प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से टेलीफोन पर बातचीत की, जिसमें मध्य पूर्व में बढ़ती तनाव की स्थिति पर गहरी चिंता जताई गई। यह दोनों नेताओं के बीच पिछले महीने शुरू हुए ईरान संघर्ष के बाद पहली सीधी बातचीत थी। प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर देर रात पोस्ट में लिखा, "ईरानी राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेश्कियन से बातचीत की, जिसमें क्षेत्र की गंभीर स्थिति पर चर्चा हुई। तनाव में वृद्धि, नागरिकों की जान जाने और नागरिक ढांचे को नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त की।" उन्होंने आगे कहा, "भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और माल तथा ऊर्जा (तेल, गैस) का बेरोकटोक परिवहन भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई हैं। शांति और स्थिरता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया और संवाद तथा कूटनीति की अपील की।" मोदी के इस ट्वीट को फिर से पढ़िए। कम से कम दो बार पढ़िए।
मोदी के ट्वीट में कहीं भी एक शब्द ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने पर दुख नहीं जताया गया है। न ही उनकी हत्या की निन्दा की गई है। भारत के विदेश मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक ने ईरान के सर्वोच्च नेताओं से होर्मुज में भारतीय जहाजों की आवाजाही पर मिन्नतें कर डालीं लेकिन अली खामेनेई की हत्या पर कोई दुख नहीं जताया गया। ईरान पर थोपे गए युद्ध की कोई निन्दा नहीं की गई। उधर, यूएन में भी भारत उन 130 देशों में शामिल है, जिन्होंने ईरान के हमले की निन्दा की है। भारत का ईरान को लेकर दोहरा स्टैंड खुल कर सामने आ गया है। भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ईरान को आतंकी शासन (टेररिस्ट रिजीम) भी लिख रहा है, दूसरी तरफ भारत के नेताओं से ईरान की सुखद बातचीत की कहानियां भी बता रहा है।

क्या भारत के स्टैंड से मोदी का स्टैंड अलग है

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 5 मार्च को ईरान के दूतावास में जाकर ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर शोक जताया था। उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए और ईरान के लोगों के प्रति गहरी संवेदना जताई। इसके अलावा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री से फोन पर भी खामेनेई की हत्या पर शोक जताया। यह भारत की ओर से इस घटना पर पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया थी। लेकिन पीएम मोदी या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से कोई शोक नहीं जताया गया। पीएम मोदी के पास ईरान के राष्ट्रपति से बात करते समय मौका भी था। लेकिन उन्होंने खो दिया। कम से कम मोदी ने जो ट्वीट किया है, उसमें कहीं भी निन्दा शब्द नहीं है। अगर उन्होंने ऑफ द रेकॉर्ड शोक जताया हो तो अलग बात है। ऑन रेकॉर्ड शोक के शब्द गायब हैं।

