यूपी, महाराष्ट्र और कर्नाटक के एमएलसी चुनाव नतीजों ने सियासी तस्वीर को दिलचस्प बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में समाजवादी पार्टी की जीत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय वाले नागपुर में कांग्रेस की लगातार दूसरी जीत बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश है। दूसरी तरफ, कर्नाटक में सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस चारों एमएलसी सीटें हार गई।
28 एमएलसी सीटों के चुनावी नतीजों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बीजेपी के सबसे मजबूत माने जाने वाले राजनीतिक और वैचारिक केंद्रों में भी विपक्ष अपनी जगह बना रहा है? और क्या कर्नाटक के नतीजे बताते हैं कि राज्य में कांग्रेस की सत्ता का प्रभाव हर चुनाव में एक जैसा नहीं है? इन नतीजों को केवल सीटों की जीत-हार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वाराणसी, नागपुर और कर्नाटक के नतीजे अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में आए हैं। लेकिन इनका राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से महत्व जरूर है।

नागपुर में कांग्रेस की जीत: संघ के मुख्यालय वाले शहर में बीजेपी को चुनौती

महाराष्ट्र के नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है। उन्होंने 2020 में पहली बार यह सीट जीती थी और अब 2026 में भी इसे अपने पास बनाए रखा है। नागपुर का राजनीतिक महत्व केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का भी यह गृह क्षेत्र है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की राजनीति का भी नागपुर से गहरा संबंध रहा है।
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ऐसे में नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस की जीत को बीजेपी के लिए प्रतीकात्मक और राजनीतिक, दोनों तरह का झटका माना जा रहा है।अभिजीत वंजारी पेशे से वकील और शिक्षाविद हैं। वह कांग्रेस से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। 2020 में उन्होंने महा विकास आघाड़ी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था और बीजेपी के पारंपरिक गढ़ में जीत हासिल की थी। इस बार उनकी लगातार दूसरी जीत ने यह दिखाया कि नागपुर में कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखने में सफल रही है।
नागपुर की जीत कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि पार्टी महाराष्ट्र में बीजेपी और उसके सहयोगियों के मुकाबले अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। नागपुर में जीत से कांग्रेस को यह संदेश देने का अवसर मिला है कि आरएसएस और बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी विपक्ष मुकाबला कर सकता है। लेकिन इस जीत को पूरे महाराष्ट्र में कांग्रेस की वापसी का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। महाराष्ट्र की पांच एमएलसी सीटों के चुनाव में महायुति और महा विकास आघाड़ी के बीच मुकाबला मिला-जुला रहा।

वाराणसी में बीजेपी को झटका, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का दबदबा

उत्तर प्रदेश की 11 एमएलसी सीटों के चुनाव में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा। बीजेपी ने छह सीटें जीतीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की।इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वाराणसी का नतीजा रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर समाजवादी पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत की। पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र को बरकरार रखा और वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी जीत हासिल की।
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से सपा के लाल बिहारी यादव ने अपनी सीट बरकरार रखी। वहीं, स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के आशुतोष सिन्हा की जीत ने पार्टी को एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक सफलता दिलाई। यह नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वाराणसी को बीजेपी के सबसे मजबूत राजनीतिक क्षेत्रों में गिना जाता है। नरेंद्र मोदी यहां से लगातार लोकसभा चुनाव जीतते रहे हैं। ऐसे में वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर सपा की सफलता बीजेपी के लिए एक राजनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।

कर्नाटक में कांग्रेस की हार: सत्ता में होने के बावजूद चारों सीटें गंवाईं: जहां उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के नतीजों में बीजेपी को उसके मजबूत क्षेत्रों में चुनौती मिली, वहीं कर्नाटक में कांग्रेस के लिए चुनावी नतीजे निराशाजनक रहे। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व में पार्टी राज्य की सत्ता में है। इसके बावजूद विधान परिषद की चारों सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। कर्नाटक में बीजेपी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) ने एक सीट पर जीत दर्ज की। इस तरह बीजेपी-जेडीएस गठबंधन ने सभी चार सीटों पर कब्जा कर लिया। सबसे महत्वपूर्ण मुकाबला बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में हुआ। यहां जेडीएस के एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी पुट्टन्ना को हराया। पुट्टन्ना ने 2024 के उपचुनाव में कांग्रेस के टिकट पर यह सीट जीती थी।

कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस के लिए कई सवाल खड़े करते हैं। राज्य में सत्ता होने के बावजूद पार्टी शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाई। यह भी स्पष्ट हुआ कि विधानसभा चुनावों में जीत और विधान परिषद के विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में जीत के राजनीतिक समीकरण अलग हो सकते हैं। कांग्रेस के लिए यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ विपक्षी राजनीति का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक में हार उसके संगठन और चुनावी रणनीति की कमजोरी को उजागर करती है।

बिहार में भी दिलचस्प नतीजे, प्रशांत किशोर की पार्टी का खाता खुला

28 एमएलसी सीटों के चुनाव में बिहार के नतीजे भी महत्वपूर्ण रहे। बिहार की आठ सीटों में एनडीए ने चार सीटें जीतीं। बीजेपी ने तीन और जेडीयू ने एक सीट पर जीत दर्ज की। राष्ट्रीय जनता दल और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी एक-एक सीट जीती। दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की।
जन सुराज पार्टी के लिए यह चुनाव विशेष महत्व रखता है। पार्टी ने बिहार में पहली बार विधान परिषद में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज के सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को हराया। वहीं, पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में आरजेडी के संजीव कुमार सिंह ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता नवल किशोर यादव को हराया। नवल किशोर यादव लगभग तीन दशक से इस सीट पर काबिज थे। बिहार के नतीजों से यह भी संकेत मिलता है कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ और संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।

28 सीटों के नतीजों की बड़ी तस्वीर क्या है?

इन चुनावों में बीजेपी और उसके सहयोगियों का प्रदर्शन कुल मिलाकर मजबूत रहा। चार राज्यों की 28 सीटों में एनडीए ने 16 सीटें जीतीं। लेकिन इस जीत के बीच विपक्ष ने कुछ ऐसे नतीजे दिए हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इन चुनावों की तीन बड़ी राजनीतिक बातें हैं:
  • - वाराणसी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की दोनों एमएलसी सीटों पर सफलता।
  • - नागपुर: आरएसएस के मुख्यालय वाले शहर में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी की लगातार दूसरी जीत।
  • - कर्नाटक: कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद बीजेपी-जेडीएस गठबंधन का चारों सीटों पर कब्जा।
इन तीनों नतीजों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि एमएलसी चुनावों में सत्ता, संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की भूमिका अलग-अलग तरीके से सामने आई है। बीजेपी के लिए वाराणसी और नागपुर के नतीजे राजनीतिक संदेश हैं। पार्टी को इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए स्थानीय स्तर पर संगठन और मतदाताओं के साथ संपर्क को मजबूत करना होगा। दूसरी तरफ, कांग्रेस के लिए नागपुर की जीत उत्साहजनक है, लेकिन कर्नाटक की हार बताती है कि पार्टी को अपने संगठनात्मक प्रदर्शन की समीक्षा करने की जरूरत है। समाजवादी पार्टी के लिए वाराणसी की जीत उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि है। अखिलेश यादव की पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि बीजेपी के मजबूत क्षेत्रों में भी विपक्ष के लिए चुनावी संभावनाएं मौजूद हैं।

क्या एमएलसी चुनावों के नतीजे 2027 के विधानसभा चुनावों का संकेत हैं?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एमएलसी नतीजों को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से पेश करेंगे। बीजेपी यह कह सकती है कि उसने उत्तर प्रदेश में छह सीटें जीतकर अपना पिछला प्रदर्शन बरकरार रखा है। वहीं, समाजवादी पार्टी वाराणसी की दोनों सीटों पर जीत और कुल पांच सीटों के प्रदर्शन को अपनी राजनीतिक मजबूती के रूप में पेश कर सकती है। लेकिन यह चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग है। यहां मतदाता सीमित और विशेष वर्गों से आते हैं। शिक्षक और स्नातक मतदाताओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं आम मतदाताओं से अलग हो सकती हैं। इसलिए इन नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनावों का सीधा पूर्वानुमान मानना उचित नहीं होगा।
फिर भी, वाराणसी और नागपुर जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विपक्ष की जीत यह बताती है कि बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी चुनावी मुकाबला संभव है। इसका जवाब 2027 के विधानसभा चुनावों में ज्यादा स्पष्ट होगा। फिलहाल, एमएलसी चुनावों ने बीजेपी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सामने अपनी-अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने का अवसर जरूर पैदा किया है।