ऐसे तेल संकट के समय भारत आ रहा ईरानी कच्चे तेल का टैंकर गुजरात के पास अचानक रास्ता बदलकर अब चीन की ओर क्यों बढ़ गया? पढ़ें इसके पीछे की वजह क्या है।
भारत सात साल बाद पहली बार ईरानी कच्चा तेल खरीदने वाला था, लेकिन उसकी उम्मीद पर पानी फिर गया। ईरान से कच्चा तेल ला रहे टैंकर पिंग शुन ने गुजरात के वडिनार बंदरगाह के बहुत करीब पहुंचकर अचानक अपना रास्ता बदल लिया है। अब यह टैंकर चीन के डोंगयिंग बंदरगाह की ओर मुड़ गया है।
6 लाख बैरल कच्चा तेल है टैंकर में
शिप ट्रैकिंग डेटा और कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर के अनुसार, ईस्वातिनी झंडे वाला यह टैंकर लगभग 6 लाख बैरल ईरानी कच्चा तेल लेकर जा रहा था। गुरुवार दोपहर तक यह वडिनार बंदरगाह पर पहुंचने वाला था, लेकिन बाद में उसने दक्षिण की ओर तेज मुड़ाव लिया और अपना घोषित गंतव्य बदलकर चीन के शेडोंग प्रांत में डोंगयिंग बंदरगाह बता दिया।मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस बदलाव की मुख्य वजह भुगतान संबंधी समस्या हो सकती है। विक्रेता अब पहले की तरह 30-60 दिन का क्रेडिट नहीं देना चाहते, बल्कि तुरंत या बहुत जल्दी पैसे मांग रहे हैं। हालाँकि, इसकी अभी तक आधिकारिक रूप स पुष्टि नहीं हो पाई है।
टैंकर ईरानी तेल लेकर कैसे निकल पाया?
यह टैंकर मार्च की शुरुआत में ईरान के मुख्य तेल केंद्र खार्ग द्वीप से तेल लादकर चला था। इस हफ्ते की शुरुआत में यह भारत की ओर आ रहा था। कुछ दिनों तक वडिनार को अपना गंतव्य दिखा रहा था। अगर यह पहुंच जाता तो मई 2019 के बाद भारत में पहली बार ईरानी कच्चा तेल आता। कहा जा रहा है कि यदि पहले से ही चीन जाना होता तो टैंकर का रास्ता बिल्कुल अलग होता। इसलिए यह साफ़ है कि यह भारत ही आ रहा था, लेकिन आखिरी वक़्त में समस्या आ गई।
अमेरिका ने प्रतिबंध क्यों हटाए थे?
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है और क़ीमतें बढ़ रही हैं। इसलिए अमेरिका ने 21 मार्च को 30 दिन की विशेष छूट दी। इस छूट के तहत 20 मार्च तक लादे गए ईरानी तेल को 19 अप्रैल तक बेचा, खरीदा और उतारा जा सकता है। यह छूट रूसी तेल के लिए पहले दी गई छूट जैसी ही थी।
भारत ने 2019 में अमेरिकी प्रतिबंध के कारण ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। अब यह छोटी खिड़की खुली थी, लेकिन भुगतान की दिक्कतें बनी हुई हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार केप्लर के मैनेजर सुमित रितोलिया ने कहा, 'भुगतान संबंधी मुद्दों के कारण यह बदलाव लगता है। विक्रेता अब क्रेडिट विंडो से दूर हटकर तुरंत या नजदीकी भुगतान की ओर जा रहे हैं। ईरानी तेल के साथ बीच यात्रा में गंतव्य बदलना नया नहीं है, लेकिन यह दिखाता है कि वित्तीय शर्तें और जोखिम अब लॉजिस्टिक्स जितने ही अहम हो गए हैं। अगर भुगतान की समस्या सुलझ गई तो यह कार्गो अभी भी भारतीय रिफाइनरी तक पहुँच सकता है।'
भुगतान क्यों मुश्किल है?
ईरान और उसके बैंक दुनिया के मुख्य अंतरराष्ट्रीय भुगतान सिस्टम SWIFT से बाहर हैं। ज़्यादातर बैंक ईरानी सिस्टम से लेन-देन करने से डरते हैं। चीन कई साल से ईरान का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और 90% से ज़्यादा तेल चीन जाता है, इसलिए चीन के लिए भुगतान आसान है।भारत ने कब खरीदा था ईरानी तेल
अमेरिका द्वारा ईरानी तेल पर प्रतिबंध लगाए जाने से पहले भारत ईरान से काफ़ी तेल खरीदता था। 2009-10 में 22.1 मिलियन टन यानी कुल आयात का 14.4% तेल ईरान से खरीदा गया। 2016-17 में 27.1 मिलियन टन ख़रीदा गया था। ईरान भारत को डिस्काउंट शिपिंग और लंबा क्रेडिट देता था। लेकिन ट्रंप प्रशासन के प्रतिबंध के बाद 2019 में आयात पूरी तरह बंद हो गया। अब भारत अपनी 88% से ज़्यादा तेल ज़रूरत आयात से पूरी करता है। हाल के महीनों में होर्मुज स्ट्रेट से आधे से ज्यादा तेल गुजरता था, लेकिन युद्ध के कारण वह रास्ता प्रभावित है।
क्या यह तेल अभी भी भारत आ सकता है?
रिपोर्ट है कि यदि यह भुगतान की समस्या सुलझ गई तो यह कार्गो अभी भी भारत आ सकता है। लेकिन यह घटना दिखाती है कि प्रतिबंध में छूट मिलने के बावजूद वाणिज्यिक शर्तें बेहद अहम हैं। चीन ईरानी तेल का मुख्य बाजार बना हुआ है। युद्ध के कारण हर बैरल तेल मायने रखता है, लेकिन भुगतान और जोखिम अभी भी बड़ी बाधा बने हुए हैं।