राहुल गांधी ने टाटा समूह में चल रहे विवाद के बीच केंद्र की मोदी सरकार पर भारतीय उद्योग को बर्बाद करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग मोदी-शाह का खिलौना नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि टाटा को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है और कारोबारी नेता सरकार के डर से चुप हैं। यह विवाद टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को दोबारा नियुक्त करने के फ़ैसले को लेकर है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि बोर्ड की बैठक में जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। उन्होंने फैसले को अमान्य बताते हुए कंपनी से सात दिन के भीतर कई दस्तावेज और स्पष्टीकरण मांगे हैं।
टाटा समूह में चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को इस मामले को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला। राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा कि टाटा को आपराधिक तरीके से बर्बाद किया जा रहा है, लेकिन किसी भी कारोबारी नेता में इस मुद्दे पर बोलने की हिम्मत नहीं है। उन्होंने कारोबारियों को संबोधित करते हुए कहा है, 'आप कब तक चुप रहेंगे? क्या तब तक जब तक वे आप पर पूरी तरह कब्जा न कर लें? भारतीय उद्योग मोदी और शाह का खिलौना नहीं है। आपमें हिम्मत नहीं है। हममें है। हम इन अपराधों के लिए न्याय दिलाएँगे।'
राहुल गांधी का यह बयान तब आया है जब टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को दोबारा नियुक्त करने के फैसले पर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने गंभीर आपत्तियां उठाई हैं। हालाँकि, राहुल गांधी ने अपने बयान में यह साफ़ नहीं किया कि टाटा समूह के भीतर नियुक्ति को लेकर उठे विवाद में केंद्र सरकार की कथित भूमिका क्या है।

टाटा संस में आखिर विवाद क्या है?

टाटा संस, टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। समूह की विभिन्न कंपनियों में इसकी अहम भूमिका है। एन चंद्रशेखरन टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन हैं। विवाद 17 सितंबर को हुई टाटा संस के बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन को दोबारा नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने से जुड़ा है।
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टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फ़ैसले की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बोर्ड की बैठक के लिए निदेशकों को जो एजेंडा भेजा गया था, उसमें चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का साफ़ उल्लेख नहीं था। नोएल टाटा का कहना है कि इसके बावजूद बैठक में यह प्रस्ताव मतदान के लिए रखा गया और कंपनी ने बाद में इसे मंजूर प्रस्ताव के रूप में पेश किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि बैठक के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड, अंतिम मिनट्स और प्रस्ताव की प्रमाणित प्रति मांगने के बावजूद उन्हें ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
नोएल टाटा ने 26 अक्टूबर को टाटा संस के कंपनी सचिव और ग्रुप कॉरपोरेट सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय को पत्र लिखकर इन आपत्तियों को दर्ज कराया। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि संबंधित प्रस्ताव अमान्य है और टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन यानी कंपनी के आंतरिक नियमों के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।

नोएल टाटा ने क्यों कहा- ‘प्रस्ताव अमान्य है’?

नोएल टाटा ने अपने पत्र में कंपनी के आंतरिक नियमों के कई प्रावधानों का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया में ज़रूरी औपचारिकताओं का पालन नहीं हुआ। उनकी प्रमुख आपत्तियां हैं-
  • चयन समिति नहीं बनाई गई: नोएल टाटा के मुताबिक टाटा संस के नियम के तहत जिस चयन समिति का गठन होना चाहिए था, वह नहीं किया गया।
  • चयन समिति की सिफारिश नहीं थी: उनका कहना है कि ऐसी किसी समिति की सिफारिश बोर्ड के सामने नहीं रखी गई।
  • जरूरी निदेशकों की सहमति पर सवाल: नोएल टाटा ने दावा किया कि आर्टिकल 104B के तहत नियुक्त निदेशकों का ज़रूरी सकारात्मक मत हासिल नहीं किया गया, जबकि आर्टिकल 118 और 121 के तहत इसकी ज़रूरत थी।
  • शर्तों के साथ मतदान: उनके मुताबिक प्रस्ताव को कुछ शर्तों के अधीन मतदान के लिए रखा गया था, लेकिन वे शर्तें पूरी नहीं हुईं।
  • एजेंडे में साफ़ उल्लेख नहीं: उन्होंने कहा कि बैठक के मूल एजेंडे में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का साफ उल्लेख नहीं था।
इन आपत्तियों के आधार पर नोएल टाटा ने प्रस्ताव की वैधता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि जब जरूरी प्रक्रिया पूरी होने को लेकर विवाद है तो कंपनी को प्रस्ताव को अंतिम और निर्विवाद फैसला मानकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए।

बोर्ड बैठक के एजेंडे में क्या था?

