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मोदी के कामकाज से लोग नाखुश, अमेरिकी सर्वे का दावा

ज़्यादातर भारतीय पिछले पाँच साल यानी नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान हुए कामकाज और देश की प्रगति से नाखुश हैं। वे इस दौरान हुए कामकाज को लेकर अच्छी राय नहीं रखते। अमेरिकी शोध संस्थान 'प्यू रिसर्च सेंटर' ने 23 मई से 23 जुलाई 2018 के बीच 2,521 लोगों का सर्वे किया। इस सर्वे में पाया गया कि ज़्यादातर लोग बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को देश की बड़ी समस्या मानते हैं और पिछले पाँच साल के सरकार के कामकाज से नाखुश हैं। 
इस सर्वे में पाया गया कि सिर्फ़ 21 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि मोदी सरकार के दौरान रोज़गार के मौक़े पहले की तुलना में बढ़े हैं। दूसरी ओर, लगभग 67 फ़ीसद लोगों का मानना है कि स्थिति बदतर हुई है, इनमें लगभग 47 प्रतिशत लोगों का तो कहना है कि स्थिति बहुत ही बुरी हुई है।
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प्यू रिसर्च सेंटर को अमेरिका का ‘फ़ैक्ट टैंक’ माना जाता है, जो समाज शास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र के विषयों पर तथ्यपरक सर्वे और शोध करता रहता है।  
प्यू रिसर्च सेंटर ने पाया है कि 65 प्रतिशत लोगों का मानना है कि देश में पहले से अधिक भ्रष्टाचार है, जिनमें 41 प्रतिशत लोग मानते हैं कि स्थिति पहले से बहुत ही बदतर है। लगभग 64 प्रतिशत लोगों की राय है कि लगभग सभी नेता भ्रष्ट हैं।
बीजेपी और कांग्रेस दोनों के ही 69 प्रतिशत समर्थकों ने कहा कि उनके चुने हुए जन प्रतिनिधि भ्रष्ट होते हैं। आम चुनाव के साल हुए इस सर्वे में 58 फ़ीसदी लोगों की राय है कि चुनाव के बाद कोई जीत कर आए, स्थिति में सुधार नहीं होने को है।
प्यू रिसर्च सेंटर ने यह सर्वे 23 मई से 23 जुलाई 2018 के बीच यानी पुलवामा आतंकवादी हमले से तक़रीबन सात महीने पहले किया था। लेकिन उस समय भी ज़्यादातर लोगों ने पाकिस्तान को देश की सुरक्षा के लिए बड़ा ख़तरा माना था और आतंकवाद पर चिंता जताई थी। लगभग 76 प्रतिशत भारतीयों का मानना था कि पाकिस्तान से भारत को ख़तरा है, इनमें 63 प्रतिशत लोग तो यह मानते थे कि पड़ोसी मुल्क बहुत बड़ा ख़तरा है।
पाकिस्तान को ख़तरा मानने वालों में सभी आयु वर्ग के लोग थे, इनमें बीजेपी और नरेंद्र मोदी के समर्थक ही नहीं, कांग्रेस और राहुल गाँधी के समर्थक भी शामिल थे। 
आधे से अधिक यानी 51 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कश्मीर बहुत बड़ी समस्या है और 53 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पिछले पाँच साल में कश्मीर समस्या पहले से बदतर हुई है, दूसरी ओर सिर्फ़ 18 प्रतिशत लोगों ने माना कि कश्मीर की स्थिति में सुधार हुआ है।
भारत की समस्याओं पर सवाल करने पर प्यू रिसर्च सेंटर ने पाया कि सबसे अधिक 73 प्रतिशत लोगों ने कहा कि महंगाई सबसे बड़ी समस्या है। इसके अलावा लोगों ने भ्रष्ट अफ़सर, आतंकवाद और अपराध को भी बड़ी समस्याएँ माना।

इस सर्वे में ज़्यादातर लोग आर्थिक प्रगति से खुश नज़र आए। लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने कहा कि औसत लोगों की आर्थिक स्थिति 20 साल पहले की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। सिर्फ़ 15 प्रतिशत लोगों ने माना कि स्थिति बदतर हुई है। लगभग 55 फ़ीसदी लोग देश की आज की स्थिति से खुश लगे और माना कि देश सही दिशा में बढ़ रहा है, पर 2017 में ऐसा मानने वालों की तादाद 70 प्रतिशत थी।

दिलचस्प बात यह है कि यह सर्वे आम चुनाव के कुछ महीने पहले ही हुआ है और यह सरकार के कई दावों के उलट नतीजा देता है। ऐसे समय जब सरकार विकास के तरह-तरह के दावे कर रही है और जो आँकड़े इसके मनमाफ़िक नहीं हैं, उन्हें छुपा रही है या उनसे छेड़छाड़ कर रही है, इस सर्वे से कई असुविधानजक नतीजे सामने आए हैं।
सर्वे से यह साफ़ है कि ज़्यादातर लोग सरकार से ख़ुश नहीं हैं। सरकार ने बेरोज़गारी के आँकड़ों को भले ही छुपा लिया हो, बहुत बड़ी तादाद में लोग मानते हैं कि बेरोज़गारी बढ़ी है, महंगाई बढ़ी है और ये देश की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं।
लेकिन सरकार के लिए असुविधानजक स्थिति तो यह है कि लोग यह भी मानते हैं कि मोदी सरकार आने के बाद से भ्रष्टाचार बढ़ा है। साल 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार पर भ्रष्टाचार के ज़बरदस्त आरोप लगाते हुए कहा था, ‘न खाऊँगा न खाने दूँगा।’ अब इस पर बीजेपी क्या कहती है, यह देखना अधिक दिलचस्प होगा।

सत्तारूढ़ दल ने जिस तरह राष्ट्रवाद और पाकिस्तान का मुद्दा उछाला है, सर्वे के नतीजे उसके लिए संतोष की बात है। ज़्यादातर लोगों ने यह कहा है कि इस पड़ोसी मुल्क से भारत को ख़तरा है। लेकिन यह तो पुलवामा हमले के सात महीने के सर्वे की बात है। मुमकिन है कि अब ऐसा मानने वालों की तादाद पहले से अधिक हो। लेकिन इसके साथ यही भी ध्यान रखना होगा कि ज़्यादातर लोगों ने कश्मीर समस्या को पहले से अधिक विकट माना है। पुलवामा आतंकवादी हमले और बालाकोट हमले को कश्मीर से जोड़ कर ही देखा जाता है।

चुनाव के पहले प्यू रिसर्च सेंटर का यह नतीजा बीजेपी के लिए शुभ संकेत नहीं है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

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क़मर वहीद नक़वी
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