केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के आधार की जगह वोटर आईडी और बायोमेट्रिक से सरकारी योजनाओं का भुगतान करने के प्रस्ताव पर कांग्रेस और सीपीआई(एम) ने सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि SIR के बाद आम लोगों के लिए अब नई परेशानी पैदा की जा रही है।
सरकारी योजनाओं का लाभ अब वोटर कार्ड से
केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के एक बयान ने देश में नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा है कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों को भुगतान करने के लिए अब आधार कार्ड को पहचान का आधार नहीं बनाया जाएगा। इसकी जगह लाभार्थियों की पहचान बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और वोटर आईडी कार्ड (EPIC नंबर) के जरिए की जाएगी।
कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है। विपक्ष का कहना है कि जब चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के जरिए करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने को लेकर विवाद चल रहा है, तब सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए वोटर आईडी अनिवार्य करने का फैसला गरीबों और वंचित समुदायों को दोहरी मार दे सकता है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले लोगों का वोट देने का अधिकार छीना जा रहा है और अब उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित करने की तैयारी है।
ललन सिंह ने क्या कहा था?
केंद्रीय पंचायती राज, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने 30 अक्टूबर को पंचायती राज मंत्रालय की ओर से आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला 'पीपुल्स प्लान कैंपेन 2026-27' में यह घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि अब लाभार्थियों को भुगतान करने का आधार आधार कार्ड नहीं रहेगा। उनका तर्क था कि आधार कार्ड बनाने वाले केंद्र अब हर गली-मोहल्ले में उपलब्ध हैं और किसी का भी आधार कार्ड महज पांच मिनट में बनाया जा सकता है।मंत्री ने कहा कि इसके बजाय लाभार्थियों की पहचान के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और उनके वोटर आईडी कार्ड के EPIC नंबर का इस्तेमाल किया जाएगा। इसी आधार पर सरकारी योजनाओं का भुगतान किया जाएगा। हालांकि, ललन सिंह ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह व्यवस्था किन-किन सरकारी योजनाओं पर लागू होगी और इसे लागू करने की समयसीमा क्या होगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि पंचायती राज मंत्रालय की ऐसी कोई योजना नहीं है जिसके तहत सीधे व्यक्तिगत लाभार्थियों के बैंक खातों में भुगतान किया जाता हो। हालांकि, मंत्री के पास मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का भी प्रभार है, जिसके तहत कुछ योजनाओं में आधार आधारित पहचान का इस्तेमाल होता है।
पवन खेड़ा का हमला: पहले वोट का अधिकार छीना, अब योजनाओं से वंचित करेंगे
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर केंद्रीय मंत्री के बयान की आलोचना की। उन्होंने लिखा: “पहले मतदाता सूची से नाम हटाकर लोगों की राजनीतिक आवाज छीनो। फिर सूची में नाम न होने के कारण उनके कल्याणकारी अधिकार भी छीन लो।” पवन खेड़ा ने दावा किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान अब तक कम से कम 13.3 करोड़ भारतीयों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं।
उन्होंने आशंका जताई कि अगर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए वोटर आईडी अनिवार्य कर दी गई तो जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, वे सरकारी सहायता से भी वंचित हो सकते हैं। खेड़ा ने कहा कि इसका परिणाम यह होगा कि लाखों भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं, दोनों से बाहर हो जाएंगे। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह अपने नागरिक अधिकारों से वंचित होना पड़ेगा।
सीपीआई(एम) ने भी जताई आपत्ति, गरीबों के लिए बढ़ेंगी मुश्किलें
ललन सिंह के प्रस्ताव का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई(एम) ने भी विरोध किया है। पार्टी के पोलित ब्यूरो ने 4 नवंबर को जारी बयान में कहा कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का भुगतान आधार की जगह वोटर आईडी और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण से जोड़ने का प्रस्ताव गरीबों और ग्रामीण आबादी के लिए नई बाधाएं पैदा करेगा। सीपीआई(एम) ने कहा कि इस प्रस्ताव को चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे SIR अभियान के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। पार्टी ने SIR को मताधिकार पर सर्जिकल स्ट्राइक और बड़े पैमाने पर लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने की व्यवस्थित प्रक्रिया बताया।पार्टी ने बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की व्यावहारिक समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया। उसने कहा कि कई बुजुर्ग महिला कृषि मजदूरों की आंखों की पुतलियों (आइरिस) का स्कैन बायोमेट्रिक मशीनें ठीक से नहीं कर पाती हैं। इसी तरह शारीरिक मेहनत करने वाले मजदूरों की उंगलियों के निशान घिस जाने के कारण मशीनें उनकी पहचान नहीं कर पातीं। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक KYC की प्रक्रिया में स्मार्टफोन की जरूरत भी ग्रामीण परिवारों के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। जिन परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं, उनके लिए सरकारी योजनाओं तक पहुंचना और कठिन हो सकता है।
13.4 करोड़ मतदाताओं के नाम कटने का दावा
