अयोध्या राम मंदिर दान घोटाले में UP सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पुरानी SIT भंग कर नई एसआईटी बनाई। लेकिन यूपी सरकार ने पिछली एसआईटी भंग करने की वजह रिपोर्ट का देरी से मिलना बताया है।
यूपी सरकार ने अयोध्या राम मंदिर घोटाले की जांच के लिए नई एसआईटी बनाई
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान-चढ़ावे की कथित चोरी और अनियमितताओं की जांच कर रही उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष जांच दल (SIT) को भंग कर दिया गया है और उसकी जगह तीन वरिष्ठ IPS अधिकारियों की नई टीम बना दी गई है। नई SIT का नेतृत्व महानिरीक्षक (IG) किरण एस कर रहे हैं, जबकि DIG अयोध्या सोमेन वर्मा और SSP अयोध्या डॉ. गौरव ग्रोवर को इसका सदस्य बनाया गया है। यूपी सरकार ने 27 जुलाई को सुनवाई के दौरान नई एसआईटी बनाने की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी।
नई एसआईटी कदम राज्य सरकार का खुद का फैसला नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उठाया गया कदम है। 19 जुलाई को पुरानी SIT ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत में सौंपी थी। इसके अगले ही दिन, 20 जुलाई को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ज्यामाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए नई SIT गठित करने का निर्देश दिया था। बेंच ने स्पष्ट कहा कि नई टीम की अगुआई किसी वरिष्ठ IPS अधिकारी को करनी चाहिए ताकि जांच "निर्णायक चरण" तक पहुंच सके।
- राज्य सरकार ने नई एसआईटी की घोषणा करते हुए सुप्रीम कोर्ट का जिक्र नहीं किया। उसने कहा कि चूंकि पुरानी एसआईटी कमेटी ने समय पर (15 जुलाई) रिपोर्ट नहीं दी थी। इसलिए अब नई कमेटी गठित की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई को क्या निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि एसआईटी में एक फॉरेंसिक ऑडिटर को भी शामिल किया जाए, ताकि दान राशि, बैंक रिकॉर्ड, लेखा-जोखा और वित्तीय लेनदेन की पेशेवर तरीके से जांच हो सके। राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस सुझाव पर सहमति जताई। अदालत ने नई एसआईटी को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर जांच की प्रगति पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे।
जून 2026 में अयोध्या राम मंदिर में रोज़ाना आने वाले चढ़ावे में गड़बड़ी की खबरें सामने आईं। समाजवादी पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 7 जून को मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए करोड़ों रुपये के हिसाब-किताब में गड़बड़ी का आरोप लगाया और न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की। शुरू में अनुमान लगाया गया था कि गबन की रकम 5 से 7.5 करोड़ रुपये के बीच है, लेकिन बाद की रिपोर्टों में यह आंकड़ा 200 करोड़ रुपये तक बताया गया।
जांच में अब तक आठ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जिनमें ट्रस्ट से जुड़े कर्मचारी भी शामिल हैं। गिरफ्तार आरोपियों से करीब 79.85 लाख रुपये नकद बरामद किए गए। ट्रस्ट महासचिव चंपत राय के ड्राइवर टीनू यादव का नाम भी इसमें सामने आया। इस विवाद के बीच चंपत राय और एक अन्य ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया, जबकि आमंत्रित सदस्य गोपाल राव को ट्रस्ट की बैठकों से दूर रहने को कहा गया। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें औपचारिक रूप से हटाया नहीं गया और चोरी में उनकी कोई भूमिका नहीं है।
पुरानी SIT की नौ पन्नों की प्रारंभिक रिपोर्ट में यह सामने आया कि चोरी किसी इक्का-दुक्का घटना का नतीजा नहीं थी, बल्कि सुरक्षा, निगरानी और नकदी प्रबंधन में गंभीर खामियों के चलते संभव हुई। विवाद के बीच ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि के निर्देश पर मंदिर में शुद्धिकरण अनुष्ठान भी कराया गया।
क्या यह वाकई सिर्फ प्रक्रियागत बदलाव है?