नोएल टाटा की आपत्तियों का एक प्रमुख हिस्सा 17 सितंबर की बोर्ड बैठक के एजेंडे से जुड़ा है। उनके मुताबिक़ निदेशकों को भेजे गए मूल एजेंडे में सातवें बिंदु का शीर्षक ‘नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी से जानकारी’ यानी उस समिति की ओर से जानकारी साझा करना था। नोएल टाटा का दावा है कि इस बिंदु में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर चर्चा का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि बाद में एजेंडे में संशोधन करके भारतीय रिजर्व बैंक के एक पत्र और उससे जुड़े कानूनी मामलों पर चर्चा को शामिल किया गया, लेकिन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को स्पष्ट रूप से एजेंडे में नहीं जोड़ा गया। उनकी आपत्ति है कि जब किसी अहम नियुक्ति पर फ़ैसला लेना था तो निदेशकों को इसकी जानकारी एजेंडे के माध्यम से स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए थी।

‘बैठक की रिकॉर्डिंग ही निष्पक्ष रिकॉर्ड है’

नोएल टाटा ने अपने पत्र में बैठक की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग को बेहद अहम बताया है। उनका कहना है कि बैठक में वास्तव में क्या हुआ, इसे जानने का सबसे निष्पक्ष तरीका रिकॉर्डिंग देखना और सुनना है। उन्होंने आरोप लगाया कि दो लिखित अनुरोध किए जाने के बावजूद तीन सप्ताह से अधिक समय बीतने पर भी कंपनी ने उन्हें बैठक की पूरी रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं कराई। उन्होंने अंतिम या संशोधित मिनट्स और प्रस्ताव की प्रमाणित प्रति भी मांगी है।

नोएल टाटा ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि बैठक के मिनट्स को अंतिम रूप दिए जाने से पहले ही प्रस्ताव की प्रमाणित प्रति सार्वजनिक रूप से प्रसारित होने लगी और कथित तौर पर उसे कंपनी रजिस्ट्रार के पास भी दाखिल कर दिया गया।

उनका तर्क है कि जब बैठक के रिकॉर्ड और प्रस्ताव की वैधता को लेकर निदेशक की ओर से आपत्ति दर्ज है, तब विवाद का निपटारा किए बिना प्रस्ताव को अंतिम मानना सही नहीं है।

नोएल टाटा ने सात दिन में मांगे दस्तावेज

नोएल टाटा ने टाटा संस से सात दिन के भीतर कई दस्तावेज और स्पष्टीकरण उपलब्ध कराने की मांग की है।
  • 17 सितंबर की बोर्ड बैठक की पूरी ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग।
  • बैठक के अंतिम या संशोधित मिनट्स।
  • प्रस्ताव पर मतदान से संबंधित विस्तृत जानकारी।
  • बैठक का औपचारिक नोटिस।
  • बैठक के एजेंडे के मूल और संशोधित संस्करण।
  • कंपनी रजिस्ट्रार के पास दाखिल किए गए दस्तावेज।
  • कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को भेजे गए संबंधित रिकॉर्ड।
इसके अलावा उन्होंने कंपनी से कहा है कि वह कंपनी रजिस्ट्रार को लिखित रूप में बताए कि प्रस्ताव की वैधता पर एक निदेशक ने आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक़ यह आपत्ति आर्टिकल 104B के तहत नियुक्त निदेशक और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की ओर से उठाई गई है। नोएल टाटा ने यह भी मांग की है कि बैठक के रिकॉर्ड और प्रस्ताव को लेकर विवाद सुलझने तक इस फैसले के आधार पर आगे कोई कदम न उठाया जाए।
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टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका क्यों अहम है?

टाटा समूह की संरचना में टाटा ट्रस्ट्स की अहम भूमिका है। टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े ट्रस्ट समूह की प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी रखते हैं और सामाजिक कार्यों के लिए भी बड़े पैमाने पर संसाधन उपलब्ध कराते हैं। टाटा संस समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। इसलिए टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच किसी बड़े फैसले पर मतभेद सामने आने से समूह के भीतर प्रशासन और नियंत्रण से जुड़े सवाल उठ सकते हैं।नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं। उन्होंने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया पर आपत्ति उठाकर कंपनी के बोर्ड के फैसले को चुनौती दी है।

कारोबारियों की चुप्पी पर राहुल ने उठाए सवाल

राहुल गांधी ने अपने बयान में टाटा समूह के विवाद से आगे बढ़कर देश के कारोबारी माहौल पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कारोबारी नेता सरकार के खिलाफ बोलने से डरते हैं। उनके अनुसार भारतीय उद्योग को राजनीतिक नेतृत्व के नियंत्रण या दबाव में नहीं रहना चाहिए।
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राहुल गांधी ने लिखा कि भारतीय उद्योग मोदी और शाह का खिलौना नहीं है। उन्होंने कारोबारी नेताओं से पूछा कि वे कब तक चुप रहेंगे और क्या वे तब बोलेंगे जब उन पर पूरी तरह कब्जा हो जाएगा। लेकिन इस खास मामले में राहुल गांधी ने यह नहीं बताया कि चंद्रशेखरन की नियुक्ति के विवाद में सरकार ने कौन-सा कदम उठाया या किस तरह हस्तक्षेप किया।
इस विवाद का आगे क्या परिणाम होगा, यह कंपनी के नियमों, बोर्ड की वास्तविक कार्यवाही, मतदान के रिकॉर्ड और उठाई गई आपत्तियों के परीक्षण पर निर्भर करेगा। यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि नियुक्ति की प्रक्रिया में कंपनी के लागू नियमों का पालन नहीं हुआ, तो प्रस्ताव की वैधता पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। दूसरी ओर, कंपनी यदि यह स्पष्ट कर देती है कि प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी, तो विवाद का स्वरूप अलग हो सकता है।