अमेरिका ने भारत, लाओस और इंडोनेशिया से सौर पैनल आयात की आधिकारिक जांच शुरू कर दी है। इस वजह से भारत सहित इन देशों पर नए टैरिफ लग सकते हैं। इससे नई दिल्ली के साथ अमेरिका व्यापारिक संबंधों पर और दबाव पड़ सकता है। 
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग (आईटीसी) ने शुक्रवार को आमराय से इस जांच को आगे बढ़ाने के लिए मतदान किया। यह जांच इस दावे पर केंद्रित है कि चीनी समर्थित कंपनियां इन देशों का इस्तेमाल मौजूदा शुल्कों से बचने और अमेरिकी बाजार में सस्ते सोलर पैनल की बाढ़ लाने के लिए कर रही हैं। यानी चीन के सोलर पैनल भारत आ रहे हैं और फिर भारत से इन्हें अमेरिकी मार्केट में भेजा जा रहा है। 
आईटीसी का निर्णय प्रक्रियात्मक लेकिन महत्वपूर्ण है। यह अमेरिकी सोलर पैनल निर्माताओं के लिए एक जीत है, जो तर्क देते हैं कि भारत और अन्य देशों से सस्ते आयात की बाढ़ घरेलू उत्पादन को नुकसान पहुंचा रही है और स्वच्छ ऊर्जा में अरबों डॉलर के निवेश को खतरे में डाल रही है। 
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मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेड गठबंधन के प्रमुख वकील टिम ब्राइटबिल ने कहा- “आज का आईटीसी निर्णय हमारी याचिकाओं में किए गए दावों की पुष्टि करता है।” टिम ने कहा- “लाओस, इंडोनेशिया और भारत में चीनी स्वामित्व वाली और अन्य कंपनियां अनुचित प्रथाओं के साथ सिस्टम का दुरुपयोग कर रही हैं, जो अमेरिकी नौकरियों और निवेश को नष्ट कर रही हैं।” 
यह मामला जुलाई में फर्स्ट सोलर और क्यूसेल्स जैसी प्रमुख सौर कंपनियों के गठबंधन द्वारा दायर किया गया था। उनके डेटा के अनुसार, 2023 में इन तीनों देशों से आयात बढ़कर 1.6 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष के 289 मिलियन डॉलर से काफी अधिक है। माना जाता है कि इसमें से अधिकांश आयात उन देशों से हो रहा है जो पहले से ही अमेरिकी शुल्कों का सामना कर रहे हैं। 
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भारत और अन्य देशों में संचालित चीनी कंपनियां सरकारी सब्सिडी प्राप्त करती हैं और उत्पादन लागत से नीचे बिक्री करती हैं, जो अमेरिकी व्यापार कानूनों का उल्लंघन है। हालांकि जांच तीनों देशों को लक्षित करती है, भारत जो पहले से ही अलग-अलग शुल्कों और वीजा प्रतिबंधों को लेकर वाशिंगटन के साथ तनाव में है। अब अपने तेजी से बढ़ते सौर निर्यात क्षेत्र पर संभावित प्रभाव का सामना कर रहा है। 
वाणिज्य विभाग अब अपनी समानांतर जांच आगे बढ़ाएगा, जिसमें 10 अक्टूबर तक सब्सिडी-विरोधी शुल्कों पर प्रारंभिक निर्णय और 24 दिसंबर तक डंपिंग-विरोधी निर्धारण की उम्मीद है।
इस जांच का नतीजा अमेरिकी सोलर डेवलपर्स की सोर्सिंग रणनीतियों को नया रूप दे सकता है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में व्यापार गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए, यह जांच ऐसे समय में आई है जब वह “मेक इन इंडिया” पहल के तहत सौर विनिर्माण में वैश्विक निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। जिससे यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है।

भारत की सोलर पैनल इंडस्ट्री के हालात 

भारत की सौर पैनल इंडस्ट्री हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है और यह देश की अक्षय ऊर्जा नीतियों के कारण वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है। 2018 में भारत की सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 22 गीगावाट थी, जो 2022 तक बढ़कर लगभग 61 गीगावाट हो गई। भारत में सौर पैनल उद्योग का बाजार आकार 2023 में लगभग 1.6 अरब डॉलर के आयात के साथ उल्लेखनीय रूप से बढ़ा, जिसमें से काफी हिस्सा भारत, लाओस और इंडोनेशिया जैसे देशों से आया। प्रमुख कंपनियां जैसे टाटा, अडानी सोलर और लूम सोलर ने घरेलू और व्यावसायिक उपयोग के लिए 10 वॉट से 730 वॉट तक के सौर पैनल के प्रोडक्शन में योगदान दिया है, जिससे भारत सौर ऊर्जा उत्पादन में वैश्विक लीडर बनने की दिशा में अग्रसर है।
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हालांकि, 2022 में ग्लोबल सप्लाई चेन में व्यवधान और नीतिगत बदलावों के कारण उद्योग को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन सरकारी सब्सिडी और नवीकरणीय ऊर्जा पर बढ़ते जोर ने इस क्षेत्र को स्थिरता प्रदान की है। सौर पैनल प्लांट स्थापित करने के लिए 4-5 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होती है, जो इस क्षेत्र में छोटे और बड़े व्यवसायों के लिए आकर्षक अवसर प्रदान करता है। इसके अलावा, भारत का अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) में नेतृत्व और 2022 तक 20 गीगावाट सौर उत्पादन के लक्ष्य ने इस उद्योग को और मजबूती दी है, जिससे यह भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन गया है।