प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के तहत उपलब्ध फंड का केवल 4% ही उपयोग हुआ है। क्या मोदी सरकार की यह योजना भी फेल हो गई है? पढ़िए, क्या वजह है धीमी प्रगति के पीछे।
मोदी सरकार की एक और योजना फ्लॉप साबित होती दिख रही है। युवाओं को रोजगार के अवसर बढ़ाने वाली प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना का खूब ढोल पीटा गया। युवाओं को शीर्ष 500 कंपनियों में इंटर्नशिप दी जानी थी और सरकार की ओर से इसके लिए फंड मुहैया कराना जाना था। लेकिन सरकारी फंड का सिर्फ़ 4 फीसदी ही ख़र्च हुआ। पाँच साल में एक करोड़ की इंटर्नशिप देने की इस योजना का हाल ऐसा है कि कुछ हज़ार युवा ही अब तक इंटर्नशिप पूरी कर पाए हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का हाल भी ऐसा ही होने की ख़बर आई थी। सीएजी ने तो इसमें बहुत बड़े घपले का इशारा किया है और कहा है कि योजना का पूरा मक़सद ही भटक गया है।
युवाओं को नौकरी के लिए तैयार करने के मक़सद से शुरू की गई प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना पर अब सवाल उठ रहे हैं। सरकारी खर्च के आंकड़े इस बात को साफ-साफ दिखा रहे हैं कि योजना जमीन पर ठीक से नहीं चल पा रही है।
11500 करोड़ में से 500 करोड़ ही ख़र्च
हिंदू बिजनेस लाइन की रिपोर्ट में कंट्रोलर जनरल ऑफ़ एकाउंट्स यानी सीजीए के आँकड़ों के हवाले से कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 के पहले आठ महीनों यानी अप्रैल से नवंबर में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय को 11500 करोड़ रुपये से ज्यादा का बजट मिला था, लेकिन मंत्रालय ने सिर्फ़ 500 करोड़ रुपये के आसपास ही खर्च किए। यानी कुल बजट का महज 4 प्रतिशत ही इस्तेमाल हुआ।
इसमें सबसे बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के लिए रखा गया था। कुल बजट में से करीब 10800 करोड़ रुपये यानी 94 प्रतिशत सिर्फ इसी योजना के लिए थे। लेकिन योजना की खराब स्थिति की वजह से इतना बड़ा फंड इस्तेमाल ही नहीं हो पाया।
पिछले वित्त वर्ष में ख़र्च हुए थे 680 करोड़
यह पहली बार नहीं हुआ है। पिछले साल यानी वित्तीय वर्ष 2025 में भी ऐसा ही हुआ था। शुरू में मंत्रालय को 2667 करोड़ रुपये का बजट दिया गया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर सिर्फ 1078 करोड़ कर दिया गया क्योंकि बहुत सारा पैसा खर्च नहीं हुआ। संसदीय समिति को मंत्रालय ने खुद बताया था कि इंटर्नशिप योजना में कम इस्तेमाल की वजह से पैसा वापस करना पड़ा। पिछले वित्त वर्ष में कुल ख़र्च सिर्फ 680 करोड़ रुपये के आसपास रहा।
युवाओं में कम रुचि क्यों?
आँकड़े बताते हैं कि युवाओं की तरफ़ से भी योजना में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिख रही। संसद में 15 दिसंबर 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लिखित जवाब में बताया था कि योजना के पहले दौर के पायलट प्रोजेक्ट में 1.27 लाख इंटर्नशिप के मौक़ों को लेकर 6.21 लाख आवेदन आए।
कंपनियों ने 82000 से ज्यादा ऑफर दिए, लेकिन सिर्फ 28000 ही युवाओं ने स्वीकार किए। यानी स्वीकृति दर महज 34 प्रतिशत रही। 30 नवंबर 2025 तक सिर्फ 2066 इंटर्न्स ने अपनी इंटर्नशिप पूरी की थी।
दूसरे दौर में भी हालत लगभग वैसी ही रही। 1.18 लाख मौकों पर 83,000 से ज्यादा ऑफर गए, लेकिन स्वीकृति सिर्फ 24600 के आसपास रही, यानी दर 30 प्रतिशत से भी कम।
क्यों नहीं ले रहे युवा इंटर्नशिप?
