सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा है कि न्यायिक फैसलों को सिर्फ इसलिए उलटना या फेंक देना ठीक नहीं है क्योंकि चेहरे (यानी जजों के पैनल) बदल गए हैं। उन्होंने हरियाणा के ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन "द इंडिपेंडेंस ऑफ जूडिशियरी: कम्पैरेटिव पर्सपेक्टिव्स ऑन राइट्स, इंस्टीट्यूशंस एंड सिटिजंस" के दौरान यह टिप्पणी की। सम्मेलन न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर केंद्रित था। जस्टिस नागरत्ना ने जोर देकर कहा कि न्यायिक फैसले समय के साथ स्थिर रहने चाहिए, ताकि कानून का शासन मजबूत बने।

उन्होंने कहा, "न्यायिक स्वतंत्रता की समझ यह सुनिश्चित करती है कि हमारे कानूनी तंत्र द्वारा एक बार दिए गए फैसले को समय के साथ अपनी जड़ें जमाए रखनी चाहिए, क्योंकि यह स्याही से लिखा होता है, रेत पर नहीं।" उन्होंने कहा, "कानूनी भाईचारे और शासन ढांचे के सभी स्टेकहोल्डर्स का कर्तव्य है कि वे ऐसे फैसले का सम्मान करें जैसा वह है। आपत्तियां सिर्फ कानून में निहित परंपराओं के अनुसार उठाएं और केवल इसलिए इसे दरकिनार करने की कोशिश न करें, क्योंकि चेहरे बदल गए हैं।"

जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक ट्रेंड से जुड़ी है। जहां कई पुराने फैसलों को नए बेंचों ने उलट दिया। उदाहरण के लिए, 16 मई को दो जजों की बेंच ने केंद्र सरकार के एक नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया था, जो परियोजनाओं के लिए पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी की अनुमति देता था। लेकिन 18 नवंबर को तीन जजों की बेंच ने 2:1 के बहुमत से इस फैसले को वापस ले लिया। इसी तरह, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने भी इस "बढ़ते ट्रेंड" पर चिंता जताई है, जहां फैसलों को आसानी से उलट दिया जा रहा है, जो कोर्ट की साख को नुकसान पहुंचा सकता है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता और कानून की सर्वोच्चता मिलकर यह सुनिश्चित करती हैं कि कानून का शासन किसी भी समय के राजनीतिक दबावों से कमज़ोर न हो। जजों को राजनीतिक और बाहरी प्रभावों से अलग रखना इस उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण है।

जस्टिस नागरत्ना के विचारों को समझने की ज़रूरत

जस्टिस नागरत्ना ने यह बयान सुप्रीम कोर्ट में हाल के वर्षों में उभरे एक चिंताजनक रुझान के संदर्भ में दिया है, जहां पुराने न्यायिक फैसलों को नए जजों की बेंच द्वारा आसानी से रद्द किया जा रहा है या वापस ले लिया जा रहा है। चाहे वह जज अभी पद पर हों या न हों, और चाहे कितना भी समय बीत चुका हो। यह ट्रेंड, जैसा कि जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने हाल ही में नोट किया, कोर्ट की साख को कमजोर कर सकता है और कानून के शासन को अस्थिर बना सकता है। उदाहरण के तौर पर, पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े मामले में पुराने फैसले को रद्द करने का निर्णय इसी समस्या को दर्शाता है।

उनका मुख्य उद्देश्य न्यायिक स्वतंत्रता की "विकसित समझ" को रेखांकित करना है, जो यह सुनिश्चित करती है कि फैसले स्थायी हों। राजनीतिक दबावों या जजों के बदलाव जैसे बाहरी कारकों से प्रभावित न हों। यदि फैसलों को बार-बार उलट दिया जाता है, तो यह न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, जिससे लोग न्यायिक निर्णयों पर भरोसा खो सकते हैं। जस्टिस नागरत्ना का कहना है कि आपत्तियां केवल कानूनी परंपराओं (जैसे अपील या समीक्षा) के माध्यम से ही उठाई जानी चाहिए, न कि केवल "चेहरे बदलने" के बहाने से। यह बयान न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने और कानून की सर्वोच्चता को मजबूत करने का एक आह्वान है, जो लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना अगस्त 2021 से सुप्रीम कोर्ट की जज हैं। वो अपने संवैधानिक सिद्धांतों, न्यायिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकारों और कानून के शासन पर जोर देने वाले फैसलों के लिए जानी जाती हैं। वे कर्नाटक हाईकोर्ट (2008–2021) से सुप्रीम कोर्ट में आईं और अक्सर असहमतिपूर्ण (डिसेंटिंग) राय देती हैं, जो कार्यपालिका के अतिक्रमण की आलोचना करती हैं। 2027 में वे भारत की पहली महिला चीफ जस्टिस बनने वाली हैं, सिर्फ 36 दिनों के लिए। नोटबंदी के केस में उनकी टिप्पणियां काफी चर्चित हुई थीं, जिसमें उन्होंने नोटबंदी को उचित नहीं ठहराया था।