सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर बंगाल सरकार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पुलिस को नोटिस जारी किया। अदालत ने ईडी अफसरों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। कलकत्ता में आई-पैक दफ्तर पर छापेमारी में बाधा डालने और सबूत ले जाने के आरोप में ईडी ने सीबीआई जांच की मांग की है। अदालत ने ईडी के आरोपों को "बेहद गंभीर" बताया। उसने सवाल किया कि क्या किसी राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियां ​​किसी गंभीर अपराध की केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप कर सकती हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई आदेश पारित नहीं किया। 
लाइव लॉ के मुताबिक सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि ईडी की याचिका में कई बड़े सवाल उठते हैं, जिनका जवाब न मिलने पर अराजकता फैल सकती है। अदालत ने ईडी की याचिका पर सुनवाई की तारीख 3 फरवरी तय की और पश्चिम बंगाल पुलिस को आई-पैक परिसर पर छापेमारी की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। इसके बाद जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने ममता बनर्जी, बंगाल सरकार, डीजीपी राजीव कुमार और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार 15 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। ईडी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जांच में बाधा डालने का आरोप लगाया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि मुख्यमंत्री ने ED के अधिकारियों की मौजूदगी में सबूतों को अपने कब्जे में लिया, जिसे उन्होंने "चोरी" करार दिया। 
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लाइव लॉ के मुताबिक ED की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "ED अधिकारियों ने अपनी पहचान दिखाई थी। फिर भी मुख्यमंत्री ने हिम्मत दिखाकर संवेदनशील दस्तावेज और डिजिटल डिवाइस अपने पास ले लिए, जो साफ तौर पर चोरी है। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से ED पर ही आरोप लगाया। यह पहली बार नहीं हो रहा, कोर्ट को ऐसा कुछ निर्देश देना चाहिए कि यह हमेशा के लिए रुके।"

मेहता ने आगे आरोप लगाया कि यह घटना पश्चिम बंगाल में जांच एजेंसियों के साथ "दखलअंदाजी का पैटर्न" दर्शाती है। उन्होंने पुराने मामलों का हवाला दिया, जहां CBI अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया या जांच में रोका गया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के साथ पुलिस की मौजूदगी में "मॉबोक्रेसी लोकतंत्र पर हावी हो रही है"। ED ने I-PAC रेड के दौरान मुख्यमंत्री द्वारा एक ED अधिकारी का मोबाइल फोन भी ले जाने का दावा किया।

ईडी को बंगाल पुलिस पर विश्वास नहीं

ईडी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आरोपी हैं और उन्होंने राज्य के डीजीपी राजीव कुमार की मौजूदगी में चोरी की है। ईडी की ओर से पेश हुए एएसजी राजू ने घटना की सीबीआई जांच की मांग की। उन्होंने कहा, "पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष जांच नहीं होगी क्योंकि मुख्यमंत्री, डीजीपी आदि पर आरोप लगाए गए हैं।" एएसजी ने बताया कि आरोपों की गंभीरता के बावजूद, मुख्यमंत्री या वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि अगर राज्य पुलिस एफआईआर दर्ज भी करती है, तो उसकी जांच और कार्यवाही इस तरह से की जाएगी जिससे विश्वास पैदा नहीं होगा।
कोर्ट ने मामले को गंभीर बताते हुए दोनों पक्षों के तर्क सुनने की बात कही। जस्टिस पीके मिश्रा ने पूछा कि I-PAC के दफ्तर पर आईपैक क्यों गई थी। जवाब में मेहता ने बताया कि यह 2,742 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ा है, जिसमें अवैध कोयला खनन और बिक्री शामिल है। ED ने PMLA की धारा 17 के तहत 10 स्थानों पर सर्च की थी, जिसमें I-PAC भी शामिल है। यह वही I-PAC है जो पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर से जुड़ी है और TMC के साथ काम करती रही है।

सिब्बल ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए

ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने ED पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, "हम इस घटना से व्यथित हैं। ED ने दो साल इंतजार क्यों किया और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बंगाल में छापेमारी क्यों की? यह सिर्फ पूर्वाग्रह है।" सिब्बल ने दावा किया कि मुख्यमंत्री 8 जनवरी को दोपहर 12 बजे पहुंचीं और 12:15 बजे ही चली गईं। यानी वो वहां सिर्फ 15 मिनट ही रहीं। इतनी देर में इंसान क्या कर सकता है।


सिब्बल और तुषार मेहता में तीखी बहस

सुप्रीम कोर्ट में आई-पैक की सुनवाई के दौरान तीखी बहस हुई, जिसमें ईडी ने वकीलों को उन मामलों पर मीडिया से बात करने से रोकने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने पर विचार करने का आग्रह किया, जिनमें वे पेश हो रहे हैं। ईडी ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से तर्क दिया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सार्वजनिक टिप्पणी चल रही कार्यवाही को प्रभावित कर सकती है और न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकती है। इस दलील का जवाब देते हुए, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने कहा कि ऐसा कोई भी प्रतिबंध जांच एजेंसियों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाएं "नियमित रूप से अपनी पसंद के पत्रकारों को चुनिंदा जानकारी लीक करती हैं।"

सिंघवी का सवाल- एक ही समय में दो अदालतों में याचिका कैसे

पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य पुलिस की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में ईडी की याचिका की स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई। सिंघवी ने बताया कि एजेंसी इसी मुद्दे पर पहले ही कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुकी है और उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी है। सिंघवी ने पीठ से कहा, “दोनों याचिकाएं एक जैसी हैं। ईडी एक साथ दो अदालतों में याचिका नहीं दायर कर सकती। यह सिर्फ अदालती कार्यवाही का दुरुपयोग है।” उन्होंने तर्क दिया कि एजेंसी एक ही समय में दो संवैधानिक अदालतों में एक ही तरह की राहत की मांग कर रही है।

इस पर बेंच ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। अदालत ने कहा, “देखिए क्या हुआ। आज यह हाईकोर्ट है, कल कोई दूसरा हाईकोर्ट हो सकता है।”

सिंघवी ने जवाब में कहा कि संवेदनशील मामलों में भावनाएं भले ही उग्र हों, लेकिन प्रक्रियात्मक अनुशासन बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई एक दिन पहले ही की थी और ईडी द्वारा एक ही मुद्दे को समानांतर रूप से उठाने की आवश्यकता पर सवाल उठाया।

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यह मामला 8 जनवरी को कोलकाता में I-PAC दफ्तर और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर ED की छापेमारी से जुड़ा है। ED का आरोप है कि मुख्यमंत्री पुलिस के साथ पहुंचीं, जांच में बाधा डाली और संवेदनशील सामग्री ले गईं। ED ने पश्चिम बंगाल DGP राजीव कुमार सहित पुलिस अधिकारियों के निलंबन की भी मांग की है।

बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने TMC की याचिका खारिज कर दी थी, जहां ED ने स्पष्ट किया कि उसने I-PAC से कोई सामग्री जब्त नहीं की। जो भी लिया गया, वह मुख्यमंत्री द्वारा लिया गया था। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है, जहां TMC सरकार ने कैविएट दाखिल कर बिना सुने कोई आदेश न देने की गुहार लगाई है।