सीपीआई(एम) ने अपने बयान में दावा किया कि SIR प्रक्रिया के दौरान 13.4 करोड़ से अधिक मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर किया गया है। पार्टी का कहना है कि इस प्रक्रिया का असर विशेष रूप से अल्पसंख्यकों, महिलाओं, गरीबों और समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदायों पर पड़ रहा है। पार्टी ने सवाल उठाया कि जब मतदाता सूची में नाम होने को लेकर ही विवाद है, तब वोटर आईडी को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की अनिवार्य शर्त बनाना उचित कैसे हो सकता है?सीपीआई(एम) के मुताबिक, वोटर आईडी को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने पर पहले से वंचित लोगों के सामने और बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ राज्य सरकारों ने SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद लोगों को राशन और दूसरी सरकारी सुविधाएं देने से इनकार किया है। उसने केंद्र सरकार से इस प्रस्ताव को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
पश्चिम बंगाल में पहले ही सामने आ चुका है ऐसा विवाद
आधार की जगह वोटर आईडी को सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ को लेकर पहले ही विवाद खड़ा हो चुका है। मई 2026 में पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार की ओर से संकेत दिया गया था कि जिन लोगों के नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और जिनकी अपील अपीलीय ट्रिब्यूनल में लंबित है, उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से बाहर रखा जा सकता है।
पश्चिम बंगाल में SIR के 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' यानी तार्किक विसंगति और न्यायिक जांच वाले चरण में करीब 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। इस कार्रवाई पर विपक्ष और प्रभावित मतदाताओं ने गंभीर सवाल उठाए थे। आरोप था कि नामों की स्पेलिंग में अंतर, व्यक्तिगत विवरण में मामूली गड़बड़ियों, पर्याप्त नोटिस नहीं मिलने और पुरानी तथा नई मतदाता सूचियों के बीच नामों का मिलान नहीं हो पाने के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम भी काट दिए गए। ऐसे में अब सरकारी योजनाओं के लाभ को वोटर आईडी से जोड़ने की चर्चा ने उन लोगों की चिंता और बढ़ा दी है जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं।
SIR का दायरा बढ़ने के बीच आया प्रस्ताव
निर्वाचन आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान जून 2025 में बिहार से शुरू हुआ था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में इसे नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया गया। उस चरण में करीब 51 करोड़ मतदाताओं को इस प्रक्रिया के दायरे में लाया गया था। इसके बाद अलग-अलग चरणों में देश के अन्य हिस्सों में भी यह अभियान आगे बढ़ा। इस प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने लगातार सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और इसका असर खास तौर पर मुस्लिम समुदाय, महिलाओं तथा आर्थिक रूप से कमजोर तबकों पर पड़ सकता है।आधार की जगह वोटर आईडी: सरकार के सामने भी कई सवाल
इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आधार कार्ड की जगह वोटर आईडी और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण लागू करने की व्यवस्था आखिर किन योजनाओं पर लागू होगी।
केंद्र सरकार की कई प्रमुख योजनाओं में आधार आधारित बैंक खातों के जरिए भुगतान किया जाता है। इनमें शामिल हैं:
- - प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): किसानों को आर्थिक सहायता।
- - प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण: ग्रामीण परिवारों को आवास सहायता।
- - राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम: बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को पेंशन।
- - ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम: मजदूरों को मजदूरी का भुगतान।
इसके अलावा, पशुपालन मंत्रालय की राष्ट्रीय पशुधन मिशन उद्यमिता विकास योजना में भी लाभार्थियों के लिए आधार नंबर का प्रमाण या आधार प्रमाणीकरण जरूरी है।
केंद्रीय मंत्री ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन योजनाओं में से किन योजनाओं को नई व्यवस्था के दायरे में लाया जाएगा। न ही यह बताया गया है कि आधार आधारित भुगतान व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त किया जाएगा या कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाएगी।
आधार को लेकर सरकार के पुराने रुख पर भी सवाल
सीपीआई(एम) ने आधार को लेकर केंद्र सरकार के पुराने रुख पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार ने पहले सुप्रीम कोर्ट के सामने आधार को अनिवार्य नहीं बनाने की बात कही थी, लेकिन बाद में विभिन्न सरकारी योजनाओं में आधार के इस्तेमाल का दायरा बढ़ाया गया। अब सरकार खुद आधार को लाभार्थियों की पहचान का भरोसेमंद आधार मानने से पीछे हटती दिखाई दे रही है।पार्टी ने सवाल उठाया कि जिस आधार व्यवस्था को सरकार ने लंबे समय तक विश्वसनीय और प्रभावी बताया, अब उसी को हटाकर वोटर आईडी को सरकारी योजनाओं से जोड़ने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? सीपीआई(एम) ने मांग की है कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ किसी खास पहचान पत्र, स्मार्टफोन या तकनीकी प्रमाणीकरण की अनिवार्यता से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। गरीबों को मिलने वाले सामाजिक सुरक्षा के अधिकार सार्वभौमिक होने चाहिए।
क्या वोटर लिस्ट से बाहर होना सरकारी अधिकारों से भी बाहर होना है?
ललन सिंह का बयान ऐसे समय आया है जब देश में SIR को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस जारी है। विपक्ष पहले ही आरोप लगा रहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। अब अगर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी वोटर आईडी और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण से जोड़ दिया जाता है तो सवाल केवल चुनावी अधिकारों का नहीं रहेगा, बल्कि गरीबों के भोजन, पेंशन, आवास और आर्थिक सहायता से जुड़े अधिकारों का भी होगा।हालांकि, अभी यह प्रस्ताव किस रूप में लागू होगा, इस बारे में सरकार की ओर से विस्तृत दिशा-निर्देश सामने नहीं आए हैं। लेकिन विपक्ष ने इसे लेकर आशंका जताई है कि मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के दरवाजे भी बंद हो सकते हैं। इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी नागरिक का मतदाता सूची में नाम नहीं होने के आधार पर उसे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित किया जा सकता है?