JNU की छात्रा और AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने एक साल के पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद उन्होंने इसे अदालत में चुनौती देने और असहमति का अधिकार जारी रखने की बात कही।
नेहा बोरा ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने साफ कर दिया है कि वह शांति बनाए रखने के लिए पुलिस-प्रशासन की ओर से मांगे गए ‘पीस बॉन्ड’ (शांति बांड) पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उनकी याचिका खारिज किए जाने के बाद भी उन्होंने इस आदेश को चुनौती देते रहने का ऐलान किया है। नेहा बोरा का आरोप है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को दबाने के लिए पीस बॉन्ड का इस्तेमाल एक औजार के रूप में किया जा रहा है।
नेहा बोरा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी ओर से कोई शर्त नहीं रखी जा रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमारी कोई शर्त नहीं है। हम बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करने जा रहे हैं। हम कोई पीस बॉन्ड साइन नहीं करेंगे। हम इसे चुनौती देते रहेंगे।” उनका कहना है कि अब तक उन्हें यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है कि उन्होंने शांति भंग करने के लिए आखिर क्या किया है। उनके मुताबिक, किसी ठोस तथ्य के बिना इस तरह का नोटिस जारी करना सवालों के घेरे में है।
शनिवार को मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “हमें शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने में कोई परेशानी नहीं है। लेकिन यह शांति सरकार के लिए नहीं हो सकती। असहमति जताने का अधिकार जारी रहेगा।” उन्होंने आगे कहा, “विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट किसी को बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए कि संबंधित व्यक्ति को किन आधारों पर बॉन्ड भरने के लिए कहा जा रहा है।”
नेहा बोरा ने कहा कि अदालत ने माना है कि न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं हुआ है। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया, “हमें अभी तक यह नहीं बताया गया है कि हम शांति कैसे भंग कर रहे हैं। जब नोटिस में कोई कारण ही नहीं बताया गया है, तो हम सबूत कैसे पेश करेंगे?” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में होने वाली सुनवाई में शामिल होंगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 16 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन से जुड़ा है। नेहा बोरा ने उस दिन दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में शांतिपूर्ण सभा करने का आह्वान किया था। इस सभा का उद्देश्य कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा फहराना बताया गया था। यह कार्यक्रम चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विरोध के बीच आयोजित किया जाना था। नेहा बोरा के मुताबिक, वह 16 अक्टूबर को शाम करीब 5 बजे मंडी हाउस पहुंची थीं और इसके कुछ ही देर बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें पहले किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया और बाद में आरके पुरम पुलिस स्टेशन में रखा गया। 17 अक्टूबर की सुबह करीब 6 बजे उन्हें रिहा किया गया।
पुलिस ने क्यों जारी किया पीस बॉन्ड का नोटिस?
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Special Executive Magistrate—SEM) ने 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 130 तथा धारा 135(3) के तहत नोटिस जारी किया था। नेहा बोरा को 18 अक्टूबर को यह नोटिस मिला। नोटिस में उनसे पूछताछ के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया था। उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर यह बताना था कि उनसे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने की मांग क्यों न की जाए।पुलिस की ओर से नोटिस में जिन बातों का उल्लेख किया गया, उनमें शामिल हैं:
- - मंडी हाउस में कथित नारेबाजी।
- - जंतर-मंतर के आसपास प्रतिबंधात्मक आदेशों के बावजूद विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप।
- - 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के लिए लोगों को उकसाने का आरोप।
नेहा बोरा ने इन आरोपों के आधार पर कार्रवाई को चुनौती दी है। उनका कहना है कि नोटिस में शांति भंग होने की आशंका के समर्थन में पर्याप्त तथ्य नहीं दिए गए हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर को नेहा बोरा की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद ने कहा कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। अदालत ने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि जांच में कोई आदेश पारित करने से पहले नेहा बोरा को संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई जाए। नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में दलील दी थी कि 16 अक्टूबर का प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उनकी मुवक्किल ने हिंसा का आह्वान नहीं किया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नोटिस में शांति भंग होने की आशंका साबित करने वाली सामग्री नहीं है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलील दी कि BNSS की धारा 126 के तहत संबंधित अधिकारी को प्राप्त जानकारी के आधार पर शांति भंग होने की आशंका का आकलन करने का अधिकार है।बहरहाल, हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद नेहा बोरा को मंडी मार्ग स्थित विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होना है। रिपोर्ट के मुताबिक, उनसे एक साल तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने और जमानतदार प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया है। अब इस मामले में अहम सवाल यह है कि नेहा बोरा बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इनकार करने के अपने रुख पर कायम रहती हैं तो मजिस्ट्रेट की अदालत आगे क्या आदेश देती है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन शांति भंग होने की आशंका के समर्थन में कौन-सी सामग्री उनके सामने रखता है। इस मामले का व्यापक सवाल शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली निवारक कार्रवाई के बीच संतुलन का है। नेहा बोरा इसे लोकतांत्रिक असहमति को दबाने की कोशिश मानती हैं, जबकि हाईकोर्ट ने फिलहाल उनकी याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए मजिस्ट्रेट को संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।