कांग्रेस, TMC और CPM ने SIR में वोटर लिस्ट से नाम कटने के बाद राजगोपाल के पासपोर्ट का नवीनीकरण न होने पर गहरी चिंता जताई है। गुरदीप सप्पल, पवन खेड़ा, सागरिका घोष और एम ए बेबी समेत विपक्ष के कई नेताओं और पत्रकारों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
अंधा कानूनः वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपाल के साथ ये कैसा इंसाफ
वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और इसके चलते उनका पासपोर्ट रिन्यूअल (नवीनीकरण) अटक जाने का मामला अब व्यापक सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है। राजगोपाल ने सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण न केवल वे मतदान के अधिकार से वंचित हुए, बल्कि पासपोर्ट का नवीनीकरण भी नहीं हो सका। उन्होंने यह भी कहा कि इसी वजह से वे अपनी बेटी की शादी में शामिल नहीं हो पाए। यह कहानी अकेले राजगोपाल की नहीं है। देश में जहां भी एसआईआर हुआ, वहां-वहां यह हरकत आम लोगों के साथ भी हुई।
इस घटना के बाद कई वरिष्ठ पत्रकारों, राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे नागरिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए सरकार और संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद सागरिका घोष ने कहा कि यदि एक पूर्व संपादक और वरिष्ठ पत्रकार के साथ ऐसा हो सकता है, तो कल्पना कीजिए कि सीमित संसाधनों वाले आम नागरिक किस तरह की परेशानियां झेल रहे होंगे।
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटना, मतदान का अधिकार छिन जाना, पासपोर्ट का नवीनीकरण रुक जाना और अपनी बेटी की शादी में शामिल न हो पाना- ये सब इस बात के संकेत हैं कि नागरिकों के बुनियादी अधिकार किस तरह धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि ऐसी घटनाओं को मुख्यधारा का बड़ा मीडिया पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दे रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि क्या अब पासपोर्ट सत्यापन के दौरान मतदाता सूची को भी आधार बनाया जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण आखिर कितने लोगों के पासपोर्ट प्रभावित हुए होंगे।
उन्होंने लिखा कि राजगोपाल के साथ जो हुआ, उससे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) को लेकर पहले से व्यक्त की जा रही आशंकाओं को बल मिलता है। उनके अनुसार, "पहले मतदान का अधिकार छीना गया और अब यात्रा करने का अधिकार भी प्रभावित हो गया।"
द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने द वायर का लिंक शेयर करते हुए लिखा- SIR से बाहर रखा गया, पासपोर्ट नहीं मिला? एक राष्ट्रीय दैनिक के पूर्व संपादक आर. राजागोपाल की चौंकाने वाली कहानी, जिन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया गया।
प्रखर पत्रकार सबा नकवी ने कहा- कोलकाता पुलिस ने वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का हवाला देते हुए पासपोर्ट एप्लीकेशन के लिए नेगेटिव रिपोर्ट दी। इसलिए ऐसी स्थिति बन गई है कि वोटर लिस्ट से हटाए गए कुछ लोग यहां गैर-नागरिक बन सकते हैं, उन्हें कोई सरकारी लाभ नहीं मिल पाएगा, लेकिन वे देश भी नहीं छोड़ पाएंगे क्योंकि उन्हें पासपोर्ट नहीं मिलेगा!
