उमर खालिद बिना ट्रायल शुरू हुए ही पाँच साल से जेल में हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत अधिकार होना चाहिए, खासकर जब त्वरित मुकदमा संभव नहीं हो। चंद्रचूड़ के इस बयान पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
उमर खालिद, पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़
उमर खालिद की जमानत को लेकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत मिलना एक अधिकार की तरह होना चाहिए। हालाँकि, उनके इस बयान पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर पूछा जा रहा है कि जब वह सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई थे तब भी उमर खालिद को जमानत नहीं मिली।
सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने कहा है, 'ऐसा पूर्व सीजेआई का कहना है, जिन्होंने उमर खालिद की ज़मानत याचिका जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच को भेजी थी, जो पहले मोदी की लॉ सेक्रेटरी रह चुकी हैं और मोदी सरकार की इच्छाओं के खिलाफ न जाने के लिए जानी जाती हैं।'
तो प्रशांत भूषण जैसे वकील यह सवाल क्यों उठा रहे हैं? क्या उमर खालिद को जमानत देने के मामले में ईमानदार कोशिश की गई? आख़िर उमर खालिद के साथ अब तक क्या हुआ है? इन सवालों के जवाब जानने से पहले यह जान लें कि आख़िर पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने क्या कहा है। चंद्रचूड़ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक कार्यक्रम में पत्रकार वीर सांघवी के सवाल का जवाब दे रहे थे। यह सवाल 2020 दिल्ली दंगों के साजिश मामले में उमर खालिद की जमानत याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर आधारित था। उमर खालिद पिछले पांच साल से जेल में हैं।
जल्द सुनवाई संभव नहीं तो बेल मिले: चंद्रचूड़
चंद्रचूड़ ने कहा, 'मैं अपनी अदालत की आलोचना करने में हिचकिचाता हूं, क्योंकि मैंने एक साल पहले ही इस संस्थान का नेतृत्व किया था। लेकिन ये सिद्धांत कहते हैं कि आप शर्तें लगा सकते हैं, लेकिन तेज ट्रायल सुनिश्चित करना चाहिए। अगर तेज ट्रायल संभव नहीं है तो जमानत नियम होनी चाहिए, अपवाद नहीं।'
चंद्रचूड़ ने कहा, 'मैं अब जज के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक के रूप में बोल रहा हूँ। यह दोष सिद्ध होने से पहले जमानत के अधिकार के बारे में है। हमारा कानून निर्दोष होने की धारणा पर आधारित है- हर आरोपी तब तक निर्दोष है, जब तक मुक़दमे में दोषी साबित न हो। ट्रायल से पहले जमानत सजा नहीं हो सकती। अगर कोई व्यक्ति पांच-सात साल जेल में रहता है और फिर बरी हो जाता है तो गँवाए हुए समय की भरपाई कैसे होगी?'राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून में बदलाव
पूर्व सीजेआई ने समझाया, 'अगर कोई सीरियल रेपिस्ट-मर्डरर है, जो सात हत्याओं का आरोपी है, तो वह समाज में बाहर आने पर फिर अपराध कर सकता है। यह जमानत न देने का एक क्लासिक मामला है। दूसरा, अगर जमानत के बाद व्यक्ति ट्रायल में नहीं आता और भाग जाता है। तीसरा, अगर वह सबूतों से छेड़छाड़ करता है। अगर ये तीन अपवाद नहीं लागू होते तो जमानत का नियम होना चाहिए। आज की समस्या यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून साबित होने से पहले निर्दोष नहीं, दोषी मानने पर जोर देते हैं।'
उन्होंने आगे बताया कि अदालतों को जाँच करनी चाहिए कि क्या वाकई राष्ट्रीय सुरक्षा शामिल है और क्या हिरासत जरूरी है। अन्यथा, लोग सालों तक जेल में सड़ते रहते हैं।
चंद्रचूड़ ने आपराधिक न्याय प्रणाली में खामियों को भी गिनाया। उन्होंने कहा कि मुक़दमे सही समय में ख़त्म नहीं होते, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत तेज ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है।
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर कोई कानून जमानत देने से मना करता है तो भी संविधान सर्वोच्च है। इसलिए अपवादों के बिना जमानत मिलनी चाहिए।
उन्होंने हाई कोर्ट और जिला अदालतों की आदत पर चिंता जताई जहां जमानत देने से बचते हैं। उन्होंने कहा कि यह एक चिंताजनक ट्रेंड है।
इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि देश में अधिकारियों पर आम तौर पर अविश्वास होता है। उन्होंने कहा, "जज सोचते हैं, 'अगर मैं जमानत दे दूं तो मेरे मक़सद पर सवाल उठेंगे'। वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में जज की ईमानदारी पर शक होता है। बेहतर है कि वे हाई कोर्ट जाएँ। नतीजा यह होता है कि सुप्रीम कोर्ट में हर साल 70000 केस जमा हो जाते हैं।"
उन्होंने कहा, "अगर कोई जिला जज गलत जमानत देता है, जैसे दहेज हत्या के मामले में तो उसे पलट दें। लेकिन नैतिक दबाव न डालें। इससे जजों में डर का माहौल बनता है। हाई कोर्ट की छोटी-सी टिप्पणी करियर बर्बाद कर सकती है, प्रमोशन प्रभावित कर सकती है। यह ट्रायल जजों के मूल्यांकन की समस्या है।"
उमर खालिद बिना ट्रायल 5 साल से जेल में
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे हुए थे। ये सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भड़के। पुलिस का कहना है कि यह कोई अचानक हिंसा नहीं थी, बल्कि सोची-समझी साजिश थी। उमर खालिद सितंबर 2020 से जेल में हैं। उन पर यूएपीए और पुरानी आईपीसी की धाराएँ लगी हैं। दंगों के समय उमर दिल्ली में नहीं थे। लेकिन पुलिस कहती है कि प्लानिंग पहले हो चुकी थी।
उमर खालिद के अलावा याचिकाकर्ताओं में गुलफिशा फातिमा, शरजील इमाम, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। ये बिना ट्रायल शुरू हुए पिछले पांच साल से ज्यादा समय से जेल में हैं। इनकी मुख्य दलील है कि इतने लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखना गलत है। पुलिस इन्हें दंगों का 'मास्टरमाइंड' बता रही है। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से ज्यादा घायल हुए थे। दंगे नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान भड़के थे।कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
देरी के सवाल पर हाईकोर्ट ने बोला था कि जल्दबाजी में ट्रायल करना आरोपियों और दिल्ली सरकार दोनों के अधिकारों को नुक़सान पहुंचाएगा। सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान आरोपियों की तरफ से सीनियर एडवोकेट एएम सिंघवी और कपिल सिब्बल ने पूछा कि एक महिला को करीब छह साल से अंडरट्रायल बनाकर जेल में रखने से क्या सार्वजनिक हित सध रहा है? कपिल सिब्बल ने कहा कि इतनी लंबी हिरासत ट्रायल से पहले ही सजा जैसी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका ख़ारिज कर दी।