ईरान युद्ध का असर भारत में दिखाई देना लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें उछल गई हैं, जिसकी वजह से भारत का शेयर बाजार धड़ाम हो गया है, रुपया और टूट गया है। कुकिंग गैस की कीमतें 60 रुपये पहले ही बढ़ चुकी हैं।
मिडिल ईस्ट में तेज़ होते युद्ध और आपूर्ति बाधित होने की आशंका के बीच वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें एक ही दिन में 25 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 115–118 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं। इसे हाल के वर्षों में सबसे बड़ी दैनिक बढ़ोतरी में से एक माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध लंबा चला तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं। इस बीच डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी कमजोर होकर करीब 92 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक फिसल गया है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
सप्लाई बाधित होने की आशंका से बढ़ी कीमतें
तेल की कीमतों में यह तेज़ उछाल मुख्य रूप से मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण आया है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि फारस की खाड़ी के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बाधा आती है तो वैश्विक तेल सप्लाई पर गंभीर असर पड़ सकता है।दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है, इसलिए किसी भी सैन्य टकराव या अवरोध की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में घबराहट बढ़ गई है।
भारत पर बढ़ेगा आयात बिल
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी जरूरत का लगभग 80–85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेज़ वृद्धि से भारत का आयात बिल काफी बढ़ सकता है।आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 1.5 से 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर देश के व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है।
रुपये पर दबाव
तेल महंगा होने के कारण भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है। हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब 92 रुपये प्रति डॉलर तक गिर गया है।विश्लेषकों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं तो रुपये में और कमजोरी देखने को मिल सकती है।
महंगाई बढ़ने की आशंका
तेल की कीमतों में तेजी का असर आम लोगों पर भी पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत बढ़ जाती है, जिससे खाद्य पदार्थों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। इसके अलावा रसोई गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है, जिससे देश में महंगाई दर पर दबाव बढ़ सकता है।शेयर बाज़ार प्रभावितः तेल की कीमतों में तेज़ उछाल और वैश्विक अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखा गया। निवेशकों की चिंता के कारण बाजार में तेज़ बिकवाली हुई और प्रमुख सूचकांकों में भारी गिरावट दर्ज की गई।विशेष रूप से एयरलाइन, परिवहन, केमिकल और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के शेयरों पर अधिक दबाव देखा गया, क्योंकि इन क्षेत्रों की लागत का बड़ा हिस्सा ईंधन पर निर्भर होता है।
सरकार को चुनौतीः विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य-पूर्व का संकट लंबे समय तक बना रहता है तो भारत सरकार को महंगाई और रुपये को स्थिर रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसमें रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग, सस्ते स्रोतों से आयात बढ़ाना और आर्थिक नीतिगत हस्तक्षेप शामिल हो सकते हैं।
तेल की कीमत 150 डॉलर तक पहुंचने से भारत की आर्थिक वृद्धि (GDP growth) भी प्रभावित हो सकती है। कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ने से उद्योगों और परिवहन क्षेत्र पर दबाव बढ़ेगा, जबकि आम लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो सकती है। इसका असर शेयर बाजार और निवेश पर भी पड़ सकता है, खासकर एयरलाइन, लॉजिस्टिक्स, केमिकल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर। यदि ऐसी स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो भारत की अर्थव्यवस्था में धीमापन आ सकता है और सरकार व रिजर्व बैंक को आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं।
फिलहाल वैश्विक बाजार की नजर मध्य-पूर्व की स्थिति पर टिकी हुई है। यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है, जिसका असर भारत सहित दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।