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जातीय जनगणना पर संघ का विरोध, नीतीश अड़े, बदलेगी बिहार की राजनीति?

जातीय जनगणना की मांग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बिहार के 10 दलों के नेताओं ने पिछले साल मुलाकात की थी और इस मुलाकात के 9 महीने पूरे हो चुके हैं। पूरे देश की सियासत को प्रभावित करने जा रहा यह मुद्दा सबसे पहले बिहार की सियासत की दशा और दिशा बदलने जा रहा है। खुद जातीय जनगणना की मांग का क्या होगा, इस पर शायद ही कोई बेचैन हो। मगर, इस मांग के बहाने जो बेचैनी सियासत में दिख रही है उससे बिहार की राजनीति करवट बदलती नज़र आ रही है। 

27 मई की तारीख तय कर दी गयी है कि इस दिन जातीय जनगणना पर विचार के लिए सर्वदलीय बैठक होगी। मगर, इस घोषणा के साथ यह भी चस्पां कर दिया गया है कि इसके लिए सभी दलों की सहमति का इंतज़ार है। राजनीति में इसका मतलब यही होता है कि 27 मई को शायद ही यह बैठक हो। इस मुद्दे पर बीजेपी ही इकलौती पार्टी है जिसे निर्णय लेने में दिक्कत हो रही है और उसके नेता अलग-अलग बयान दे रहे हैं। जाहिर है कि नीतीश कुमार ने जातीय जनगणना पर बैठक आहूत कर इस मुद्दे पर सियासी गर्मी बढ़ा दी है।

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जातीय जनगणना का सीधे फैसला ही क्यों नहीं कर लेते नीतीश?

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सीधे जातीय जनगणना कराने का फैसला क्यों नहीं कर लेते? इस बारे में नीतीश के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में ही 27 फरवरी 2020 को विधानसभा से प्रस्ताव पारित किया जा चुका है। बीजेपी और आरजेडी भी इस प्रस्ताव के समर्थन में रहे थे। अब तक दो बार विधानसभा से जातीय जनगणना का प्रस्ताव पारित हो चुका है। 
नीतीश कुमार की मंशा जातीय जनगणना कराने से ज्यादा इस विषय पर बीजेपी को बेचैन करना है। इस नाम पर बिहार में नये राजनीतिक समीकरण को आधार देना उनका मकसद है। जातीय जनगणना को तेजस्वी से करीबी का सैद्धांतिक आधार बना रहे हैं नीतीश। सर्वदलीय बैठक का शिगूफा भी इसीलिए है।

राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी एक ऐसी पार्टी के रूप में सामने है जिसके पास सबसे ज्यादा ओबीसी के वोट बैंक हैं लेकिन बिहार में यह स्थिति नहीं है। यहां ओबीसी वोट बैंक को अपने साथ करने के लिए बीजेपी लगातार पसीने बहाती रही है। गैर यादव वोटों को एकजुट करने के लिए वह जेडीयू व छोटे-छोटे दलों से गठबंधन करती रही है। नीतीश कुमार ने यादव समेत ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने की सियासी चाल चलने का खौफ बीजेपी को दिखाया है। वे लगातार तेजस्वी परिवार से नजदीकी बढ़ा रहे हैं। 
बिहार में अमरेंद्र प्रताप सिंह और सुशील मोदी जैसे नेता इस मुद्दे पर परस्पर विरोधी राय रख रहे हैं। मगर, राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी जातीय जनगणना के पक्ष या विपक्ष में रुख रखने के बजाए इसे प्रादेशिक स्तर पर तय किया जाने वाला मुद्दा बता रही है। आरएसएस का खुले तौर पर मानना रहा है कि जातीय जनगणना नहीं होनी चाहिए। मगर, बीजेपी जरूरत के हिसाब से रुख अपनाती रही है।मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण के साथ पंचायत चुनाव कराने का फैसला शिवराज सरकार ने लिया है। यहां बीजेपी वही सियासत कर रही है जो नीतीश बिहार में कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का श्रेय लेने में जुटी है। 

ओबीसी आबादी बिहार में दूसरे नंबर पर

एनएसओ ने कृषि पर निर्भर परिवार और ज़मीन पर मालिकाना हक रखने वालों का एक सर्वे 2019 में किया था। इससे पता चलता है कि बिहार देश में दूसरा ऐसा राज्य है जहां ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा है। यहां 58.1 प्रतिशत ओबीसी आबादी है। इस मामले में तमिलनाडु पहले नंबर पर है।ओबीसी का यही वोट बैंक है जिसे नीतीश-तेजस्वी मिलकर साधने की योजना बना रहे हैं। ओबीसी की सियासी चाल ही नीतीश कुमार को एनडीए गठबंधन में बीजेपी के दबाव से निकाल सकती है और एनडीए के समांतर सियासत को खड़ा करने में मदद कर सकती है।
बीजेपी का मकसद जातीय जनगणना पर होने वाली सियासत को अपने विरुद्ध होने से रोकना है। ऐसे में जातीय जनगणना का विरोध करना बीजेपी का औपचारिक निर्णय नहीं हो सकता। वह हर हाल में कम से कम बिहार में जातीय जनगणना कराए जाने के पक्ष में दिखना चाहेगी। लेकिन, चूंकि इस पहल के पीछे की मंशा उसे पता है इसलिए वह सतर्क भी है।
नीतीश के सर्वदलीय बैठक का विरोध बीजेपी कतई नहीं करेगी। हालांकि इसमें शामिल नहीं होने के वे दूसरे कारण जरूर ढूंढ़ निकालेगी। बीजेपी के लिए आवश्यक यही है कि वह नीतीश कुमार को इस मुद्दे पर ठीक उसी तरह खामोश रखे, जिस तरह से अब तक रखती आयी है। मगर, नीतीश इस बार सिर्फ दबाव की राजनीति करते नहीं दिख रहे हैं। वे एनडीए में बेचैन रहने और एनडीए से बाहर निकलकर बीजेपी को चुनौती देने का संकेत दे रहे हैं।

बिहार में केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता और बढ़ेगी

बिहार की सियासत में जैसे-जैसे नीतीश के कदम एनडीए में बागी होने लगे हैं लालू परिवार पर केंद्रीय एजेंसियां भी सख्त होती दिख रही है। आने वाले समय में केंद्रीय एजेंसियां और अधिक सक्रिय नज़र आएंगी। ऐसा बिहार ही नहीं, देश की सियासत में धड़ल्ले से होने लगा है। चूकि नीतीश कुमार स्वच्छ छवि के रहे हैं और उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं ठहरता, इस वजह से स्वयं नीतीश पर केंद्रीय एजेंसियों का कोई ख़ौफ़ कभी रहा नहीं। मगर, लालू परिवार पर हमला कर नीतीश पर दबाव डालने की रणनीति और तेज हो सकती है जिनके बीच भविष्य में सियासी गलबहियां होने के आसार दिख रहे हैं।
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यह स्मरण कराना जरूरी है कि महागठबंधन सरकार को भंग करने का फैसला नीतीश कुमार ने तब लिया था जब लालू परिवार पर केंद्रीय एजेंसियां छापेमारी कर रही थी। फिर रातों रात 26 जुलाई 2017 को पाला बदलकर बीजेपी के साथ उन्होंने 27 जुलाई 2017 को एनडीए सरकार का गठन कर लिया था। ऐसे में समान तरह की परिस्थिति पैदा कर बीजेपी नीतीश कुमार पर दबाव बना रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘सुशासन बाबू’ की सियासत पर हमला करने की यह रणनीति है। मगर, क्या इन कदमों से नीतीश को रोका जा सकता है?

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