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कोरोना ने 3.2 करोड़ भारतीयों को मध्य वर्ग से वंचित किया: प्यू रिसर्च

पिछले साल आई कोरोना महामारी ने लोगों की जानें ही नहीं लीं, ग़रीबों को और ग़रीब ही नहीं किया, बल्कि बड़े स्तर पर मध्य वर्ग को भी प्रभावित किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार इस महामारी ने भारत में 3 करोड़ 20 लाख लोगों को मध्य वर्ग से दूर कर दिया। अमेरिका के प्रतिष्ठित प्यू रिसर्च सेंटर ने यह रिपोर्ट कुछ दिन पहले जारी की है। इसने कहा है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कोरोना महामारी और लॉकडाउन में बड़े पैमाने पर नौकरियाँ गईं और इसने लाखों लोगों को ग़रीबी में धकेल दिया।

वैसे, प्यू रिसर्च से अलग दूसरे सर्वे की बात करें तो ओवरऑल बेरोज़गारी दर डरावनी स्तर तक पहुँच गई है। इस साल की शुरुआत में ही सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आँकड़ों के अनुसार, दिसंबर में राष्ट्रीय बेरोज़गारी दर 9.06 प्रतिशत पर पहुँच गई। यह नवंबर में 6.51 प्रतिशत थी। इसी तरह ग्रामीण बेरोज़गारी दिसंबर में 9.15 प्रतिशत पर थी, यह नवंबर में 6.26 प्रतिशत पर थी। यानी लॉकडाउन के बाद भी बेरोज़गारी दर बढ़ती ही दिखी।

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अंतरराष्ट्रीय संस्था ऑक्सफ़ैम ने अपनी रिपोर्ट 'द इनइक्वैलिटी वायरस' में ऐसी ही डरावनी रिपोर्ट दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस और उस वजह से हुए लॉकडाउन की वजह से जहाँ एक ओर 12 करोड़ लोगों का रोज़गार गया, वहीं सबसे धनी अरबपतियों की जायदाद 35 प्रतिशत बढ़ गई। इस दौरान भारत के सौ अरबपतियों की संपत्ति में 12.97 खरब रुपए का इज़ाफ़ा हुआ। 

अब जो प्यू रिसर्च ने रिपोर्ट दी है उसके अनुसार, भारत में मध्य वर्ग 3.2 करोड़ लोग कम हो गए। यानी यदि महामारी न हुई होती तो इतने भारतीय मध्य वर्ग के दायरे में होते। 

रिपोर्ट के अनुसार मध्य वर्ग से मतलब उन लोगों से है जो हर रोज़ 700 रुपये से लेकर 1400 रुपये की कमाई कर लेते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि महामारी से पहले का आकलन था कि 9 करोड़ 90 लाख मध्य वर्ग होगा, लेकिन मध्य वर्ग 6 करोड़ 60 लाख तक सिमट कर रह गया है। 

प्यू रिसर्च में यह भी कहा गया है कि हर रोज़ 145 रुपये से कम कमाने वाले लोगों यानी ग़रीबों की संख्या 7 करोड़ 50 लोग और बढ़ गई है।

महामारी और लॉकडाउन के बाद देश में आर्थिक मंदी आ गई थी। आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी विकास दर एक समय गिरकर -24.4 फ़ीसदी तक पहुँच गई थी। इसने आम लोगों को काफ़ी ज़्यादा प्रभावित किया। इसके बाद लोगों की नौकरियाँ जाना, वेतन में कटौती और डीजल-पेट्रोल की बढ़ती क़ीमतों ने लोगों की स्थिति और ख़राब ही की है।

pew research says coronavirus pushed 32 million indians out of middle class - Satya Hindi

कोरोना के कमजोर पड़ने पर उम्मीद थी कि भारत की अर्थव्यवस्था साल ख़त्म होने से पहले ही पटरी पर लौटती दिखने लगेगी। और ऐसा ही होता दिख रहा है। लगातार ऐसी रिपोर्ट और आँकड़े सामने आ रहे हैं कि भारत में रिकवरी की रफ़्तार उम्मीद से तेज़ है। भारत सरकार की न मानें तब भी देश और दुनिया की तमाम संस्थाओं की गवाही मौजूद है। रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर यानी एसएंडपी का कहना है कि अगले वित्त वर्ष में भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा।

तीसरी तिमाही में जीडीपी विकास दर सकारात्मक हो गई। सरकार की ओर से जारी अक्टूबर-दिसंबर में यह विकास दर 0.4 फ़ीसदी रही। लेकिन इस बीच कोरोना संक्रमण बढ़ने से फिर से संकट के बादल छाने लगे हैं।

देश में कोरोना की दूसरी लहर की आहट महसूस की जा सकती है। केंद्र सरकार ने तो महाराष्ट्र के लिए कह दिया है कि राज्य में दूसरी लहर आ चुकी है। राज्य में पिछले 24 घंटे में संक्रमण के 25,833 नए मामले सामने आए हैं। यह एक रिकॉर्ड है। इससे पहले राज्य में सबसे ज़्यादा संक्रमण के मामले पिछले साल 11 सितंबर को 24 हज़ार 886 संक्रमण के मामले आए थे।

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पूरे देश में ही संक्रमण के मामले काफ़ी तेज़ी से बढ़ने लगे हैं। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की और त्वरित क़दम उठाने की ज़रूरत बताई। प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें कोरोना की दूसरी लहर को बढ़ने से जल्द रोकना होगा।

अब फिर से आशंका है कि देश की अर्थव्यवस्था पर कोरोना की आँच कहीं पिछले साल की तरह तो नहीं आएगी?

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