सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि हमने 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट' की वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया है और बंगाल मामले में इसे केवल एक अंतरिम उपाय के तौर पर अनुमति दी थी। बिहार SIR मामले में इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया था।
बंगाल मतदाता सूची से नाम काटे जाने पर विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि SIR में इस्तेमाल की जा रही ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ श्रेणी की वैधता पर अभी कोई अंतिम फ़ैसला नहीं दिया गया है। अदालत ने पश्चिम बंगाल के मामले में इसे सिर्फ एक अस्थायी यानी अंतरिम व्यवस्था के रूप में अनुमति दी थी। बिहार SIR मामले में इस मुद्दे पर कोई फैसला नहीं लिया गया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली में चल रहे SIR से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। चुनाव आयोग के वकील ने तर्क दिया था कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया के हर कदम की जांच की है और उसे सही ठहराया है। उन्होंने बिहार का जिक्र करते हुए कहा कि अदालत शुरू से ही इस मामले पर नजर रखे हुए है। इस पर जस्टिस बागची ने साफ कहा, 'बिहार SIR हर सवाल का अंतिम फैसला नहीं है। बिहार में चुनाव आयोग ने शुरू में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी को श्रेणी के रूप में इस्तेमाल नहीं किया था। हमने पश्चिम बंगाल में इसे अंतरिम व्यवस्था के तौर पर अनुमति दी थी। हमने लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की वैधता पर अंतिम रूप से कोई फैसला नहीं दिया है।'
जस्टिस बागची ने आगे कहा कि संवेदनशील मामलों में अदालत की मौखिक टिप्पणियों को अक्सर संदर्भ से बाहर उद्धृत किया जाता है, इसलिए वे और ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहते। उन्होंने जोर दिया कि ये टिप्पणियां अंतिम नहीं हैं।
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी क्या है?
लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का मतलब है मतदाता रिकॉर्ड में ऐसी गलतियां या असंगतियां, जैसे माता-पिता और बच्चे की उम्र में बहुत कम या बहुत ज्यादा अंतर, नाम में गलती, या एक व्यक्ति से जुड़े बहुत ज्यादा बच्चों का रिकॉर्ड। चुनाव आयोग इन मामलों को आगे जांच के लिए चिन्हित करता है। पश्चिम बंगाल में करोड़ों मतदाताओं के नाम इस श्रेणी में आए थे। अदालत ने पहले बंगाल में इन नामों को सार्वजनिक करने के निर्देश दिए थे, लेकिन आज साफ किया कि इसकी कानूनी वैधता अभी तय नहीं हुई है।
दिल्ली SIR पर भी अदालत की सख्ती
अदालत आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अन्य याचिकाकर्ताओं की अर्जी पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली के ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर किए गए मतदाताओं के नाम वापस शामिल करने के तरीके पर सवाल उठाया था।
याचिका में बताया गया कि SIR से पहले दिल्ली में कुल मतदाताओं का करीब 32.78 प्रतिशत यानी लगभग 47.56 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिए गए। इनमें से करीब 31.59 लाख को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ बताया गया।
इन मतदाताओं को अपना नाम वापस शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 भरना पड़ रहा है, जबकि फॉर्म-6 नए मतदाताओं के लिए है। इसमें यह घोषणा करनी होती है कि व्यक्ति पहली बार नामांकन कर रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पहले से नामांकित मतदाताओं के लिए यह गलत बयानी का खतरा पैदा करता है, क्योंकि गलत घोषणा पर एक साल तक की सजा या जुर्माना हो सकता है।
अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि 2026 की सूची में पहले से मौजूद मतदाताओं को फॉर्म-6 क्यों भरना पड़ रहा है। अदालत ने कहा कि जो लोग सिर्फ घर बदलकर गए हैं, उन्हें फॉर्म-8 का इस्तेमाल करने की अनुमति दी जानी चाहिए। थोड़े समय के लिए काम पर जाना ‘स्थायी स्थानांतरण’ नहीं माना जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि दिल्ली में अभी कोई चुनाव नहीं होने वाला है, इसलिए जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है। दिल्ली में मजदूरों, ठेले वालों और दैनिक मजदूरी करने वालों की बड़ी संख्या है। आयोग को खुद इन तक पहुंचना चाहिए, न कि सिर्फ इन पर जिम्मेदारी डालनी चाहिए।
चुनाव आयोग को निर्देश
अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि बाहर किए गए नामों की सूची हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में आसानी से उपलब्ध कराई जाए। इसमें साफ बताया जाए कि जवाब न देने के क्या परिणाम हो सकते हैं। आयोग ने कहा कि वह देर से आए फॉर्म स्वीकार करने पर विचार करेगा और जरूरत पड़ने पर 30 अक्टूबर की समय-सीमा बढ़ा सकता है।
SIR विवाद में पारदर्शिता, मताधिकार का सवाल
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में दो अलग लेकिन आपस में जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। पहला मुद्दा पश्चिम बंगाल में इस्तेमाल की गई ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ व्यवस्था की कानूनी वैधता का है। अदालत ने साफ़ कर दिया है कि इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया गया है। दूसरा मुद्दा दिल्ली में उन मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया का है, जो पहले से मतदाता सूची में थे लेकिन ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए। अदालत ने सवाल उठाया है कि ऐसे लोगों को पहली बार पंजीकरण कराने वाला फॉर्म क्यों भरना चाहिए और क्या उन्हें नाम बहाल कराने के लिए अधिक उपयुक्त तथा सरल प्रक्रिया उपलब्ध होनी चाहिए।
सुनवाई से यह साफ़ है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान केवल रिकॉर्ड की जांच ही नहीं, बल्कि प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाताओं को सुनवाई का अवसर और उनके मतदान के अधिकार की रक्षा भी अहम मुद्दे हैं।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की ताज़ा टिप्पणी से साफ़ हो गया है कि SIR प्रक्रिया में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का इस्तेमाल अभी अंतिम रूप से सही नहीं ठहराया गया है। यह मुद्दा आगे भी अदालत में चर्चा का विषय बना रह सकता है।