पश्चिम बंगाल CEO मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव बनाए जाने और SIR के ऑब्जर्वर रहे सुब्रत गुप्ता के CM के सलाहकार के तौर पर शामिल होने पर विपक्ष ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
चुनाव आयोग से जुड़े दो वरिष्ठ अधिकारियों को शुभेंदु अधिकारी सरकार में अहम पद दिए जाने पर राहुल गांधी ने कहा, "BJP-EC के 'चोर बाज़ार' में - जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम।" राहुल के साथ ही अन्य विपक्षी नेताओं ने बीजेपी और चुनाव आयोग पर बड़ा हमला किया है। ये अधिकारी हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग से जुड़े थे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने मनोज अग्रवाल को राज्य का नया मुख्य सचिव बनाया है। वे पहले बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी यानी सीईओ थे। साथ ही, रिटायर्ड आईएएस अधिकारी सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाया गया है। सुब्रत गुप्ता चुनाव से पहले SIR प्रक्रिया में वोटर लिस्ट सुधार के खास पर्यवेक्षक थे।
विपक्ष का आरोप
टीएमसी और कांग्रेस दोनों ने इन नियुक्तियों को चुनाव में पक्षपात का सबूत बताया है। टीएमसी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने एक्स पर लिखा, "जिन्हें तथाकथित 'निष्पक्ष अंपायर' कहा जा रहा था, उन्हें अब बीजेपी सरकार में टॉप ब्यूरोक्रेट का पद दे दिया गया। क्या अब भी कोई मानता है कि बंगाल विधानसभा चुनाव निष्पक्ष थे? यह बेहद शर्मनाक और बेशर्मी भरा कदम है।"टीएमसी नेता साकेत गोखले ने इसे "बेशर्मी की भी हद पार" बताया। उन्होंने कहा, "बीजेपी और चुनाव आयोग अब चुनाव चोरी को खुलेआम स्वीकार कर रहे हैं। क्या अदालतें अंधी हैं...?"
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने विस्तार से बयान दिया। उन्होंने कहा कि मनोज अग्रवाल ने 2026 के बंगाल चुनाव की देखरेख की थी और सुब्रत गुप्ता SIR प्रक्रिया में शामिल थे, जिसमें लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। जयराम रमेश का कहना है कि ये नियुक्तियां चुनाव आयोग और बीजेपी के बीच खुली मिलीभगत दिखाती है। उन्होंने पूछा कि क्या 27 लाख लोगों को वोटिंग से बाहर रखना बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया था। टीएमसी सांसद डेरेक ओब्रायन ने व्यंग्य करते हुए इसे संयोग बताया।
बीजेपी का बचाव
पश्चिम बंगाल बीजेपी ने इन आरोपों का जवाब दिया। पार्टी ने कहा कि ममता बनर्जी की सरकार ने आईएएस नियमों को तोड़कर कई अधिकारियों को साइड करके ब्यूरोक्रेसी को खराब किया था। बीजेपी सरकार ने नियमों का पालन करते हुए वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव बनाया है। बीजेपी का कहना है कि यह नियुक्ति योग्यता के आधार पर की गई है और यह 'कानून की गरिमा बहाल करने' का वादा पूरा करना है।किन्हें क्या ज़िम्मेदारी मिली?
पश्चिम बंगाल के जिन सीईओ मनोज कुमार अग्रवाल के निर्देशन में हुए विधानसभा चुनाव में जीतकर शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने, उन्हीं मनोज अग्रवाल को सरकार में बड़ा पद दिया गया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल को बंगाल का नया मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया है। मुख्य सचिव राज्य सरकार का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। वह सभी विभागों का समन्वय करता है और मुख्यमंत्री को सलाह देता है। यह पद IAS अधिकारियों में सबसे अहम माना जाता है। ये वही सीईओ मनोज कुमार अग्रवाल हैं जिनके निर्देशन में हुए चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुँचाने के गंभीर आरोप ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी लगाती रही है।
SRO सुब्रत गुप्ता CM के सलाहकार
इससे पहले स्पेशल रोल ऑब्जर्वर यानी एसआरओ सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का सलाहकार बनाया गया। चुनाव आयोग ने 7 मई को ही सुब्रत गुप्ता को चुनाव ड्यूटी से मुक्त किया था। इसके ठीक दो दिन बाद नई सरकार ने उन्हें यह अहम जिम्मेदारी दे दी। शनिवार को शपथ लेने के कुछ घंटों बाद ही पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस नियुक्ति की घोषणा कर दी। चुनाव आयोग ने बंगाल में विशेष मतदाता सूची संशोधन यानी SIR के लिए डॉ. सुब्रत गुप्ता को विशेष रोल ऑब्जर्वर यानी एसआरओ नियुक्त था। गुप्ता आईआईटी खड़गपुर से पीएचडी हैं।
IAS शांतनु बाला निजी सचिव
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शांतनु बाला को अपना निजी सचिव भी नियुक्त किया है। शांतनु बाला पहले दक्षिण 24 परगना जिले में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट रह चुके हैं। नबन्ना से जारी आदेश में कहा गया है कि यह नियुक्ति 'जन सेवा के हित में' की गई है और आगे के आदेश तक लागू रहेगी।
SIR पर विपक्षी दलों की आपत्ति क्या?
मनोज कुमार अग्रवाल और सुब्रत गुप्ता पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव से जुड़े रहे हैं। और इस चुनाव के नतीजों पर एसआईआर का काफ़ी ज़्यादा असर होने का दावा किया जा रहा है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि एसआईआर के माध्यम से चुनाव आयोग और बीजेपी ने इस चुनाव को ग़लत तरीक़े से जीता है।दरअसल, चुनाव आयोग ने चुनाव से पहले वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR किया। इसमें करीब 91 लाख नाम काट दिए गए, जो कुल वोटरों का लगभग 12% है। SIR शुरू होने से पहले राज्य में कुल 7.66 करोड़ वोटर थे। दिसंबर में ड्राफ्ट लिस्ट में क़रीब 60 लाख नाम हटाए गए। बाद में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के 60 लाख से ज्यादा मामलों को अदालती जांच के लिए भेजा गया। इनमें 27 लाख से ज्यादा को 'एक्सक्लूडेबल' माना गया। इस तरह कुल मिलाकर 91 लाख मतदाता हटा दिए गए।
विपक्ष कह रहा है कि SIR एक तरफा था और उनके वोटरों को निशाना बनाया गया। बीजेपी इसे चुनावी लिस्ट साफ करने का जरूरी कदम बता रही है। चाहे कोई इसे वोटरों की छंटनी कहे या चुनावी सफाई, SIR पश्चिम बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा और सबसे विवादित मुद्दा रहा।