ओबीसी क्रीमी लेयर पर तरह-तरह के सवाल सामने आ रहे हैं। अब सरकार खुद कोर्ट में गई। उसने 2025-26 के सिविल सर्विस पास करने वाले कैंडिडेट्स के मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मांगी। कोर्ट ऐसे मामलों को देखने के लिए स्पेशल बेंच बनाने को तैयार हो गई है।
OBC आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ तय करने के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार 25 अगस्त को फिर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई है। केंद्र सरकार ने 11 मार्च 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव और उसकी पिछली तारीख से लागू होने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। सरकार चाहती है कि कम से कम सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 और 2026 की प्रक्रिया को पुराने क्रीमी लेयर नियमों के आधार पर आगे बढ़ाने की अनुमति दी जाए। इसी मांग पर विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष पीठ गठित करने पर सहमति जताई है।
11 मार्च के फैसले से क्या बदला?
विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में 11 मार्च 2026 के फैसले से हुई। दो सदस्यीय पीठ ने कहा था कि OBC उम्मीदवार के माता-पिता की सैलरी या आय को अकेले आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय नहीं की जा सकती। खास तौर पर PSU या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के मामले में केवल वेतन को देखकर उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में डालना उचित नहीं होगा।अदालत ने स्पष्ट किया था कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में निर्धारित व्यवस्था के तहत माता-पिता के पद, सेवा की श्रेणी और सामाजिक स्थिति को भी देखा जाना जरूरी है। 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 8 सितंबर 1993 के मूल ऑफिस मेमोरेंडम की व्यवस्था को बदल या उसके ऊपर हावी नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना था कि समान स्थिति वाले सरकारी कर्मचारियों और PSU/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ केवल वेतन के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता है। अदालत के अनुसार क्रीमी लेयर का उद्देश्य OBC के सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग को आरक्षण से बाहर रखना है, न कि समान स्थिति वाले लोगों के बीच कृत्रिम भेद पैदा करना।
केंद्र की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि 11 मार्च के फैसले को पिछली तारीख से लागू करने पर केवल CSE-2025 ही नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में हुई बड़ी संख्या में भर्तियों और दाखिलों पर भी असर पड़ सकता है। केंद्र ने अदालत को बताया है कि 2016 के बाद केंद्रीय सरकारी पदों पर करीब 3.7 लाख OBC भर्तियां पुराने क्रीमी लेयर मानदंडों के आधार पर हुई हैं। इसके अलावा 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी भर्ती और परीक्षाएं इसी व्यवस्था के तहत हुई हैं या चल रही हैं। सरकार को आशंका है कि पुराने उम्मीदवार फैसले के आधार पर नए दावे पेश कर सकते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर मुकदमेबाजी शुरू हो सकती है।सरकार के मुताबिक रेलवे, बैंक, डाक विभाग और अर्धसैनिक बलों जैसी बड़ी भर्ती एजेंसियों के सामने बड़ी संख्या में अभ्यावेदन और मुकदमे आ सकते हैं। उच्च शिक्षा में भी उन उम्मीदवारों की ओर से नए दावे किए जा सकते हैं जिन्हें पहले OBC Non-Creamy Layer का लाभ नहीं मिला था। इससे नियुक्तियों, प्रवेशों और पहले से तय मामलों की स्थिति दोबारा खुल सकती है।
पदों की ‘समकक्षता’ तय करने में लग सकता है दो साल
केंद्र ने यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार सरकारी पदों के साथ PSU और अन्य संस्थानों में माता-पिता के पदों की समकक्षता तय करना आसान काम नहीं है। सरकार के अनुसार विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सार्वजनिक उपक्रमों और संस्थानों में पदों की स्थिति अलग-अलग है। उनकी सरकारी पदों से समकक्षता तय करने के लिए राज्यों और दूसरे संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श करना पड़ेगा। केंद्र ने संकेत दिया है कि इस प्रक्रिया में करीब दो वर्ष तक का समय लग सकता है। निजी क्षेत्र में समान पदों की समकक्षता तय करने में इससे भी अधिक समय लग सकता है।केंद्र की चिंता यह भी है कि अगर केवल आय को निर्णायक नहीं माना गया और पद की समकक्षता तय नहीं हुई, तो बहुत अधिक आय वाले कुछ उम्मीदवार भी OBC Non-Creamy Layer के दायरे में आ सकते हैं। सरकार ने दलील दी है कि इससे वास्तव में संसाधन-विहीन और जरूरतमंद OBC उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
