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लोकतांत्रिक माहौल को बढ़ाने के लिए नई सोच की जरूरत:राहुल गांधी

पांच महीने की भारत जोड़ो यात्रा के समाप्त होने के बाद राहुल गांधी बुधवार के कैंब्रिज विश्वविद्यालय पहुंचे हुए हुए थे। जहां पर उन्होंने एक लेक्चर दिया और वहां के छात्रों के साथ संवाद किया। गांधी ने क्रैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अपने भाषण को ‘‘सुनने की कला'' पर केंद्रित किया तथाा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए नई सोच का आह्वान किया।
राहुल गांधी ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में दिए भाषण में कहा कि दुनिया में लोकतांत्रिक माहौल को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसी नई सोच का आह्वान किया जिसे दूसरों पर थोपा न गया हो। हालिया वर्षों में भारत और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट का उल्लेख करते हुए गांधी ने कहा कि इस बदलाव से बड़े पैमाने पर असमानता और आक्रोश सामने आया है, जिस पर तत्काल ध्यान देने और संवाद की जरूरत है।    
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गांधी ‘कैम्ब्रिज जज बिजनेस स्कूल' (कैम्ब्रिज जेबीएस) में विजिटिंग फेलो हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय में ‘‘21वीं सदी में सुनना-सीखना'' विषय पर लेक्चर देते हुए कहा, ‘‘हम ऐसी दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते जहां लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं न हों।'' इसलिए, हमें नई सोच की जरूरत है, जहां पर कोई भी काम जोर-जबरदस्ती और बलपूर्वक करने की बजाए, लोकतांत्रिक तरीके से किया जाए'' उन्होंने 'सुनने की कला पर भी जोर डाला और कहा कि सुनना बहुत शक्तिशाली' होता है। दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का बहुत महत्व है।
राहुल ने वैश्विक व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, विशेष तौर पर 1991 में हुए सोवियत संघ के के विघटन के बाद, अमेरिका और चीन के ‘‘दो अलग-अलग दृष्टिकोण'' सामने आये। उन्होंने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियां कम करने के अलावा अमेरिका ने 11 सितंबर, 2001 को हुए आतंकी हमलों के बाद अपने बाहरी लोगों के लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए,  जबकि इसके विपरीत चीन ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ईद गिर्द के बने संगठनों के जरिये ‘‘सद्भाव को बढ़ावा दिया है।''
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अपने लेक्चर में उन्होंने वैश्विक स्तर पर भी बातचीत की अनिर्वायता के प्राथमिकता दी।  उन्होंने विभिन्न दृष्टिकोणों को अपनाने के नये तौर तरीकों के लिए आह्वान में विभिन्न आयामों को एक साथ लाने का प्रयास किया। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के छात्रों को यह भी समझाया कि ‘‘यात्रा' करना तीर्थयात्रा के जैसा है, इससे लोग खुद ही जुड़ जाते हैं ताकि वे दूसरों को सुन सकें।
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क़मर वहीद नक़वी
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