संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद (MBZ) की हालिया छोटी भारत यात्रा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया असाधारण महत्व केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि बदलते पश्चिम एशिया और इस्लामिक दुनिया के शक्ति-संतुलन से जुड़ा एक स्पष्ट रणनीतिक संकेत माना जा रहा है। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग तेज हुआ है, तुर्की भी इस धुरी से जुड़ने की इच्छा जता रहा है और तथाकथित ‘मुस्लिम NATO’ को लेकर चर्चाएं फिर से जोर पकड़ रही हैं।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, MBZ की यात्रा की अवधि भले ही कम रही हो, लेकिन इसका राजनीतिक और रणनीतिक संदेश बेहद व्यापक है। भारत अब UAE को सिर्फ ऊर्जा आपूर्तिकर्ता या प्रवासी भारतीयों की मंज़िल के रूप में नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की राजनीति में एक निर्णायक शक्ति के तौर पर देख रहा है। लेकिन कुछ और भी वजहें हैं।

पाकिस्तान–सऊदी रक्षा नजदीकियां और भारत की चिंता

हाल के महीनों में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रशिक्षण और सुरक्षा सहयोग को नई गति मिली है। कूटनीतिक हलकों में इसे पाकिस्तान द्वारा एक बार फिर इस्लामिक एकजुटता के सहारे रणनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। भारत के लिए यह संकेत संवेदनशील है, खासकर तब जब कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान इस्लामिक मंचों का सहारा लेता रहा है। हाल ही में सऊदी अरब और यूएई के बीच संबंध बिगड़े थे। भारत ने इस मौके का फायदा उठाने में देर नहीं लगाई। एमबीज़ेड की भारत यात्रा को उसी से जोड़ा जा रहा है।

हालांकि, भारत यह भी समझता है कि सऊदी अरब की विदेश और रक्षा नीति कई स्तर पर तय की जाती है, जबकि UAE में निर्णय प्रक्रिया काफी हद तक राष्ट्रपति MBZ के नेतृत्व में केंद्रीकृत है। यही कारण है कि भारत के लिए MBZ के साथ सीधा और मजबूत संबंध अधिक प्रभावी माना जाता है। यूएई में अबू धाबी, दुबई, शारजाह, अजमान, उम्म अल कुवैन और फुज़ैरा राज्य आते हैं। इनको मिलाकर यूएई कहा जाता है।

तुर्की और ‘मुस्लिम NATO’ की चर्चा

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान लंबे समय से खुद को मुस्लिम दुनिया के वैचारिक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान के साथ उनकी नजदीकियां और कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख दिल्ली के लिए चिंता का विषय रहा है। तुर्की, पाकिस्तान और कुछ अन्य देशों के संभावित सैन्य-राजनीतिक गठजोड़ को अनौपचारिक रूप से ‘मुस्लिम NATO’ कहा जा रहा है, हालांकि इसकी कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। हाल ही में जब पाकिस्तान और सऊदी अरब का रक्षा समझौता हुआ तो तुर्की ने उसमें शामिल होने की इच्छा जताई। इसी के बाद से मुस्लिम नाटो की चर्चा सामने आई। 

हालांकि मुस्लिम नाटो को लेकर भारतीय रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठजोड़ अधिकतर वैचारिक और राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित है। इसमें वास्तविक सैन्य एकरूपता का अभाव है। पाकिस्तान ही इसका ज्यादा प्रचार कर रहा है। जबकि सऊदी अरब से इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा गया है।

UAE-भारत संतुलित साझेदार

ऐसे माहौल में UAE भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति साबित हो सकता है। MBZ के नेतृत्व में UAE ने राजनीतिक इस्लाम और कट्टरपंथ से दूरी बनाई है। इसराइल के साथ अब्राहम समझौते के तहत संबंध सामान्य किए हैं और भारत के साथ रक्षा, खुफिया सहयोग तथा निवेश के क्षेत्र में मजबूत साझेदारी विकसित की है।

कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा MBZ को दिया गया विशेष महत्व यह संदेश देता है कि भारत के पास इस्लामिक दुनिया में भी मजबूत, व्यावहारिक और प्रभावशाली साझेदार हैं और पाकिस्तान किसी भी तरह से मुस्लिम देशों की सामूहिक आवाज नहीं है।

एमबीज़ेड के बहाने कई देशों को संदेश

MBZ की यात्रा के जरिए भारत ने एक साथ कई देशों को संकेत देने की कोशिश की है- पाकिस्तान को कि भारत ने इस्लामिक कूटनीति के उसके प्रयासों को झटका दे दिया है। सऊदी अरब को भी संदेश है कि भारत के पास खाड़ी क्षेत्र में वैकल्पिक और मजबूत रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं। तुर्की के लिए संदेश है कि भारत किसी वैचारिक गठजोड़ से अलग, स्थिरता-आधारित साझेदारियों को प्राथमिकता देता है। पश्चिमी देशों को भी यह संदेश है कि भारत पश्चिम एशिया, इसराइल और वैश्विक शक्तियों के बीच एक पुल की भूमिका निभा सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, MBZ की छोटी लेकिन प्रभावशाली यात्रा यह साफ करती है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत केवल प्रतिक्रियात्मक कूटनीति नहीं, बल्कि सक्रिय और संतुलनकारी रणनीति अपना रहा है। मौजूदा दौर में यात्राओं की अवधि से अधिक उनके पीछे छिपे राजनीतिक संदेश मायने रखते हैं और MBZ की यह यात्रा उसी का उदाहरण है।