कांग्रेस का तीखा हमला- खामेनेई की हत्या पर चुप क्यों हैं मोदी और जयशंकर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद जयराम रमेश ने मोदी के फोन पर तीखा हमला किया है। जयराम रमेश ने शुक्रवार 13 मार्च को एक्स पर लिखा- ईरान के संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष अयातुल्ला खामेनेई की 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इसराइल द्वारा हत्या कर दी गई। प्रधानमंत्री चुप हैं। विदेश मंत्री भी चुप हैं। संसद में अभी तक शोक संदेश का उल्लेख भी नहीं हुआ है। भारत ने खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की निंदा तो की है, लेकिन अमेरिका-इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है। यह याद रखना चाहिए कि ईरान ब्रिक्स+ मंच का हिस्सा है, जिसकी अध्यक्षता इस वर्ष भारत कर रहा है। मई 2024 में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी की एक रहस्यमय हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई। मोदी सरकार ने 21 मई 2024 को एक दिन का शोक घोषित किया और संसद ने 1 जुलाई 2024 को सत्र शुरू होने पर शोक संदेश का उल्लेख किया था। अब यह हिचकिचाहट क्यों? एक समझौतावादी प्रधानमंत्री निस्संदेह अपने अमेरिकी और इज़राइली 'मित्र' को नाराज़ करने से बचना चाहता है।
अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इसराइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई में हुई थी। ईरानी राज्य मीडिया ने उनकी मौत की पुष्टि की थी। इन हमलों में खामेनेई के केंद्रीय परिसर को निशाना बनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 200 लोगों की मौत हुई। इस हमले में खामेनेई के अलावा उनकी पत्नी, दामाद-बेटी, नतिनी और पोते की भी हत्या कर दी गई। हालांकि अब खबर आ रही हैकि खामेनेई की पत्नी जिन्दा हैं, घायल होने की वजह से उनका इलाज चल रहा है।
भारत ने अब तक इस संघर्ष पर दोहरा रुख अपनाया है। पीएम मोदी की ईरानी राष्ट्रपति से बात, विदेश मंत्री जय शंकर की ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची से बात और विदेश सचिव मिस्री का ईरान दूतावास में शोक जताने से तो यही संकेत मिलता है कि नई दिल्ली ईरान के साथ राजनयिक संबंधों को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट की जियो पॉलिटिक्स बदल चुकी है। भारत जैसे देशों को ऊर्जा सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव पड़ सकता है। ईरान के साथ भारत के मजबूत आर्थिक संबंध रहे हैं।
ईरान पर थोपे गए युद्ध से ठीक पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25-26 फरवरी 2026 को इसराइल की दो दिवसीय राजकीय यात्रा की थी। यह उनकी 2017 के बाद दूसरी यात्रा थी, जिसमें दोनों देशों ने संबंधों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा दिया, रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और नवाचार पर 16 समझौते और 11 संयुक्त पहल की घोषणा की। मोदी ने इसराइली संसद (Knesset) को संबोधित किया और यद वाशेम (होलोकॉस्ट स्मारक) का दौरा किया।
मोदी की इसराइल यात्रा के दौरान मध्य पूर्व में तनाव बढ़ रहा था, और अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा था। मोदी की वापसी के महज 48 घंटे बाद (28 फरवरी) इसराइल ने हमले शुरू किए, जिसमें अमेरिका ने भी भाग लिया। इसराइल के भारत में राजदूत रेयुवेन अज़ार ने कहा कि हमले की योजना काफी पहले से थी, लेकिन 'ऑपरेशनल अवसर' मोदी के जाने के बाद ही मिला, और सुरक्षा कैबिनेट ने शनिवार सुबह मंजूरी दी।

विपक्ष के लगातार हमले

भारत के विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस मोदी की ईरान नीति को लेकर हमलावर है। उसने मोदी की इसराइल यात्रा को 'असमय' और 'शर्मनाक' बताया था। कांग्रेस ने कहा कि यह यात्रा इसराइल के हमले को 'भारतीय समर्थन' देने जैसी लगती है। यह भारत की यूएन और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता के विपरीत है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे 'भारत के मूल्यों, सिद्धांतों और हितों के साथ विश्वासघात' करार दिया था। सोनिया गांधी ने सरकार की 'चुप्पी' को 'तटस्थता नहीं, बल्कि त्याग' बताया और खामेनेई की हत्या की निंदा की मांग की। प्रियंका गांधी ने इसे 'घृणित' कहा। अन्य विपक्षी नेता जैसे असदुद्दीन ओवैसी और कम्युनिस्ट पार्टी ने भी मोदी सरकार पर 'तटस्थता खोने' का आरोप लगाया।

भारत में बढ़ता एलपीजी संकट

हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास शिपिंग लगभग ठप हो गई है, जहां दुनिया के पांचवां हिस्से का तेल और लिक्विड प्राकृतिक गैस (एलएनजी) गुजरता है। संयुक्त अरब अमीरात और इराक के तट पर खाड़ी में तीन और जहाजों पर हमले हुए हैं। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) खरीदार है, जिसमें से 90 प्रतिशत हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। अब ट्रैफिक ठप होने से भारत में रसोई गैस की कमी हो गई है, जिससे रेस्तरां और घरेलू उपभोक्ता प्रभावित हैं। बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि "घबराने की कोई जरूरत नहीं है", और सरकार ने उद्योग की मांगों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की है ताकि रसोई गैस की आपूर्ति बढ़ाई जा सके। लेकिन भारत में एलपीजी संकट को लेकर देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। सरकार संसद से लेकर मीडिया में लीपापोती कर रही है।
देश से और खबरें
गुरुवार को एक वरिष्ठ ईरानी सैन्य अधिकारी ने चेतावनी दी कि ईरान लंबे युद्ध छेड़ सकता है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को "नष्ट" कर देगा, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान हार के कगार पर है। पिछले 10 दिनों में प्रधानमंत्री मोदी ने ओमान, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब, यूएई, जॉर्डन, इसराइल और कतर के नेताओं से बात की है, जिसमें उनके देशों पर हमलों पर चिंता जताई और कुछ राष्ट्रों की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की।
खाड़ी और पश्चिम एशिया में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं। ईरान में करीब 10,000 भारतीय नागरिक रहते, पढ़ते और काम करते हैं, जबकि इसराइल में 40,000 से अधिक हैं।