भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की PSLV-C62 उड़ान विफल हो गई, जिसमें 16 उपग्रह सफलतापूर्वक कक्षा में नहीं पहुंच पाए। जानें असफलता के कारण और मिशन पर इसका असर क्या हो सकता है।
देश के अंतरिक्ष अभियान को सोमवार को बड़ा झटका लगा है। इसरो की पीएसएलवी-C62 उड़ान विफल हो गई है। यह आठ महीने में दूसरी बड़ी विफलता है। सोमवार सुबह पूरे देश की नजरें श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र पर टिकी थीं। इसरो ने रॉकेट को 10:17 बजे लॉन्च किया। रॉकेट बहुत शानदार तरीके से आसमान में उड़ा और पहले दो स्टेज बिल्कुल ठीक काम किए। लाखों लोग टीवी और मोबाइल पर इसे लाइव देख रहे थे और खुशी से तालियाँ बजा रहे थे। लेकिन तीसरे स्टेज के इग्निशन के बाद अचानक चुप्पी छा गई। मिशन कंट्रोल रूम में कोई डेटा नहीं आया। कुछ ही मिनटों में इसरो ने घोषणा कर दी कि इस मिशन में गड़बड़ी आ गई है। यानी यह अभियान असफल हो गया। रॉकेट में लगे सभी 16 उपग्रह अपनी कक्षा में नहीं पहुँच पाए और खो गए।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन ने बताया, 'तीसरे स्टेज के अंत तक रॉकेट का प्रदर्शन सामान्य था। उसके बाद रोल रेट (घूमने की गति) में अचानक गड़बड़ी हुई और उड़ान के मार्ग से भटकाव दिखा। हम पूरी डेटा की जांच कर रहे हैं और जल्द ही और जानकारी देंगे।' इसरो ने भी एक्स पर पोस्ट कर कहा है कि इस मिशन के आख़िरी चरण में गड़बड़ी आ गई है।
मिशन में क्या-क्या था?
इस पीएसएलवी-डीएल रॉकेट का वजह 260 टन था और यह कुल 16 उपग्रह ले जा रहा था। इन सबमें सबसे प्रमुख उपग्रह डीआरडीओ का EOS-N1 था। यह उपग्रह समुद्र पर नज़र रखने और नौसेना की निगरानी के लिए बनाया गया था। इसके अलावा 15 छोटे उपग्रह भी थे, जिनमें भारतीय छात्रों के प्रयोग, निजी कंपनियों के उपकरण और स्पेन का KID री-एंट्री डेमोंस्ट्रेटर शामिल था। सभी उपग्रहों को 505 किलोमीटर ऊँची सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में भेजना था।
कहाँ हुई गड़बड़ी?
रॉकेट ने पहले चरण के सॉलिड बूस्टर को बहुत अच्छे से अलग किया। लेकिन लॉन्च के क़रीब 8 मिनट बाद तीसरे स्टेज में दिक्कत आ गई। यह वही समस्या है जो पिछले साल पीएसएलवी-C61 मिशन में हुई थी। पिछले साल के अभियान में भी तीसरे स्टेज में चैंबर प्रेशर कम होने से EOS-09 उपग्रह खो गया था। इस बार भी रॉकेट अपनी निर्धारित राह से भटक गया। इसरो ने कहा है कि अब विफलता की जाँच करने वाली एक कमिटी बनाई जाएगी, जो पूरी जांच करेगी। अभी तक गड़बड़ी की सटीक वजह नहीं बताई गई है।पीएसएलवी की साख पर सवाल
पीएसएलवी भारत का सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाता है। अब तक इसकी 63 उड़ानें सफल रही हैं और सफलता दर 94% से ज्यादा है। इसी रॉकेट ने चंद्रयान-1, मंगलयान और आदित्य-L1 जैसे बड़े मिशन सफल किए। लेकिन अब पिछले 8 महीनों में यह दूसरी बार विफल हुआ है। इससे मिशन की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारों का कहना है कि बार-बार तीसरे स्टेज में दिक्कत आ रही है। क्या सॉलिड ईंधन या नोजल में कोई समस्या है? या फिर 2026 में बहुत जल्दी-जल्दी मिशन करने की वजह से दबाव बढ़ गया है? इन सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं। पूरी जाँच के बाद ही इसकी सटीक जानकारी सामने आ सकती है और इसके बाद इसमें सुधार किया जा सकता है ताकि अगले अभियान से ऐसी दिक्कतें न आएँ। भविष्य पर होगा असर?
इसरो की कमर्शियल कंपनी एनएसआईएल के ज़रिए कई निजी उपग्रह भी लॉन्च होने थे। इस विफलता से निजी अंतरिक्ष कंपनियों का भरोसा डगमगा सकता है। भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अभी बढ़ रहा है, लेकिन ऐसी घटनाएँ इसकी रफ्तार को धीमा कर सकती हैं।
इस साल इसरो का लक्ष्य 100 से ज़्यादा उपग्रह लॉन्च करना, नविक नेविगेशन सिस्टम को मज़बूत करना और गगनयान मिशन की तैयारी करना था। अब यह लक्ष्य मुश्किल लग रहा है। इसके साथ ही, अब निजी कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को चुनौती दे रही हैं।
इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन ने कहा है कि उनकी टीम जल्दी ही रिकवरी करेगी। पीएसएलवी का डिजाइन मॉड्यूलर है, यानी इसमें जल्दी सुधार किया जा सकता है। साथ ही जरूरत पड़ने पर एलवीएम3 जैसे बड़े रॉकेट का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इसरो ने हमेशा आत्मनिर्भरता पर जोर दिया है और अब भी वैज्ञानिक पूरी मेहनत से काम कर रहे हैं।
यह झटका बड़ा है, लेकिन भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का इतिहास बताता है कि वे मुश्किलों से लड़कर और मज़बूत होकर वापस आते हैं। वैसे भी कहा जाता है कि विफलताएँ सफलता के लिए बड़ा सबक़ देती हैं। उम्मीद है कि जल्द ही इसरो फिर से सफल उड़ानें भरेगा।