इसरो के प्रमुख कर्मचारी संगठनों ने चेयरमैन वी नारायणन को पत्र लिखकर स्पेस प्राइवेटाइजेशन, मौजूदा वर्कफोर्स और भविष्य की भूमिका पर चिंता जताई है। IN-SPACe के प्रमुख पवन गोयनका के इस बयान से उनकी चिंता बढ़ गई कि ISRO लॉन्च व्हीकल नहीं बनाएगा।
इसरो लॉन्च व्हीकल (फाइल फोटो)
ISRO यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण को लेकर गंभीर चिंता जताई है। इसरो के विभिन्न केंद्रों के कर्मचारी संगठनों ने इसरो अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ. वी. नारायणन को पत्र लिखकर सरकार की नीति पर सफ़ाई मांगी है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि रॉकेट और उपग्रह बनाने जैसे अहम काम निजी कंपनियों को सौंप दिए गए तो इसरो की भूमिका, कर्मचारियों का भविष्य और देश की रणनीतिक क्षमता पर असर पड़ सकता है।
कर्मचारियों ने कहा है कि रॉकेट को डिज़ाइन करने, उसे इंटीग्रेट करने, टेस्ट करने और लॉन्च करने में विशेषज्ञता, सुरक्षा प्रक्रियाएं और तकनीकी क्षमताएं जैसी दशकों की जमा-पूंजी होती है। उन्होंने कहा है कि एक झटके में ये सब निजी कंपनियों के हाथ में जा सकती है। इसरो कर्मचारी संगठनों का यह पत्र तब लिखा गया है जब हाल ही में इसरो ने जीएसएलवी रॉकेट के जरिए एक उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया है। हालाँकि मिशन सफल रहा, लेकिन कर्मचारियों के बीच भविष्य को लेकर असमंजस बढ़ता दिखाई दे रहा है।
IN-SPACe प्रमुख के बयान से बढ़ी चिंता
कर्मचारी संगठनों की चिंता की बड़ी वजह 21 अगस्त को IN-SPACe यानी इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर के अध्यक्ष पवन गोयनका का एक बयान है। उन्होंने कहा था कि भविष्य में इसरो लॉन्च व्हीकल यानी रॉकेट का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी कंपनियां या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां करेंगी। उन्होंने यह भी कहा था कि इसरो केवल विशेष वैज्ञानिक मिशनों, नई तकनीक विकसित करने और अनुसंधान पर ध्यान देगा।
इस बयान के बाद कर्मचारी संगठनों ने पूछा है कि क्या यह सरकार का आधिकारिक फैसला है या केवल व्यक्तिगत राय। उनका कहना है कि इस बारे में अंतरिक्ष विभाग की ओर से कोई औपचारिक नीति या आदेश जारी नहीं किया गया है।
चेयरमैन से मांगा लिखित जवाब
कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में डॉ. वी. नारायणन से लिखित स्पष्टीकरण देने की मांग की है। उन्होंने कई बड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि क्या वास्तव में सरकार ने तय कर लिया है कि इसरो भविष्य में रॉकेट और सामान्य उपग्रह नहीं बनाएगा? इसरो की भविष्य की भूमिका क्या होगी? क्या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी निर्माण कार्य से बाहर किया जाएगा? वर्तमान कर्मचारियों के हितों की रक्षा कैसे होगी?इसरो कर्मचारियों ने यह भी पूछा है कि सरकारी पैसे से विकसित तकनीक निजी कंपनियों को किस प्रक्रिया के तहत दी जा रही है? क्या इस तरह के बड़े फ़ैसलों से पहले कर्मचारी संगठनों से चर्चा की जाएगी?
कर्मचारियों को किस बात का डर?
