नई दिल्ली। अमेरिकी अदालत से उद्योगपति गौतम अडानी को आपराधिक मामले में राहत मिलने के बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने अमेरिकी अदालत के फैसले को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले में जितना दिखाई दे रहा है, उससे कहीं अधिक है। उन्होंने आरोप लगाया कि “समझौता कर चुके प्रधानमंत्री को भारत के हित बेचने के लिए मजबूर किया गया” और इसकी कीमत भारत को चुकानी पड़ रही है।
राहुल गांधी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “There is much more to this than meets the eye. A compromised PM was forced to sell India’s interests. India is paying a huge price.” यानी, “इस मामले में जितना दिखाई दे रहा है, उससे कहीं अधिक है। एक कमज़ोर प्रधानमंत्री को भारत के हित बेचने के लिए मजबूर किया गया। भारत इसकी भारी कीमत चुका रहा है।”
राहुल की यह प्रतिक्रिया अमेरिकी जिला अदालत के उस फैसले के बाद आई है, जिसमें जज निकोलस गराफिस ने गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और उनके सहयोगी विनीत जैन से जुड़े आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया। यह मामला अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से चलाया जा रहा था और इसमें सिक्योरिटीज फ्रॉड तथा वायर फ्रॉड से जुड़े आरोप शामिल थे।
अमेरिका के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट ऑफ न्यूयॉर्क की अदालत ने आरोपों को with prejudice खारिज किया, यानी इन्हीं आरोपों पर मामले को दोबारा उसी रूप में आगे बढ़ाने का रास्ता बंद हो गया। इसके साथ ही अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ अडानी और सागर अडानी का सिविल मामला भी समझौते के जरिए समाप्त हुआ। इस समझौते के तहत दोनों ने कुल 1.8 करोड़ डॉलर का भुगतान करने पर सहमति जताई, लेकिन किसी अपराध को स्वीकार नहीं किया।

क्या थे अडानी पर आरोप?

अमेरिकी न्याय विभाग ने नवंबर 2024 में अडानी समूह और उसके सहयोगियों के खिलाफ आरोप सार्वजनिक किए थे। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अडानी समूह से जुड़े लोगों ने भारत में सरकारी संस्थाओं से सौर ऊर्जा के ठेके हासिल करने के लिए करीब 26.5 करोड़ डॉलर की कथित रिश्वत योजना बनाई थी।
अमेरिकी अभियोजकों का यह भी आरोप था कि अडानी और उनके सहयोगियों ने अमेरिकी तथा अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को कंपनी की भ्रष्टाचार-रोधी गतिविधियों के बारे में कथित तौर पर गुमराह किया। अडानी समूह ने आरोपों से इनकार किया था।
इसी मामले में अमेरिकी SEC ने गौतम अडानी और सागर अडानी के खिलाफ अलग से सिविल आरोप लगाए थे। बाद में SEC के साथ समझौते के जरिए इस मामले को भी समाप्त कर दिया गया। इसके अलावा अडानी एंटरप्राइजेज ने ईरान प्रतिबंधों से जुड़े एक अलग मामले में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के साथ 27.5 करोड़ डॉलर का समझौता किया।

मई में ही केस आगे न बढ़ाने का फैसला हुआ था

अमेरिकी न्याय विभाग ने मई में अदालत को बताया था कि वह गौतम अडानी और उनके सहयोगियों के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई नहीं करना चाहता। विभाग ने मामले की विदेशी प्रकृति, अभियोजन की सीमित संभावना और विभाग की प्राथमिकताओं में बदलाव सहित कई कारणों का हवाला दिया था।
जुलाई में न्याय विभाग के प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल ट्रेंट मैककॉट्टर ने भी कहा था कि अडानी समूह के खिलाफ आरोप लगाए ही नहीं जाने चाहिए थे। हालांकि इस फैसले की प्रक्रिया को लेकर अमेरिकी अदालत में गंभीर सवाल उठे।

जज ने पहले ही DOJ की दलील को बताया था अपर्याप्त

अमेरिकी जिला जज निकोलस गराफिस ने जून में न्याय विभाग के केस वापस लेने के अनुरोध को तुरंत मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि सरकार का स्पष्टीकरण बेहद संक्षिप्त और निष्कर्ष वाले है तथा इससे अदालत को मामले को खारिज करने के अनुरोध का विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिलता। जज ने अभियोजन पक्ष से विस्तृत तथ्य और कानूनी आधार पेश करने को कहा था।
जज ने जुलाई में गौतम अडानी से यह भी जवाब मांगा था कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी है कि अमेरिकी सरकार की ओर से मामला खत्म करने के बदले कोई समझौता या किसी तरह का लाभ देने का प्रस्ताव किया गया था। इस सवाल ने केस की समाप्ति की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे संदेहों को और गंभीर बना दिया था।

जज ने DOJ की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

मामला आखिरकार खारिज करते हुए जज गराफिस ने अमेरिकी न्याय विभाग के फैसले और उसकी प्रक्रिया पर तीखी टिप्पणियां कीं। उन्होंने विशेष रूप से ट्रेंट मैककॉट्टर की भूमिका को लेकर चिंता जताई और कहा कि उन्होंने मामले की जांच करने वाले FBI और SEC अधिकारियों तथा अभियोजन पक्ष के वकीलों की राय को दरकिनार करते हुए अपना निर्णय लिया।
जज के अनुसार, मैककॉट्टर का अडानी के बचाव पक्ष के वकीलों के साथ मिलकर मामले को खत्म करने का फैसला करना और उन अधिकारियों की राय नहीं लेना, जिन्होंने मामले की जांच और अभियोजन में काम किया था, “असामान्य” था। जज ने इस प्रक्रिया को न्यायपालिका के प्रति सम्मान की कमी से भी जोड़ा।
जज ने यह भी कहा कि सरकार की ओर से यह दावा करना कि मामला पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन के अंतिम दिनों में सिर्फ अडानी को “बदनाम” करने के लिए लाया गया था, पर्याप्त सबूत के बिना किया गया दावा है। अदालत के अनुसार, मैककॉट्टर इस राजनीतिक मकसद के आरोप को साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पाए।
अदालत ने अडानी की ओर से अमेरिका में करीब 1000 करोड़ डॉलर यानी 10 अरब डॉलर के निवेश के प्रस्ताव का भी संज्ञान लिया। हालांकि जज ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि इस निवेश प्रस्ताव के कारण ही आपराधिक मामला खत्म किया गया। लेकिन उन्होंने यह संकेत जरूर दिया कि ऐसी परिस्थितियों की निष्पक्षता का आकलन जनता खुद कर सकती है।
अमेरिकी अदालत का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर अडानी समूह को आपराधिक आरोपों से राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर मामले को खत्म करने की प्रक्रिया पर खुद जज की गंभीर टिप्पणियां सामने आई हैं। ऐसे में राहुल गांधी ने इसी प्रक्रिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े अपने पुराने राजनीतिक आरोपों को आधार बनाकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। हालांकि अमेरिकी अदालत के फैसले में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ राहुल गांधी के आरोपों का कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।