सरकार की तरफ़ से इसका कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन अधिकारी मानते हैं कि इंटर्न्स को मिलने वाली बहुत कम आर्थिक मदद इसका बड़ा कारण हो सकता है। योजना के तहत इंटर्न को 12 महीने के लिए हर महीने सिर्फ 5000 रुपये मिलते हैं। साथ में एक बार में 6000 रुपये का ग्रांट और बीमा कवर भी दिया जाता है। कई युवा इसे कम मानकर शायद बेहतर विकल्प तलाश रहे हैं।
2024-25 के बजट में घोषणा की गई थी कि अगले पांच साल में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप दी जाएगी। लेकिन पायलट चरण में ही खर्च और हिस्सेदारी के आँकड़े बताते हैं कि योजना को अभी बहुत मेहनत की ज़रूरत है।
क्या राहुल की प्रस्तावित योजना से प्रेरित थी?
कांग्रेस आरोप लगाती रही है कि मोदी सरकार की प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना राहुल गांधी की उस प्रस्तावित योजना से प्रेरित है जिसकी घोषणा उन्होंने चुनाव से पहले कांग्रेस के घोषणापत्र में की थी। कांग्रेस ने लगातार दावा किया है कि यह कांग्रेस के 2024 चुनावी घोषणा-पत्र से नकल की गई है। दरअसल, मार्च 2024 में कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव से पहले 'राइट टू अप्रेंटिसशिप' या 'पहली नौकरी पक्की' योजना की घोषणा की। इसके तहत एक साल तक 8500 रुपये प्रति महीने स्टाइपेंड देने का प्रस्ताव था। कांग्रेस ने इसका अधिकार देने की बात की थी।
हालाँकि, मोदी सरकार ने एक सामान्य योजना शुरू की, लेकिन इसमें युवा अधिकार नहीं मांग सकते हैं। जुलाई 2024 के केंद्रीय बजट में घोषित और अक्टूबर 2024 में लॉन्च की गई। यह 2024-25 बजट का हिस्सा है, जो युवा बेरोजगारी को दूर करने के लिए 5 योजनाओं में से एक है।प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में घोटाले का आरोप
हाल ही में कांग्रेस ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना यानी पीएमकेवीवाई में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी ने इसके लिए सीएजी यानी कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया की हालिया रिपोर्ट को आधार बनाया है। इसने कहा है कि सीएजी की रिपोर्ट ने इस योजना में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े और घोटाले का खुलासा किया है। यह योजना युवाओं को कौशल सिखाकर नौकरी दिलाने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक़ इसमें देश के करदाताओं के पैसे का ग़लत इस्तेमाल हुआ है।
कांग्रेस नेता और पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'पीएमकेवीवाई मोदी सरकार की योजना थी, जिसके बारे में सबने सुना है। 2015 से 2022 तक की सीएजी रिपोर्ट आई है, जिसमें भयंकर स्कैम का पर्दाफाश हुआ है। पहले यह नेशनल स्किल डेवलपमेंट मिशन था, लेकिन मोदी सरकार ने इसका नाम बदलकर पीएमकेवीवाई कर दिया और रिपैकेज किया।'
कांग्रेस ने क्या आरोप लगाए?
गोपीनाथन ने आरोप लगाया कि पिछले 7 साल में 10 हजार करोड़ रुपए ऐसे लोगों को बांटे गए हैं, जिनके न फोन नंबर हैं और न कोई सही ईमेल एड्रेस। उन्होंने कहा कि पीएमकेवीवाई के तहत ट्रेनिंग पार्टनर्स को एनरॉलमेंट, सर्टिफिकेशन और प्लेसमेंट के समय पैसा दिया जाता रहा है, लेकिन जब केरल की एक कंपनी में ऑडिट किया गया तो पता चला कि वहां लोगों का प्लेसमेंट ही नहीं हुआ है।