आलोचकों का तर्क है कि पहले भी तमाम गंभीर मामलों में बनी SIT को समयसीमा से चूकने या धीमी जांच के बावजूद भंग करने के बजाय उनका कार्यकाल बढ़ाया गया है। सवाल यह है कि इस मामले में टीम को पूरी तरह बदलने की नौबत क्यों आई, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा कि नई टीम में "वरिष्ठ" IPS अधिकारी चाहिए। यानी परोक्ष रूप से यह संकेत गया कि पहली टीम की संरचना या उसकी जांच का स्तर अदालत को संतोषजनक नहीं लगा।
सार्वजनिक धन का खर्च और जवाबदेही
पहली SIT के गठन, उसकी जांच, ऑडिट और संबंधित कार्यवाही पर पहले ही सरकारी खजाने से खासा खर्च हो चुका है। हालांकि सरकार ने पिछली एसआईटी पर हुए खर्च का ब्यौरा जारी नहीं किया है। अब नई टीम के गठन के साथ दोबारा संसाधन, जनशक्ति और समय खर्च होगा। सवाल यह है कि जब जांच पहले से चल रही थी और गिरफ्तारियां व बरामदगी भी हो चुकी थी, तो क्या यह दोहरा खर्च टाला जा सकता था और इसकी जवाबदेही किस पर तय होगी।
पहली रिपोर्ट को लेकर संदेह
पहली SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट में सुरक्षा और निगरानी में खामियों का ज़िक्र तो हुआ, लेकिन आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट में बड़े नामों और संस्थागत जवाबदेही की गहराई से पड़ताल किए बिना मामले को सतही तौर पर निपटाने की कोशिश दिखी। यही वजह रही कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत की निगरानी में जांच की मांग उठाई, जिस पर कोर्ट ने नई टीम बनाने का आदेश दिया।
क्या मामला जान-बूझकर रफा दफा जा रहा है?
इसी दौर में नीट पेपर लीक जैसे मुद्दों पर पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आमरण अनशन और अन्य राजनीतिक प्रदर्शनों की खबरों ने मीडिया की सुर्खियां बटोरीं, जिससे राम मंदिर चंदा चोरी प्रकरण चर्चा में पीछे छूटता दिखा। विपक्ष और कुछ टिप्पणीकारों का आरोप है कि टीम बदलने की कवायद के बीच जनता का ध्यान मूल मुद्दे यानी करोड़ों रुपये के गबन के आरोपों और उसमें बड़े नामों की संभावित संलिप्तता से हट सकता है।
इससे पहले कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने अयोध्या में हुए भूमि सौदों को लेकर बनी जांच को "आँखों में धूल झोंकने वाला" करार दिया था और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की थी। ऐसे में विपक्ष के लिए SIT के बार-बार पुनर्गठन को राजनीतिक हथियार बनाना स्वाभाविक है, भले ही ताज़ा कदम राज्य सरकार का नहीं बल्कि खुद सुप्रीम कोर्ट का निर्देश हो।
तथ्यात्मक रूप से यह स्पष्ट है कि SIT का पुनर्गठन उत्तर प्रदेश सरकार की स्वेच्छा से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के 20 जुलाई के आदेश के अनुपालन में हुआ है और यह इस आधार पर भी नहीं हुआ कि पुरानी टीम समयसीमा से चूक गई, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि अदालत को जांच में और वरिष्ठता व गंभीरता की दरकार महसूस हुई। बहरहाल, इस पुनर्गठन ने जांच की निरंतरता, अब तक हुए खर्च की सार्थकता, और मूल आरोपों की गहराई तक जाने की सरकार व ट्रस्ट प्रशासन दोनों की गंभीरता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। नई SIT को 27 जुलाई तक स्टेटस रिपोर्ट सौंपनी है, ऐसे में आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या यह पुनर्गठन जांच को सच में गति देगा, या सिर्फ एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगा।