राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में महेश जेठमलानी ने कहा, 'बिचौलिया वकीलों के बिना न्यायपालिका या ट्रिब्यूनल में भ्रष्टाचार नहीं हो सकता। बार में हर कोई जानता है कि वे कौन हैं।' उन्होंने बीसीआई के काम करने के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाया।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका और ट्रिब्यूनल में कथित भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि न्यायिक व्यवस्था में रिश्वतखोरी को संभव बनाने वाले ‘फिक्सर वकीलों’ की पहचान कर उनकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को दी जानी चाहिए। उनके मुताबिक, बार में ऐसे वकीलों के बारे में सभी जानते हैं और संभव है कि खुफिया एजेंसियों के पास भी उनकी जानकारी हो।
महेश जेठमलानी ने यह टिप्पणी सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में की। उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के अलावा बार काउंसिलों के कामकाज पर भी सवाल उठाए। खास तौर पर उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी बीसीआई के अध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल तक बढ़ाने की कथित कोशिश को कानून के खिलाफ बताया और इसे बेहद शर्मनाक करार दिया।
‘फिक्सर वकील’ कैसे काम करते हैं?
महेश जेठमलानी ने कहा कि न्यायपालिका या ट्रिब्यूनल में भ्रष्टाचार केवल न्यायाधीशों या किसी एक व्यक्ति की वजह से नहीं हो सकता। उनके मुताबिक़ इसमें ऐसे वकीलों की भूमिका होती है जो कथित तौर पर बिचौलिये के रूप में काम करते हैं और रिश्वतखोरी को संभव बनाने में मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे ‘फिक्सर वकील’ पूरी कानूनी व्यवस्था में हेरफेर करते हैं।
जेठमलानी ने कहा कि बार में हर कोई जानता है कि ऐसे वकील कौन हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि खुफिया एजेंसियों के पास भी ऐसे लोगों के नाम और उनकी गतिविधियों की जानकारी हो। उनके मुताबिक़, अगर ऐसी जानकारी उपलब्ध है तो उसे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के साथ साझा किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे न्यायपालिका को ऐसे लोगों की भूमिका और उनके प्रभाव को लेकर अधिक सतर्क रहने में मदद मिल सकती है।
जेठमलानी ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, अगर ऐसे वकील न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने या रिश्वतखोरी में मदद करने की कोशिश करते हैं तो उनकी जानकारी संबंधित संस्थाओं तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का उल्लेख करते हुए कहा कि खुफिया एजेंसियों के पास उपलब्ध जानकारी कॉलेजियम को दी जानी चाहिए, अगर पहले से ऐसा नहीं किया गया है।
महेश जेठमलानी के भाषण में किसी विशेष वकील का नाम लेकर उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगाया गया। इसलिए उनके बयान को व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ एक व्यापक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
बीसीआई के कामकाज पर भी सवाल
महेश जेठमलानी ने अपने भाषण में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कामकाज पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने खास तौर पर बीसीआई के मौजूदा अध्यक्ष के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने की कथित कोशिश का मुद्दा उठाया। जेठमलानी के अनुसार, कानून के तहत अध्यक्ष का निर्धारित कार्यकाल दो साल है। इसके बावजूद कार्यकाल को 2030 तक पांच साल करने की कोशिश की गई। उन्होंने इस कथित प्रयास को बेहद शर्मनाक स्थिति बताया।
उनका कहना था कि किसी पदाधिकारी के कार्यकाल को क़ानून में निर्धारित अवधि से कहीं अधिक बढ़ाने की कोशिश संस्थागत व्यवस्था और क़ानूनी नियमों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।बार में भाई-भतीजावाद का आरोप
महेश जेठमलानी ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि इस याचिका में बार काउंसिल के पदाधिकारियों पर भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि याचिका में एक ऐसे ट्रस्ट को नियंत्रित करने की कोशिश का आरोप है जिसे महत्वपूर्ण कार्य स्थायी रूप से सौंपे गए हैं।
जेठमलानी के मुताबिक़ इस व्यवस्था में समस्या यह हो सकती है कि कोई व्यक्ति बार काउंसिल का सदस्य न रहने के बाद भी उस अहम ट्रस्ट में बना रह सकता है।
बीसीआई ट्रस्ट, PEARL ट्रस्ट क्या है?
जेठमलानी ने जिस याचिका का जिक्र किया, उसके संदर्भ में उन्होंने दावा किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के मूल ट्रस्ट की संपत्तियां और आय एक नए ट्रस्ट में स्थानांतरित की गईं। उन्होंने इस नए ट्रस्ट का नाम PEARL Trust बताया। उनके अनुसार, इस ट्रस्ट का प्रबंधन 11 ऐसे ट्रस्टियों के हाथ में है जो बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जुड़े पदाधिकारी हैं। सबसे बड़ा सवाल उन्होंने यह उठाया कि इन 11 प्रबंध ट्रस्टियों को बीसीआई के सदस्य नहीं रहने के बाद भी ट्रस्टी के रूप में बने रहने की अनुमति है। यानी उनके मुताबिक, कोई व्यक्ति BCI में अपना पद या सदस्यता खोने के बावजूद उस ट्रस्ट में प्रभावशाली भूमिका बनाए रख सकता है। उन्होंने इसी व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में उठाए गए सवालों का हवाला दिया।बार काउंसिल की जवाबदेही पर बहस
महेश जेठमलानी के बयान का एक बड़ा हिस्सा बार काउंसिल की जवाबदेही और उसके पदाधिकारियों के कामकाज से जुड़ा रहा। बार काउंसिल ऑफ इंडिया देश में वकालत के पेशे से जुड़े नियमन की बड़ी संस्था है। ऐसे में उसके कामकाज, पदाधिकारियों की जवाबदेही और उससे जुड़े ट्रस्टों के प्रबंधन को लेकर उठने वाले सवालों का महत्व बढ़ जाता है।
जेठमलानी का तर्क है कि अगर बार की नियामक संस्था से जुड़े लोगों पर ही भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद या संस्थागत नियंत्रण के दुरुपयोग जैसे आरोप लगते हैं तो इन मामलों की पारदर्शी तरीके से जांच और जवाबदेही जरूरी है।
महेश जेठमलानी के बयान का सबसे बड़ा मुद्दा न्यायपालिका में कथित रिश्वतखोरी से जुड़ा है। न्यायपालिका से आम नागरिक को निष्पक्ष और स्वतंत्र न्याय की उम्मीद होती है। ऐसे में यदि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए बिचौलियों या ‘फिक्सर वकीलों’ के इस्तेमाल की बात सामने आती है तो यह पूरी न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर सकती है।