राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की स्थिति पर चिंता जताई और उनका समर्थन किया। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के मौके पर भागवत ने कहा कि बांग्लादेश में लगभग 1.25 करोड़ हिंदू हैं। अगर वे वहां रहकर अपने अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला करते हैं, तो दुनिया भर के हिंदू उनकी मदद करेंगे।

यह कार्यक्रम मुंबई के वर्ली स्थित नेहरू सेंटर में आयोजित किया गया था, जहां भागवत ने आरएसएस की स्थापना से लेकर वर्तमान भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं है और न ही यह सत्ता हासिल करने या दबाव समूह के रूप में काम करता है। आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी, जब उन्होंने समाज में एकता की कमी को महसूस किया।

भागवत ने घरेलू मुद्दों पर भी बात की। जनसंख्या परिवर्तन के बारे में उन्होंने कहा कि पहले सरकार ने इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया, लेकिन अब जन्म दर और अवैध इमीग्रेशन जैसे कारणों पर कार्रवाई शुरू हो गई है, जो सफल होगी। भारत की मजबूती पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, "भारत अब टूट नहीं सकता। जो भारत को तोड़ने की कोशिश करेंगे, वे खुद टूट जाएंगे।"

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आरएसएस के फंडिंग पर उत्सुकता जताने वालों को जवाब देते हुए भागवत ने बताया कि संगठन अपने कार्यकर्ताओं से धन इकट्ठा करता है। यात्रा के दौरान होटलों में रहने की बजाय कार्यकर्ताओं के घरों में ठहरते हैं और टिफिन मांगते हैं। नेतृत्व के बारे में उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी जाति से आरएसएस प्रमुख बन सकता है। अनुसूचित जाति-जनजाति कोई अयोग्यता नहीं है और ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं। संगठन सभी जातियों के लिए काम करता है, हालांकि शुरुआत ब्राह्मणों से हुई थी।
मुस्लिम बहुल इलाकों में काम करने की चुनौतियों पर भागवत ने कहा कि गाली-गलौज का जवाब न देकर संघ संघर्ष को बढ़ने से रोकता है। इससे टकराव नहीं बढ़ता।

बांग्लादेश के संदर्भ में भागवत की टिप्पणी हाल के घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में आई है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा बढ़ी है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के निर्वासन के बाद 'जुलाई विद्रोह' के दौरान विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भड़की, जिसमें हिंदू नागरिकों पर हमले हुए और कई मौतें हुईं।

भागवत का बयान और बांग्लादेश के हिन्दू

मोहन भागवत का बयान बांग्लादेश के हिन्दुओं का संकट बढ़ा सकता है। बांग्लादेश में जिस तरह की साम्प्रदायिक घटनाएं हुई हैं और हिन्दुओं को चुनकर निशाना बनाया गया है, भारत में भी मुस्लिमों पर उसी तरह की घटनाएं हुई हैं। लिंचिंग की अनगिनत घटनाएं इसकी गवाह हैं। लेकिन कभी किसी मुस्लिम देश ने इस तरह का आह्वान नहीं किया। संघ प्रमुख का यह बयान एक तरह से भारत का बयान माना जाएगा, क्योंकि जिस राजनीतिक दल भाजपा का संघ समर्थन करता है, देश में उसकी सरकार है। यह जानना ज़रूरी है कि भागवत के बयान से बांग्लादेश के हिन्दुओं को क्या नुकसान हो सकता है। 

राजनीतिक उकसावा माना जा सकता है 

बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं, जो भारत-विरोधी भावनाओं, इस्लामी कट्टरपंथियों और राजनीतिक अस्थिरता से जुड़े हैं। भागवत का बयान, जो वैश्विक हिंदू समर्थन की बात करता है, को बांग्लादेशी मीडिया या कट्टरपंथी समूहों द्वारा 'भारतीय हस्तक्षेप' या 'हिंदू राष्ट्रवाद की साजिश' के रूप में प्रचारित किया जा सकता है। इससे हिंदुओं को 'भारतीय एजेंट' बताकर निशाना बनाया जा सकता है, जिससे हिंसा बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, अतीत में भारतीय नेताओं के बयानों (जैसे CAA पर) ने बांग्लादेश में एंटी-हिंदू सेंटिमेंट को भड़काया है। बांग्लादेश में चुनाव भी हो रहे हैं, वहां का कोई भी राजनीतिक दल भागवत के बयान को तूल दे सकता है।

स्थानीय प्रतिरोध को उत्तेजित करना

बयान में 'लड़ने' (fight) शब्द का इस्तेमाल प्रतिरोध को प्रोत्साहित कर सकता है। अगर बांग्लादेशी हिंदू इससे प्रेरित होकर विरोध प्रदर्शन या संगठित हो जाते हैं, तो यह बहुसंख्यक समुदाय या सरकार के साथ टकराव को बढ़ा सकता है। अंतरिम सरकार (मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में) पहले से ही स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रही है, और ऐसे कोई बाहरी 'समर्थन' की बात इसे जटिल बना सकती है। मानवाधिकार रिपोर्ट्स (जैसे Amnesty International या HRW) बताती हैं कि अल्पसंख्यक विरोध अक्सर ऐसे बयानों की वजह से शिकार होते हैं।

भागवत की धमकी का कूटनीतिक प्रभाव 

भारत-बांग्लादेश संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं, खासकर हसीना के निर्वासन के बाद। भागवत का बयान आरएसएस का है, लेकिन इसे भारत सरकार से जोड़कर देखा जा सकता है (क्योंकि आरएसएस भाजपा का वैचारिक आधार है)। इससे भारत की अल्पसंख्यक सुरक्षा के लिए कूटनीतिक प्रयास कमजोर हो सकते हैं, और बांग्लादेश सरकार हिंदुओं की सुरक्षा पर कम ध्यान दे सकती है। अगर इससे भारत में सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है, तो इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव बांग्लादेश पर भी पड़ सकता है, जैसे सीमा पर तनाव।

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घरेलू ध्रुवीकरण का अप्रत्यक्ष प्रभाव

भारत में यह बयान मुस्लिम-विरोधी भावनाओं को भड़का सकता है, जो बदले में बांग्लादेश में हिंदुओं को 'भारतीय हिंदुत्व का हिस्सा' बताकर निशाना बनाने का बहाना दे सकता है। सोशल मीडिया पर ऐसी बातें वायरल होकर सीमा पार प्रभाव डालती हैं। तमाम भड़काऊ वीडियो वायरल होने के बाद हिंसा भड़की है। भारत में बांग्लादेशियों के खिलाफ पहले से ही अभियान चल रहा है। असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों की समस्या को भाजपा पहले से ही चुनावी मुद्दा बनाए बैठी है। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर असम के मुख्यममंत्री हिमंता बिस्वा सरमा उन्हें घुसपैठिया बता रहे हैं। सरमा के कई भड़काने वाले बयान आ चुके हैं, जो मुस्लिमों पर केंद्रित हैं।