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जामिया सीसीटीवी: पूर्व पुलिस अफ़सर बोले- जामिया में हुई ज़्यादती

जामिया मिल्लिया इसलामिया की लाइब्रेरी में पुलिस के घुसने के एक के बाद एक छह वीडियो फ़ुटेज आ गए। इनमें पुलिस को छात्र को बेरहमी से पीटते, तोड़फोड़ करते और सीसीटीवी कैमरे को तोड़ने का प्रयास करते देखा जा सकता है। इस पर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन पुलिस से जुड़े रहे लोगों की नज़र में क्या यह कार्रवाई सही है? क्या पुलिस को ऐसा करने का अधिकार है? और यदि नहीं है तो ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए?

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक विक्रम सिंह ने कहा कि यदि जामिया मिल्लिया इसलामिया में पुलिस द्वारा तोड़फोड़ करने की रिपोर्ट सही है तो यह निंदनीय है और उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ नयी रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पुलिस का काम स्थिति को नियंत्रित करना है न कि ख़ुद ही तोड़फोड़ करने वाले के रूप में पेश आना। उन्होंने ‘द क्विंट’ से ये बातें कहीं। रिपोर्ट के अनुसार, विक्रम सिंह ने कहा, 'लाठीचार्ज उस समय रोक दिया जाना चाहिए था जब लोगों के बाहर जाने का रास्ता नहीं था और वे बाहर नहीं जा पा रहे थे। ऐसे में लाठी को सिर्फ़ फर्श पर पटकना ही काफ़ी था और प्रदर्शन करने वालों के शरीर से लाठी को छूना भी नहीं चाहिए था।'

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रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो को देखने के बाद सिंह ने कहा कि यह देखते हुए कि लगता है कि कुछ उपद्रवी लाइब्रेरी में घुस गए थे और दरवाज़ा बंद कर लिया था, पुलिस को लाइब्रेरी में घुसने का अधिकार था। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि जब वे बाहर जाने में सक्षम नहीं थे तो पुलिस को हल्का लाठीचार्ज कर इसे रोक देना चाहिए था। सिंह ने कहा कि वीडियो में दिख रहा है कि बल का प्रयोग काफ़ी ज़्यादा किया गया और इसकी जाँच की जानी चाहिए।

वीडियो फ़ुटेज में दिख रहा है कि कैसे दिल्ली पुलिस और सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स के सुरक्षाकर्मी 15 दिसंबर को जामिया के ओल्ड रीडिंग रूम में घुसे और छात्रों को बेरहमी से पीटा। फ़ुटेज में यह भी दिख रहा है कि दिल्ली पुलिस का एक सिपाही सीसीटीवी कैमरे को तोड़ने का बार-बार प्रयास करता है। 
सीसीटीवी तोड़ने की कोशिश क्यों की गई? क्या यह साक्ष्य मिटाने का प्रयास नहीं था? और यदि सरकारी अधिकारी और वह भी पुलिस कर्मी सबूत को मिटाता है तो क्या यह मामला ज़्यादा संगीन नहीं हो जाता है और इसमें पुलिस के किसी साज़िश में शामिल होने का संकेत नहीं मिलता है?

‘द क्विंट’ के अनुसार, उत्तर प्रदेश के एक अन्य पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने भी दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई पर बिल्कुल वैसी ही प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सीसीटीवी कैमरे में तोड़फोड़ एक खेदजनक काम है क्योंकि जो कुछ हुआ उसका वह रिकॉर्ड है। ‘द क्विंट’ के अनुसार, मुंबई पुलिस के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रहे वाई पी सिंह ने भी कहा कि जामिया में पुलिस की कार्रवाई की जाँच इसलिए ज़रूरी होनी चाहिए ताकि पता लगाया जा सके कि पुलिस की कार्रवाई उचित थी या नहीं। उन्होंने कहा, 'जिस तरह के थ्रेट परसेप्शन (डर की संभावना) थी उससे कहीं ज़्यादा बल का प्रयोग किया गया लगता है। क्योंकि उन्हें सिर्फ़ हिंसा को रोकने के लिए बल का प्रयोग करना चाहिए था। लाइब्रेरी के अंदर छात्र हिंसा में शामिल नहीं थे और सिर्फ़ एक व्यक्ति के हाथ में पत्थर था। विस्तृत जाँच के बाद ही सही तथ्यों का पता चल पाएगा।'

उन्होंने यह भी कहा कि यदि सीसीटीवी को तोड़ने की बात सही है तो इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए और इसके लिए सज़ा दी जानी चाहिए।

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इस बीच, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) की देविका प्रसाद ने कहा, 'यह फ़ुटेज निहत्थे छात्रों पर दिल्ली पुलिस के जवानों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग करने का है। छात्र कमरे में फँस गए हैं और पुलिस की मार से ख़ुद को बचाने के लिए छिपने या भागने की कोशिश कर रहे हैं। इस बात का कोई संकेत नहीं है कि पुलिस क़ानूनन कथित रूप से पत्थरों से लैस किसी को पकड़ने के लिए क़दम उठा रही है।'

'युवक के हाथ में पत्थर नहीं'

लेकिन सच्चाई यह है कि दिल्ली पुलिस द्वारा जारी वीडियो में एक युवक के हाथ में जिसको पत्थर बताया जा रहा है, वह पत्थर नहीं है। ऑल्ट न्यूज़ ने पुलिस द्वारा दिखाए गए उस वीडियो की पड़ताल की है जिसमें दावा किया जा रहा है कि जामिया के रीडिंग रूम में एक लड़के के दोनों हाथों में पत्थर हैं। इस आधार पर यह भी दावा किया जा रहा है कि वह पत्थरबाज है और पत्थरबाजी करने के बाद पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए लाइब्रेरी चला गया। 

लेकिन ऑल्ट न्यूज़ ने ख़ास सॉफ़्टवेअर का इस्तेमाल कर उस लड़के के हाथ में मौजूद भूरे रंग के उस कथित पत्थर के एक-एक फ्रेम का विश्लेषण किया है। ऑल्ट न्यूज़ के विश्लेषण से यह साफ़ पता चलता है कि वह दरअसल पत्थर नहीं, बल्कि भूरे रंग का पर्स यानी बटुआ है जिसे उस लड़के ने हाथ में ले रखा है। इसी तरह लड़के के दूसरे हाथ में काले रंग की चीज को पत्थर बताया गया है, पर वह दरअसल काले रंग का मोबाइल फ़ोन है।

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इस हिसाब से तो पुलिस के सारे दावे ग़लत साबित होते दिखते हैं। पहले भी पुलिस की ओर से जो दावे किए गए थे कि वह लाइब्रेरी में नहीं घुसी थी वह भी ग़लत साबित हुए। अब वीडियो में पुलिस द्वारा विश्वविद्यालय की संपत्ति - कुर्सियाँ, डेस्क, दरवाजे और यहाँ तक ​​कि सीसीटीवी कैमरे को तोड़ा जाना साफ़ दिख रहा है। क्या पुलिस के ख़िलाफ़ अब जाँच बैठेगी और कार्रवाई होगी? क्या सीसीटीवी को तोड़ने के लिए सबूत नष्ट करने का मामला चलेगा? यह तो केंद्र सरकार पर निर्भर करेगा। अब केंद्र सरकार कैसी कार्रवाई करेगी जिस पर ही ये आरोप लग रहे हैं कि वही यह सब करवा रही है?
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