचाकर भी रखना है। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में किसी संघर्ष में भारत पाकिस्तान पर एक निर्णायक जीत हासिल कर लेता है और पाकिस्तान एक स्थिर राष्ट्र के रूप में काम नहीं कर पाता, तो अंततः वहां के लोगों को भारत की मुख्यधारा (Fold of Bharat) में ही लाना होगा या उन्हें शांति से रहने देना होगा। उसके लिए भी बातचीत का रास्ता खुला रहना ज़रूरी है।