मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को किस आधार पर खारिज किया गया? क्या पहले ऐसे नोटिस स्वीकार करने वाले राज्यसभा चेयरमैन को हटाए जाने का उदाहरण उनके सामने था? विपक्ष के बड़े आरोप।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति ने खारिज कर ही दिया। इससे अब इस महाभियोग की आगे कोई कार्यवाही नहीं होगी। विपक्ष ने कहा है कि इसे खारिज किए जाने का कोई कारण नहीं बताया गया। इसने कहा है कि उन्हें पहले से यह पता था। विपक्ष ज्ञानेश कुमार के कथित पक्षपाती रवैये और एसआईआर की पूरी प्रक्रिया को लेकर उनको हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव ले आया था।
12 मार्च को विपक्ष के 63 राज्यसभा सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया था। इस नोटिस में उन्हें हटाने की मांग की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी ज़रूरी पहलुओं और मुद्दों के 'सावधानीपूर्वक' तथा 'निष्पक्ष मूल्यांकन' के बाद राज्यसभा के सभापति ने अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने भी ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को खारिज कर दिया। दोनों सदनों के 193 सांसदों ने यह नोटिस दिया था।
विपक्ष ने लगाए 7 गंभीर आरोप
विपक्ष ने महाभियोग नोटिस में ज्ञानेश कुमार पर सात मुख्य आरोप लगाए थे। ये आरोप थे-
- पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण
- चुनावी धांधली की जांच में जानबूझकर बाधा डालना
- लाखों मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर करना
- कुछ खास राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने वाला व्यवहार
- बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाताओं को बाहर करने का मामला
- सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देकर पक्षपात का आरोप
- दुराचार साबित होने का आरोप
विपक्ष का कहना था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने सत्तारूढ़ बीजेपी को कई मौकों पर फायदा पहुंचाया, खासकर बिहार में चल रहे वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण में। पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान भी टीएमसी ने ऐसे ही गंभीर आरोप लगाए हैं।
विपक्ष- पहला ऐसा महाअभियोग था
महाभियोग नोटिस खारिज होने के बाद विपक्षी नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने कहा, 'यह पहला ऐसा महाभियोग नोटिस था जिस पर 193 सांसदों के हस्ताक्षर थे। हमने विस्तृत नोटिस दिया था जिसमें नियम और तथ्य दिए गए थे। लेकिन दोनों सदनों ने इसे छोटे-से जवाब में खारिज कर दिया। कोई वजह नहीं बताई गई। हमें आश्चर्य नहीं हुआ।'
डेरेक ओब्रायन ने कहा, 'मैंने पहले ही कह दिया था। राज्यसभा सांसदों द्वारा सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का नोटिस खारिज। वजह? कोई वजह नहीं बताई गई। भाजपा हमारे महान संसद का मजाक उड़ा रही है। शर्म की बात है।'
जयराम रमेश ने कहा, 'हमें पता है कि पिछली बार राज्यसभा के सभापति के साथ क्या हुआ था, जब उन्होंने विपक्ष के प्रस्ताव को स्वीकार किया था।'
क्यों अहम है यह फैसला?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त भारत के चुनाव आयोग का सबसे ऊंचा पद है। संविधान के अनुसार उन्हें हटाना बहुत मुश्किल है। महाभियोग के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है, लेकिन पहले सदन के अध्यक्ष को नोटिस स्वीकार करना जरूरी होता है। अब दोनों सदनों के अध्यक्षों ने नोटिस खारिज कर दिया है, इसलिए यह प्रक्रिया पूरी तरह रुक गई है। सरकार की तरफ से अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि आरोप बिना ठोस सबूतों के थे, इसलिए प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया।यह घटना संसद में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बढ़ते तनाव को भी दिखाती है। विपक्ष ने कहा है कि वे इस मुद्दे पर आगे भी आवाज उठाएंगे। फिलहाल मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहेंगे और चुनाव आयोग के कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा।