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क्या यूरोपीय संसद में सीएए-विरोधी प्रस्ताव के पीछे है पाकिस्तान?

क्या यूरोपीय संसद में सीएए-विरोधी प्रस्ताव के पीछे पाकिस्तान का हाथ है? इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से ब्रिटेन जा कर बसे सांसद ने यह प्रस्ताव यूरोपीय संसद में रखा। दूसरी बात यह है कि ब्रिटेन में पाकिस्तानी लॉबी काफी सक्रिय है। 

कौन है शफ़ाक मुहम्मद?

यूरोपीय संसद में नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पेश करने वाला व्यक्ति पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर का है। शफ़ाक मुहम्मद ही व्यक्ति है, जिसने यूरोपीय संसद में यह प्रस्ताव रखा है। वह मूल रूप से पीओके के मीरपुर इलाक़े के रहने वाले हैं, लेकिन बाद में वह ब्रिटेन चले गए। शफ़ाक यूरोपीय संसद के लिए ब्रिटेन से चुने गए। 
ब्रिटेन की महारानी ने 2015 में शफ़ाक को ऑर्डर ऑफ़ ब्रिटिश अम्पायर (ओबीई) से नवाज़ा। उन्हें शेफ़ील्ड सिटी कौंसिल के कौंसिलर के रूप में अच्छा काम करने के लिए यह पुरस्कार दिया गया। 

यूरोपीय संसद के 751 सदस्यों में से 154 ने उस प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिसमें नागरिकता क़ानून का विरोध किया गया है और इस मुद्दे पर भारत की आलोचना की गई है। इस प्रस्ताव पर 29 जनवरी को बहस और 30 जनवरी को उस पर मतदान होने की संभावना है। 

पाकिस्तान का हाथ?

पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस प्रस्ताव के पीछे पाकिस्तान सरकार का हाथ होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
ब्रिटेन में पाकिस्तान के लिए काम करने वाली मजबूत लॉबी तो है ही, ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है। वे कई निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।
ब्रिटेन में पाकिस्तान की मजबूत स्थिति को इससे भी समझा जा सकता है कि वहाँ के मुख्य विपक्षी दल लेबर पार्टी ने अपने सम्मेलन में कश्मीर की स्थिति पर ख़ास रूप से चर्चा की और भारत पर दबाव डालने और कश्मीरियों के हितों की रक्षा करने की रणनीति का भी खुलासा किया। नतीजा यह हुआ कि भारतीय मूल के कुछ लोगों ने लेबर पार्टी छोड़  दी। वहाँ भारतीय मूल के कुछ लोगों ने खुले आम लेबर पार्टी का विरोध करने और कंजरवेटिव पार्टी के पक्ष में वोट डालने की अपील कर डाली। 
यूरोपीय संसद में प्रस्ताव पारित होने पर भारत की किरकिरी होगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे शर्मसार होना पड़ेगा। भारत पर इससे अधिक कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि यूरोपीय संसद के प्रस्ताव को मानने के लिए तकनीकी रूप से भारत बाध्य नहीं है।

पारित हो पाएगा प्रस्ताव?

यूरोपीय संसद में प्रस्ताव पारित होने को लेकर गंभीर संशय की स्थिति बनी हुई है। यह बताना अभी मुश्किल है कि इस प्रस्ताव का क्या हश्र होगा। यूरोपीय संसद के ज़्यादातर सदस्य देशों में भारत की छवि बेहतर रही है, जो इन दिनों धीरे-धीरे खराब हो रही है। लेकिन अभी भी भारत की छवि पाकिस्तान की तुलना में बेहतर है।

एक दूसरी अहम बात यह है कि ये सभी सदस्य देश मोटे तौर पर ईसाई बहुल हैं। स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, क्रोएशिया और ब्रिटेन ऐसे देश हैं, जहाँ मुसलमानों की तादाद कुछ ज़्यादा है। लेकिन इन देशों में भी मुसलमान देश के चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए इन देशों से चुने गए सांसद इस दवाब में कतई नहीं होंगे कि उन्होंने प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया तो उनका राजनीतिक भविष्य खराब हो जाएगा। 

लेकिन यूरोपीय संसद के प्रस्ताव का नैतिक महत्व है। भारत के बाद यह सबसे बड़ी संसद है और सबसे ज़्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें 28 देशों के 37.50 करोड़ लोगों के चुने हुए 751 सदस्य हैं। इनके प्रस्ताव का नैतिक असर भारत पर ज़रूर पड़ेगा। 

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क़मर वहीद नक़वी
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