वरिष्ठ पत्रकार गीता शेषु ने कहा कि राजगोपाल का अनुभव मतदाता सूची से बाहर किए जाने के गंभीर परिणामों को सामने लाता है। उन्होंने इसे सत्ता से जवाबदेही मांगने में मुख्यधारा के मीडिया की विफलता का भी उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि देशभर में बड़ी संख्या में मतदाता ऐसी प्रक्रियाओं के कारण व्यावहारिक रूप से "गैर-नागरिक" जैसी स्थिति में पहुंच रहे हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति "अक्षम्य और अलोकतांत्रिक" है।
सबसे बुरा डर सच साबित हुआः सप्पल
कांग्रेस नेता और एआईसीसी सदस्य गुरदीप सप्पल ने कहा- “लिबरल, सॉफ्ट-टच”: ECI के भरोसे का पहला मशहूर शिकार... सबसे बुरा डर सच साबित हुआ! सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफ़नामे में, भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने एक अहम बात मानी थी: उसके पास नागरिकता तय करने का पक्का अधिकार नहीं है। उसने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि SIR प्रोसेस एक “लिबरल, सॉफ्ट-टच” (नरम और आसान) तरीका था। उसने कहा कि SIR कोई सख़्त जाँच नहीं थी, न ही यह चुपके से किया गया NRC था, और न ही नागरिकों के अधिकार छीनने का कोई ज़रिया था। यह जाँच पूरी तरह से चुनावी मक़सद से की गई थी। वोटर लिस्ट से नाम हटने का कोई और नतीजा नहीं होगा। लेकिन नेता विपक्ष राहुल गांधी ने देश को इस पर आगाह किया। कांग्रेस पार्टी और सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं ने इस पर आपत्ति जताई। सीनियर एडवोकेट डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने CJI सूर्य कांत की बेंच के सामने दलील दी कि ECI नागरिकता तय करने का एक समानांतर सिस्टम बना रहा है, जिसे न तो संविधान और न ही संसद ने मंज़ूरी दी है। अब वो सारी बातें सच साबित हो रही हैं। सप्पल ने बहुत विस्तार से सबकुछ लिखते हुए कई सवाल उठाए हैं।पत्रकार सुशांत सिंह ने राजगोपाल के शब्दों को ही अपनी प्रतिक्रिया के तौर पर शेयर किया- "फ़ुटबॉल के इस मौसम में, अनगिनत भारतीयों की तरह मैं भी एक फ़ुटबॉल बन गया हूँ, जिसे एक ऑफ़िस से दूसरे ऑफ़िस और एक पोर्टल से दूसरे पोर्टल तक किक मारकर इधर-उधर घुमाया जा रहा है।"
CPI(M) के जनरल सेक्रेटरी एम.ए. बेबी ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया का इस्तेमाल देश के गरीब और कमज़ोर वर्गों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने के लिए किया जा रहा है। बेबी ने कहा, "लेकिन अब, आर. राजगोपाल जैसे जाने-माने एडिटर और मशहूर पत्रकार को भी वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है।"
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि यह घटना दिखाती है कि देश किस हद तक तर्कहीनता की स्थिति में पहुँच गया है। उन्होंने X पर लिखा, "क्या हम उस 'कानून के शासन' वाले देश की पहचान को मिटाने पर आमादा हैं जिसे हमारे संस्थापकों ने इतनी मेहनत से बनाया था! कितनी अफ़सोस की बात है!!"
सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा देखने को मिली। कई पत्रकारों, वकीलों, शिक्षाविदों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि यदि मतदाता सूची में किसी प्रशासनिक त्रुटि का असर पासपोर्ट जैसी अन्य नागरिक सेवाओं पर पड़ने लगे, तो यह गंभीर संस्थागत चिंता का विषय है। अनेक लोगों ने मांग की कि सरकार स्पष्ट करे कि क्या मतदाता सूची और पासपोर्ट सत्यापन की प्रक्रियाएं आपस में जुड़ी हुई हैं तथा यदि नहीं, तो राजगोपाल के मामले में ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई।
कई यूजर्स ने इसे नागरिक अधिकारों, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा मामला बताते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की। वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यदि मतदाता सूची में त्रुटियां समय रहते नहीं सुधारी गईं, तो इसका असर लाखों नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ सकता है।
हालांकि, इस पूरे मामले पर निर्वाचन आयोग और पासपोर्ट अधिकारियों की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। यह मामला अब केवल एक व्यक्ति की प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता, नागरिक पहचान और सरकारी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को लेकर राष्ट्रीय बहस का रूप लेता दिखाई दे रहा है।