सरकार को 958 उम्मीदवारों की चिन्ता ज्यादाः सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र की तत्काल चिंता CSE-2025 के 958 उम्मीदवारों को लेकर है। UPSC ने CSE-2025 के अंतिम परिणाम के बाद इन उम्मीदवारों की नियुक्ति की सिफारिश की है। केंद्र चाहता है कि इन उम्मीदवारों का सेवा आवंटन उस क्रीमी लेयर व्यवस्था के आधार पर पूरा किया जा सके, जो 11 मार्च के फैसले से पहले लागू थी।
CSE-2025 का नोटिफिकेशन 22 जनवरी 2025 को जारी हुआ था। प्रारंभिक परीक्षा 25 मई 2025 को और मुख्य परीक्षा 22 से 31 अगस्त 2025 के बीच हुई थी। UPSC ने 6 मार्च 2026 को अंतिम परिणाम घोषित कर 958 उम्मीदवारों की नियुक्ति की सिफारिश की। इसके सिर्फ पांच दिन बाद, 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने रोहित नाथन मामले में फैसला सुनाया। केंद्र का तर्क है कि उम्मीदवारों ने परीक्षा और आवेदन उस समय लागू कानूनी एवं प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर किया था। अब चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमों को पिछली तारीख से बदलने पर ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसमें समान परिस्थितियों वाले उम्मीदवारों के साथ अलग-अलग व्यवहार हो।
CSE-2025 की ट्रेनिंग और कैडर आवंटन पर भी असर
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि CSE-2025 के उम्मीदवारों के लिए लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA), मसूरी में फाउंडेशन कोर्स अगस्त के अंतिम सप्ताह में शुरू होने की संभावना है। अगर सेवा आवंटन में देरी होती है तो इसका असर IAS और IPS अधिकारियों के कैडर आवंटन के साथ-साथ वरिष्ठता, वेतन निर्धारण और अन्य केंद्रीय सेवाओं के प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर पड़ सकता है। सरकार ने इसलिए तत्काल अंतरिम दिशा-निर्देश देने की मांग की है।सुप्रीम कोर्ट में विशेष पीठ क्यों जरूरी हुई?
मंगलवार की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत तथा जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ के सामने हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से मामले को तत्काल सुनवाई के लिए रखा। केंद्र ने कहा कि DoPT ने पहले से निस्तारित मामले में एक Miscellaneous Application दाखिल की है और इस पर तत्काल निर्देश जरूरी हैं। इस पर अदालत को बताया गया कि 11 मार्च का मूल फैसला जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने दिया था, लेकिन अब दोनों जज अलग-अलग पीठों में हैं। इसके बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि “हमें एक विशेष पीठ गठित करनी होगी” और उन्होंने संबंधित जजों से चर्चा कर पीठ गठित करने की बात कही।केंद्र ने कहा- फैसला कमजोर करने की कोशिश नहींः सरकार ने अपनी याचिका में साफ किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को कमजोर या दरकिनार करने की मांग नहीं कर रही है। उसका आग्रह केवल यह है कि फैसले को CSE-2025 और 2026 जैसी चल रही या पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं पर किस तरह लागू किया जाए, इसे स्पष्ट किया जाए। केंद्र ने इसके लिए prospective overruling यानी भविष्य की प्रक्रियाओं पर फैसले को लागू करने के सिद्धांत का भी हवाला दिया है। सरकार का तर्क है कि CSE-2025 की चयन प्रक्रिया 11 मार्च के फैसले से पहले पूरी हो चुकी थी और उम्मीदवारों ने उस समय लागू नियमों के आधार पर परीक्षा दी थी।
मामला सिर्फ UPSC तक सीमित नहीं
इस विवाद का महत्व केवल सिविल सेवा परीक्षा तक सीमित नहीं है। यदि सुप्रीम कोर्ट 11 मार्च के फैसले को व्यापक रूप से पिछली भर्तियों पर लागू करता है, तो OBC आरक्षण के तहत हुई सरकारी नियुक्तियों, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं और उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिलों पर भी इसका असर पड़ सकता है। यही कारण है कि केंद्र ने अदालत से व्यापक निर्देश और व्यवस्था बनाने के लिए समय मांगा है। दूसरी ओर, 11 मार्च का फैसला यह स्थापित करता है कि OBC क्रीमी लेयर तय करने में केवल आय को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि संबंधित व्यक्ति के माता-पिता के पद और सेवा की स्थिति सहित 1993 के मूल ढांचे को देखना होगा।अब विशेष पीठ के गठन और उसकी सुनवाई से यह तय होगा कि 11 मार्च के फैसले का CSE-2025 और CSE-2026 पर क्या प्रभाव पड़ेगा और पुराने नियमों के आधार पर किए गए चयन तथा भविष्य में लागू होने वाली क्रीमी लेयर व्यवस्था के बीच कानूनी संतुलन कैसे बनाया जाएगा।