EAC-PM की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 52.8% युवा ग्रेजुएट कम कौशल वाली नौकरियों में काम कर रहे हैं। उच्च शिक्षा, बेरोजगारी, स्किल गैप और रोजगार संकट गहराता जा रहा है।
कम स्किल वाले जॉब कर रहे हैं ग्रेजुएट युवक
भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं के सामने रोजगार का गंभीर संकट सामने आया है। देश में कॉलेज और विश्वविद्यालयों में दाखिले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी युवाओं को उनकी योग्यता और डिग्री के अनुरूप नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (Economic Advisory Council to the Prime Minister-EAC-PM) के एक नए वर्किंग पेपर में खुलासा हुआ है कि रोजगार में लगे आधे से ज्यादा युवा ग्रेजुएट ऐसे काम कर रहे हैं, जिन्हें कम कौशल (Low-Skill) वाली नौकरियों की श्रेणी में रखा गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 में रोजगार हासिल कर चुके युवा ग्रेजुएटों में से 52.8 प्रतिशत कम कौशल वाले व्यवसायों में काम कर रहे थे। वहीं, ग्रेजुएट या उससे अधिक शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं में 57.8 प्रतिशत नियमित वेतन वाली नौकरियों में थे, लेकिन इनमें से केवल 36.1 प्रतिशत ही औपचारिक रोजगार (Formal Employment) में शामिल थे।
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब सरकार लगातार उच्च शिक्षा के विस्तार और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के जरिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार का दावा कर रही है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा हासिल करने और बेहतर रोजगार मिलने के बीच एक बड़ी खाई बनी हुई है।
EAC-PM की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, EAC-PM का यह वर्किंग पेपर नवंबर 2026 में प्रकाशित हुआ है। इसका शीर्षक है:
How India is Transforming Educational Capacity under the New Education Policy 2020: School Networks, Higher Education and Pathways to Work.
इस रिपोर्ट को EAC-PM के सदस्य और भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष तथा SBI के अर्थशास्त्री शशिधरन शर्मा ने तैयार किया है।रिपोर्ट में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) और इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट (IHD) की इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है।
इसके मुताबिक:
- - 52.8 प्रतिशत: 2022 में रोजगार कर रहे युवा ग्रेजुएट कम कौशल वाली नौकरियों में लगे थे।
- - 57.8 प्रतिशत: ग्रेजुएट या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त युवाओं को नियमित वेतन वाली नौकरी मिली हुई थी।
- - 36.1 प्रतिशत: ग्रेजुएट युवाओं का हिस्सा औपचारिक रोजगार में था।
- - 5 प्रतिशत: 15 से 29 वर्ष की आयु के युवाओं को ही औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण मिला था।
ये आंकड़े बताते हैं कि डिग्री हासिल करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवा बेहतर कौशल और रोजगार के अवसरों से वंचित हैं।
डिग्रियों की बढ़ती संख्या, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता में सुधार नहीं
रिपोर्ट में इस समस्या को 'क्वालिफिकेशन कंजेशन' (Qualification Congestion) कहा गया है। इसका मतलब है कि देश में डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन डिग्री के आधार पर बेहतर नौकरी मिलने की संभावनाएं उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही हैं। भारतीय परिवार आज भी डिग्री को सामाजिक और आर्थिक तरक्की का सबसे सुरक्षित रास्ता मानते हैं। माता-पिता बच्चों की पढ़ाई पर बड़ी रकम खर्च करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उच्च शिक्षा के बाद उन्हें अच्छी नौकरी मिलेगी।लेकिन कंपनियां अब केवल डिग्री देखकर उम्मीदवारों का चयन नहीं कर रही हैं। वे यह भी देखती हैं कि उम्मीदवार ने किस संस्थान से पढ़ाई की है, उसका विषय क्या था, परीक्षा में उसका प्रदर्शन कैसा रहा, उसके पास इंटर्नशिप और काम का कितना अनुभव है और उसके पेशेवर संपर्क कितने मजबूत हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सामान्य डिग्री बेकार नहीं हुई है, लेकिन अब केवल डिग्री अपने आप में उम्मीदवार की योग्यता का पर्याप्त संकेत नहीं रह गई है। इसका मतलब है कि एक ही डिग्री रखने वाले दो उम्मीदवारों के रोजगार के अवसरों में उनके कॉलेज, विषय, अनुभव और व्यावहारिक प्रशिक्षण के आधार पर बड़ा अंतर हो सकता है।
व्यावसायिक प्रशिक्षण के विकल्प बेहद सीमित
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया है। भारत में युवाओं के लिए पारंपरिक कॉलेज शिक्षा के अलावा व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण के विकल्प अभी भी बहुत सीमित हैं। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के मुताबिक, 15 से 29 वर्ष के केवल 5 प्रतिशत युवाओं को औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण मिला है।इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में युवा कॉलेजों से डिग्री तो हासिल कर रहे हैं, लेकिन उनके पास उद्योगों की जरूरत के मुताबिक व्यावहारिक कौशल विकसित करने के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि व्यावसायिक शिक्षा को केवल पारंपरिक डिग्री का विकल्प बनाकर पेश करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें व्यावसायिक प्रशिक्षण से हासिल योग्यता को मान्यता मिले, युवाओं को उचित वेतन मिले और उनके लिए आगे उच्च शिक्षा तथा बेहतर रोजगार में जाने के रास्ते खुले रहें।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह समस्या युवाओं की महत्वाकांक्षा की गलती नहीं है, बल्कि शिक्षा और रोजगार व्यवस्था के बीच मौजूद संस्थागत असंतुलन का नतीजा है।
घट रही हैं देश में प्राइमरी स्कूलों की संख्या
EAC-PM की रिपोर्ट में केवल उच्च शिक्षा और रोजगार ही नहीं, बल्कि देश के स्कूल नेटवर्क में हो रहे बदलावों का भी विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) 2019 में 2.1 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 रह गई। इसका असर स्कूली उम्र की आबादी पर भी पड़ रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक:
- - 2011 में 5 से 9 वर्ष की आयु के बच्चों की संख्या 12.53 करोड़ थी।
- - 2026 में इसके घटकर 11.27 करोड़ होने का अनुमान है।
- - 2036 तक यह संख्या घटकर 10.02 करोड़ रह सकती है।
बच्चों की घटती संख्या और स्कूलों के संचालन में आ रही दिक्कतों के बीच देश में स्कूलों की कुल संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है।
2018-19 में भारत में कुल 15.51 लाख स्कूल दर्ज थे। 2025-26 में यह संख्या घटकर 14.67 लाख रह गई। यानी सात वर्षों में 84 हजार स्कूलों की कमी दर्ज की गई, जो लगभग 5.4 प्रतिशत है। हालांकि, स्कूलों की संख्या में कमी का मतलब यह नहीं है कि इतने ही स्कूल बंद कर दिए गए हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि स्कूलों के अपग्रेड होने, विलय, प्रबंधन में बदलाव और प्रशासनिक रिकॉर्ड में सुधार के कारण भी आंकड़ों में बदलाव आ सकता है।
प्राइमरी स्कूलों में ज्यादा गिरावट, 12वीं तक शिक्षा देने वाले स्कूल बढ़ेः रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा गिरावट केवल प्राथमिक कक्षाओं यानी कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई कराने वाले स्कूलों में हुई है। 2018-19 में ऐसे स्कूलों की संख्या 8.27 लाख थी, जो 2025-26 में घटकर 7.22 लाख रह गई। इस तरह इनकी संख्या में 1.05 लाख यानी 12.6 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके उलट, कक्षा 12वीं तक शिक्षा देने वाले स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई है। 2018-19 में ऐसे स्कूलों की संख्या 1.30 लाख थी, जो 2025-26 में बढ़कर 1.69 लाख हो गई। यानी लगभग 29.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट का कहना है कि छोटे स्कूलों के सामने पर्याप्त शिक्षक, बुनियादी सुविधाएं और विद्यार्थियों को व्यापक शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने की चुनौती होती है। इस समस्या के समाधान के लिए नई शिक्षा नीति 2020 में स्कूल कॉम्प्लेक्स और क्लस्टर की व्यवस्था का सुझाव दिया गया है। इसके तहत आसपास के स्कूल शिक्षक, प्रयोगशालाएं, आधारभूत सुविधाएं और प्रशासनिक संसाधन साझा कर सकते हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य हर छोटे स्कूल को बंद करना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि बच्चों की घटती आबादी को स्कूल बंद करने का स्वतः आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। स्कूलों से जुड़े फैसले स्थानीय जरूरतों, भौगोलिक परिस्थितियों, सड़क संपर्क, बच्चों की सुरक्षा और आसपास के स्कूलों की क्षमता को ध्यान में रखकर होने चाहिए।
ग्रामीण इलाकों में घटे विद्यार्थी, शहरों में बढ़े दाखिले
रिपोर्ट में ग्रामीण और शहरी स्कूलों में दाखिलों के बदलते रुझान का भी उल्लेख किया गया है। 2012-13 से 2021-22 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में लगभग 78 लाख की गिरावट आई। इसके उलट, शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 93 लाख बढ़ गई। इससे स्पष्ट होता है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षा की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं। कुछ इलाकों में स्कूलों की क्षमता बढ़ाने की जरूरत है, जबकि कुछ क्षेत्रों में विद्यार्थियों की संख्या कम हो रही है। रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि स्कूल नेटवर्क बनाते समय केवल स्कूलों की संख्या नहीं, बल्कि विद्यार्थियों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
उच्च शिक्षा में 31.5 प्रतिशत विस्तार, लेकिन शिक्षकों की कमी बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में हुए विस्तार का भी उल्लेख किया गया है। 2014-15 में देश में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों की अनुमानित संख्या 3.42 करोड़ थी। 2023-24 में यह बढ़कर 4.50 करोड़ हो गई। इस तरह उच्च शिक्षा में दाखिलों में 31.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लेकिन इस विस्तार के मुकाबले शिक्षकों की संख्या में उतनी वृद्धि नहीं हुई।
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 में उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की संख्या 14.73 लाख थी। 2023-24 में सर्वे में जवाब देने वाले संस्थानों के लिए यह संख्या बढ़कर 17.32 लाख दर्ज की गई। इसमें लगभग 17.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो विद्यार्थियों की अनुमानित संख्या में हुई 31.5 प्रतिशत की वृद्धि से कम है। हालांकि, रिपोर्ट के लेखकों ने स्पष्ट किया है कि दोनों वर्षों के आंकड़ों में सर्वे कवरेज और वर्गीकरण का अंतर है। इसलिए इनकी सीधी तुलना को पूरी तरह समान आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।एक तरफ लाखों परिवार अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की उम्मीद में उच्च शिक्षा दिला रहे हैं, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में युवा अपनी योग्यता से कम कौशल वाले काम करने को मजबूर हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार का पैमाना केवल दाखिलों और डिग्रियों की संख्या नहीं होना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि शिक्षा पूरी करने के बाद युवाओं को किस तरह का रोजगार मिल रहा है, उन्हें कितना वेतन मिल रहा है और उनके पास आगे बढ़ने के कितने अवसर हैं।