यूजीसी नियमों को लेकर सरकार के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। मंगलवार को सरकार ने पहली बार बयान दिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दुरुपयोग न होने का आश्वासन दिया है। सुप्रीम कोर्ट में इसी मुद्दे पर जनहित याचिका दायर की गई है।
यूजीसी नियमों के खिलाफ मंगलवार को छात्रों का प्रदर्शन
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026' को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। छात्रों, शिक्षकों, बीजेपी नेताओं-कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों ने इन नियमों को वापस लेने की मांग की है, जबकि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने निष्पक्ष ढंग से लागू करने का भरोसा दिया है।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को ये नियम अधिसूचित किए थे, जिसने 2012 के पुराने एंटी-डिस्क्रिमिनेशन फ्रेमवर्क की जगह ली है। इन नियमों के तहत सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स, इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड्स, 24x7 हेल्पलाइन और शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना अनिवार्य हैं। इनका उद्देश्य अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य वंचित समूहों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव को रोकना, सामाजिक विविधता को बढ़ावा देना और संवैधानिक सामाजिक न्याय को मजबूत करना है।
विरोध क्यों हो रहा है
विरोधियों का कहना है कि ये नियम अस्पष्ट, एकतरफा और दुरुपयोग की आशंका से भरे हुए हैं। सामान्य वर्ग के छात्रों, शिक्षकों और सवर्ण समुदाय के लोगों का आरोप है कि इक्विटी कमेटी और स्क्वॉड में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की अनिवार्यता नहीं है, जिससे इनमें अत्यधिक शक्ति आ सकती है। "भेदभाव" की परिभाषा अस्पष्ट होने से झूठी शिकायतों का खतरा है, और सामान्य वर्ग के छात्रों को "संभावित अपराधी" मानकर उलटा भेदभाव हो सकता है। संस्थानों पर मान्यता रद्द करने या फंडिंग रोकने जैसे दंडात्मक प्रावधानों से संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
कई शहरों में फैला प्रदर्शन
प्रदर्शन देशव्यापी हो गए हैं। दिल्ली में यूजीसी मुख्यालय के बाहर छात्रों ने विरोध किया, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय, मेरठ, हापुड़, सहारनपुर, अलवर, मधुबनी, बरेली, रांची विश्वविद्यालय (झारखंड) समेत कई जगहों पर मार्च और नारे लगाए गए। कर्णी सेना ने लखनऊ के परिवर्तन चौक पर सवर्ण समुदाय के लिए प्रदर्शन किया। सोशल मीडिया पर #UGCRollback, #ShameOnUGC जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां इसे "काला कानून" कहा जा रहा है।
बीजेपी में जबरदस्त विरोध
विरोध के बीच कई इस्तीफे भी सामने आए हैं। भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी, युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष राजू पंडित और बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी नियमों के खिलाफ इस्तीफा दे दिया। कवि कुमार विश्वास ने सवर्ण समुदाय के लिए कविता साझा कर #UGC_RollBack की अपील की। भाजपा नेता डॉ. संजय सिंह ने नियमों में संतुलन की कमी बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी से हस्तक्षेप की मांग की। लखनऊ, रायबरेली में तमाम बीजेपी नेताओं ने इस्तीफे दे दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता विनीत जिंदल ने जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है। जिसमें दावा किया गया है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कोई सुरक्षा नहीं है। याचिका में कहा गया है कि अधिकारियों को इस प्रावधान को लागू करने या उस पर कार्रवाई करने से रोका जाए। इसके बजाय, जाति-आधारित भेदभाव को जाति-निरपेक्ष और संवैधानिक रूप से सही तरीके से परिभाषित किया जाए ताकि जातिगत पहचान की परवाह किए बिना, जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार होने वाले सभी व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान किया जा सके।
याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को यह निर्देश देने की मांग की है कि वे यह सुनिश्चित करें कि विनियमों के अंतर्गत समान अवसर केंद्र, इक्विटी हेल्पलाइन, जांच तंत्र और लोकपाल कार्यवाही, विनियम 3(सी) पर उचित पुनर्विचार इस याचिका के लंबित रहने तक किया जाए।याचिकाकर्ता ने कहा कि जातिगत पहचान के आधार पर शिकायत निवारण तंत्र से कुछ लोगों को क्यों वंचित किया जा रहा है। यह "संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन" है।
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान
यूजीसी और सरकार का पक्ष है कि ये नियम सुरक्षित और समान वातावरण बनाने के लिए ज़रूरी हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, "मैं सबको आश्वस्त करता हूं कि कोई भेदभाव नहीं होगा और कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा।" संस्थानों से जिम्मेदारी से कार्यान्वयन करने की अपील की गई है। शिक्षा मंत्रालय जल्द ही स्पष्टीकरण जारी करने वाला है ताकि गलतफहमियां दूर हों। नियमों में जाति के अलावा धर्म, लिंग, जन्म स्थान और विकलांगता आधारित भेदभाव भी शामिल हैं, और कमेटी में ओबीसी प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।