सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड की जगह वोटर आईडी अनिवार्य करने के प्रस्ताव ने देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार की यह पहल महज प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि देश के गरीबों और वंचित तबकों के अधिकार छीनने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकती है।
राहुल गांधी ने कहा है कि जब लोगों का वोट छीन लिया जाएगा, तो उनके दूसरे अधिकारों पर भी हमला करना आसान हो जाएगा। कांग्रेस इस प्रस्ताव को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जोड़कर देख रही है। पार्टी का आरोप है कि पहले मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं और अब उसी वोटर आईडी को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की अनिवार्य पहचान बनाने की तैयारी हो रही है।
इस विवाद के केंद्र में केंद्रीय पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह का बयान है। उन्होंने कहा है कि पंचायती राज मंत्रालय की योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान और भुगतान के लिए अब आधार के बजाय वोटर आईडी नंबर तथा बायोमेट्रिक सत्यापन का इस्तेमाल किया जाएगा।
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ललन सिंह ने क्या कहा?

केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने हाल के दिनों में दो बार इस प्रस्ताव को लेकर बयान दिया है। दिल्ली में पंचायती राज मंत्रालय की ओर से आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में उन्होंने आधार कार्ड की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि आधार कार्ड बनवाने की सुविधा अब हर इलाके में उपलब्ध है और कोई भी व्यक्ति कुछ ही मिनटों में आधार कार्ड बनवा सकता है। ऐसे में लाभार्थियों की पहचान के लिए केवल आधार पर निर्भर रहना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य में लाभार्थियों की पहचान के लिए बायोमेट्रिक जानकारी के साथ इलेक्टर्स फोटो आइडेंटिटी कार्ड (EPIC) नंबर यानी वोटर आईडी का इस्तेमाल किया जाएगा।
3 नवंबर को सिक्किम में भी उन्होंने इस बात को दोहराया। उनके मुताबिक, इस व्यवस्था से सरकारी योजनाओं के वास्तविक और पात्र लाभार्थियों की पहचान करने में मदद मिलेगी तथा फर्जी लाभार्थियों को बाहर किया जा सकेगा। हालांकि, मंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह व्यवस्था केवल पंचायती राज मंत्रालय की योजनाओं तक सीमित रहेगी या केंद्र सरकार की दूसरी कल्याणकारी योजनाओं पर भी लागू होगी।

राहुल गांधी का आरोप- वोटर लिस्ट में BJP के बहुमत की तैयारी

राहुल गांधी ने 6 नवंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इस पूरे मामले को एक गहरी राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने लिखा कि मोदी सरकार के मंत्री की घोषणा के मुताबिक अब सरकारी योजनाओं का लाभ आधार से नहीं, बल्कि वोटर आईडी से तय होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस साजिश को समझने की जरूरत है। राहुल गांधी के मुताबिक, SIR के नाम पर लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। अगर इस प्रक्रिया को नहीं रोका गया तो आने वाले समय में और भी बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए जा सकते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि सबसे ज्यादा किन लोगों को निशाना बनाया जा रहा है? उनके मुताबिक, उन लोगों को जिनमें बीजेपी के प्रति सबसे ज्यादा नाराजगी है। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर भी बीजेपी के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर लेते हुए उन्हें मोदी सरकार का कर्मचारी तक बताया और आरोप लगाया कि चुनावी धांधली में उनकी भूमिका के सबूत सामने आ चुके हैं।

राहुल गांधी ने कहा कि ऐसी मतदाता सूची तैयार करने की तैयारी है जिसमें हमेशा बीजेपी का बहुमत बना रहे। उन्होंने आशंका जताई कि कल जिन लोगों ने बीजेपी को सत्ता से हटाने का फैसला किया था, उनके नाम चुन-चुनकर मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा: नाम कटा तो वोट गया, वोट गया तो अधिकार गया। राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि इस तरह लोगों को लोकतंत्र में अदृश्य नागरिक बना दिया जाएगा। ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जहां जनता सरकार नहीं चुनेगी, बल्कि सरकार अपने हिसाब से लोगों का चयन करेगी।

राशन, पेंशन और मनरेगा तक पर पड़ सकता है असर

राहुल गांधी ने इस मुद्दे को केवल पंचायती राज मंत्रालय की योजनाओं तक सीमित नहीं माना। उन्होंने आशंका जताई कि अगर सरकारी योजनाओं के लिए वोटर आईडी अनिवार्य कर दी गई तो भविष्य में इसका दायरा बढ़ाकर दूसरी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने राशन, पेंशन, मनरेगा की मजदूरी, आवास योजनाओं, छात्रवृत्ति और आरक्षण का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या इन सुविधाओं के लिए भी वोटर आईडी अनिवार्य कर दी जाएगी? 
  • राहुल गांधी ने कहा कि मतदान करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसे सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की शर्त नहीं बनाया जा सकता। 
  • उनका कहना था कि किसी गरीब व्यक्ति की पेंशन को उसके वोटर कार्ड का गुलाम नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने इस पूरे मामले को केवल वोट चोरी नहीं, बल्कि अधिकारों की चोरी करार दिया और कहा कि कांग्रेस ऐसा नहीं होने देगी।

जयराम रमेश ने पूछा- क्या यह मोदी सरकार की आधिकारिक नीति है?

कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से सवाल किया है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय पंचायती राज मंत्री पिछले कुछ दिनों में दो बार स्पष्ट कर चुके हैं कि सामाजिक कल्याण योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान के लिए आधार की जगह वोटर आईडी का इस्तेमाल किया जाएगा। जयराम रमेश ने सवाल किया कि क्या यह अब मोदी सरकार की आधिकारिक नीति बन चुकी है?
उन्होंने कहा कि आधार की परिकल्पना जिस मूल उद्देश्य से की गई थी, इस बदलाव से वह उद्देश्य प्रभावित होगा। आधार के इस्तेमाल के कारण पहले भी लाखों लोगों को सामाजिक कल्याण और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से वंचित किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
जयराम रमेश ने चेतावनी दी कि अगर SIR को सरकारी योजनाओं का लाभ देने का आधार बनाया गया तो बड़े पैमाने पर और भी लोग इन सुविधाओं से बाहर हो सकते हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि 'वोट चोरी तो सिर्फ ट्रेलर है, पूरी फिल्म हक-हुकूक की चोरी है।'

पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत ने भी उठाए सवाल

कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग से जुड़े नेताओं ने भी इस प्रस्ताव को लेकर सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि SIR के तहत पहले ही कम से कम 13.3 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा चुके हैं। अब वोटर आईडी को सरकारी योजनाओं का लाभ देने की शर्त बनाने की बात सामने आ रही है। उन्होंने आशंका जताई कि इससे राशन, आवास, स्वास्थ्य बीमा और रोजगार जैसी सुविधाओं से भी लोगों को वंचित किया जा सकता है।
पवन खेड़ा के मुताबिक, पहले लोगों को मतदाता सूची से बाहर करके उनकी राजनीतिक आवाज छीनी जाएगी और फिर वोटर आईडी नहीं होने के आधार पर उनके कल्याणकारी अधिकार भी छीने जा सकते हैं। इससे लाखों लोग लोकतांत्रिक और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था, दोनों से बाहर हो जाएंगे। वहीं कांग्रेस की सोशल मीडिया विभाग की अध्यक्ष सुप्रिया श्रीनेत ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने का मतलब सिर्फ उसका मतदान का अधिकार छीनना नहीं है, बल्कि उसकी नागरिक पहचान और अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा करना है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या वोटर लिस्ट से बाहर व्यक्ति सरकारी योजनाओं से भी बाहर हो जाएगाः इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह है कि सरकारी योजनाओं का लाभ और मतदाता सूची में नाम होना दो अलग-अलग संवैधानिक एवं प्रशासनिक विषय हैं। आधार का इस्तेमाल फिलहाल प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), ग्रामीण आवास सहायता और वृद्धावस्था, विधवा तथा दिव्यांग पेंशन जैसी कई योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान और भुगतान के लिए किया जाता है। यदि भविष्य में वोटर आईडी को इन योजनाओं के लाभ की अनिवार्य शर्त बनाया जाता है तो उन लोगों के सामने गंभीर समस्या पैदा हो सकती है जिनका नाम मतदाता सूची में नहीं है, लेकिन वे सरकारी सहायता पाने के पात्र हैं।

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल है। पंचायती राज मंत्रालय की भूमिका मुख्य रूप से पंचायतों और ग्रामीण विकास की संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने की है। वह सीधे व्यक्तिगत लाभार्थियों को भुगतान करने वाली सभी केंद्रीय योजनाओं का संचालन नहीं करता। इसलिए यह स्पष्ट होना बाकी है कि मंत्री का प्रस्ताव किन योजनाओं पर लागू होगा। अब तक इस बदलाव को लेकर कोई स्पष्ट सरकारी आदेश, विस्तृत योजना या लागू करने की समयसीमा सामने नहीं आई है। मंत्री ने भी यह स्पष्ट नहीं किया है कि प्रस्ताव केवल उनके मंत्रालय की योजनाओं तक सीमित रहेगा या इसका विस्तार दूसरे मंत्रालयों की योजनाओं तक किया जाएगा।

SIR विवाद के बीच क्यों महत्वपूर्ण है यह घोषणा?

देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर पहले से राजनीतिक टकराव चल रहा है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित और दोहरे नामों वाले मतदाताओं की पहचान करके मतदाता सूची को दुरुस्त करना है। ऐसे माहौल में यदि सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए वोटर आईडी और मतदाता सूची में नाम होना अनिवार्य किया जाता है तो विवाद केवल चुनावी अधिकारों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा संबंध गरीबों की सामाजिक सुरक्षा और सरकारी सहायता तक पहुंच से भी जुड़ जाएगा। 

यहां सरकार के सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं

  • 1. क्या किसी पात्र नागरिक को सिर्फ मतदाता सूची में नाम नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं से वंचित किया जा सकता है?
  • 2. अगर SIR में किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलती से हटा दिया जाता है तो उसके राशन, पेंशन और दूसरी सुविधाओं का क्या होगा?
  • 3. क्या वोटर आईडी को अनिवार्य बनाने से बुजुर्गों, महिलाओं, प्रवासी मजदूरों और कमजोर तबकों की मुश्किलें बढ़ेंगी?
  • 4. क्या केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को लेकर स्पष्ट सरकारी आदेश और कानूनी आधार सामने रखेगी?
दरअसल, इस विवाद का मूल सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र में मतदान का अधिकार और सामाजिक कल्याण का अधिकार एक-दूसरे से जोड़ दिए जाएंगे? अगर ऐसा होता है तो मतदाता सूची में किसी प्रशासनिक गलती का असर सिर्फ चुनाव में वोट डालने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी और आर्थिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सरकार की ओर से इस प्रस्ताव का विस्तृत स्वरूप और उसका दायरा स्पष्ट होना बाकी है। लेकिन विपक्ष ने इसे SIR के खिलाफ अपनी लड़ाई का एक बड़ा मुद्दा बना दिया है। आने वाले दिनों में यह विवाद चुनावी पारदर्शिता के साथ-साथ नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की बहस का भी केंद्र बन सकता है।