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि रॉकेट बनाना केवल मैन्युफैक्चरिंग का काम नहीं है। इसमें डिजाइन, परीक्षण, इंटीग्रेशन, सुरक्षा और दशकों का अनुभव शामिल होता है। यदि यह पूरा काम धीरे-धीरे निजी कंपनियों को सौंप दिया गया तो इसरो अपनी सबसे बड़ी तकनीकी क्षमता गँवा सकता है।
कर्मचारियों का यह भी कहना है कि अगर वही काम निजी कंपनियां करेंगी जो अभी इसरो के वैज्ञानिक और इंजीनियर करते हैं तो भविष्य में कर्मचारियों के लिए काम कम होगा, पदोन्नति के अवसर घटेंगे और नई भर्तियां भी कम हो जाएंगी।भर्ती पर भी जताई चिंता
कर्मचारियों के पत्र में कहा गया है कि इसरो पहले से ही कर्मचारियों की कमी का सामना कर रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 तक इसरो में 18142 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 15529 कर्मचारी कार्यरत थे। यानी क़रीब 14.4 प्रतिशत पद खाली हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि यदि मुख्य काम निजी कंपनियों को सौंप दिया गया तो भविष्य में नियमित भर्ती और भी कम हो जाएगी। इससे प्रतिभाशाली युवाओं के लिए इसरो में करियर बनाने के अवसर घट जाएंगे।
रणनीतिक सुरक्षा पर भी सवाल
कर्मचारी संगठनों ने यह भी कहा है कि अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक महत्व का विषय भी है। उनका मानना है कि अहम लॉन्च व्हीकल और उपग्रह निर्माण जैसी क्षमताएं किसी सरकारी संस्था के पास ही रहनी चाहिए ताकि गुणवत्ता, जवाबदेही और सुरक्षा बरकरार रह सके। उनका कहना है कि यदि इसरो इन क्षमताओं से दूर हो गया तो भविष्य में देश की रणनीतिक आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है।'निजी क्षेत्र का विरोध नहीं'
कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में साफ़ किया है कि वे निजी कंपनियों के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि वे भारतीय उद्योग की भागीदारी और अंतरिक्ष क्षेत्र के व्यावसायीकरण का समर्थन करते हैं। हालाँकि उनका मानना है कि निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने और इसरो की मूल क्षमताओं को खत्म करने में फर्क होना चाहिए। उनका कहना है कि भारत मजबूत निजी अंतरिक्ष उद्योग विकसित कर सकता है, लेकिन इसके लिए इसरो की तकनीकी और निर्माण क्षमता कमजोर नहीं होनी चाहिए।
वैसे, मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के डेपुटी महानिदेशक अजय लेले का मानना है कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलना जरूरी है और इससे देश वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अधिक हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार लेले ने चेतावनी भी दी है कि इसरो को पूरी तरह निजी कंपनियों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और मानवयुक्त चंद्र मिशन जैसे बड़े कार्यक्रमों के बीच इसरो को कम से कम रणनीतिक और अहम उपग्रहों के लिए अपने लॉन्च व्हीकल विकसित और संचालित करने की क्षमता बनाए रखनी चाहिए।सरकार ने 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोला था। इसके तहत इसरो का मक़सद निजी कंपनियों को तकनीकी सहयोग देना और नियमित व्यावसायिक कार्य धीरे-धीरे उद्योग को सौंपना बताया गया था, जबकि इसरो अनुसंधान, नई तकनीक और वैज्ञानिक मिशनों पर ध्यान केंद्रित करेगा।
अब कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस नीति की सीमाएं तय की जाएं ताकि यह साफ़ हो सके कि कौन-से कार्य इसरो के पास रहेंगे और कौन-से निजी क्षेत्र को दिए जाएंगे।
फिलहाल इस मामले में न तो इसरो अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन और न ही IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाकर अंतरिक्ष उद्योग का विस्तार करना चाहती है, वहीं इसरो के कर्मचारी चाहते हैं कि संस्थान की मूल वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता सुरक्षित रहे तथा कर्मचारियों के भविष्य को लेकर साफ़ नीति सामने लाई जाए।