दिल्ली की मतदाता सूची के SIR में क़रीब 33 लाख वोटरों को भेजे गए नोटिसों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग से कड़ा सवाल पूछा। कोर्ट ने कहा कि ये नोटिस मशीन से जारी किए गए लगते हैं और ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति का आधार साफ़ नहीं है। ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ में वैसे मामले आते हैं जिसमें माता-पिता और बच्चे की उम्र का अंतर 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा हो, एक ही पिता के नाम पर 6 या उससे ज्यादा लोग दर्ज हों, भाई-बहन की उम्र में 9 महीने से कम का अंतर हो, पुरानी और नई लिस्ट में माता-पिता के नाम या स्पेलिंग में अंतर हो।

दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में जारी किए गए नोटिस के मामले में दायर की गई याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सुनवाई की। याचिका अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने दाखिल की है। इसमें आरोप है कि चुनाव आयोग और दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिन वोटरों को नोटिस भेजे, उनके नाम और कारणों का पर्याप्त खुलासा नहीं किया। इसके साथ ही ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ की श्रेणी में डालने के मानदंड, परिभाषा और दिशानिर्देश भी नहीं बताए गए।
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'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी को और स्पष्ट करें'

शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि प्रक्रिया चौंकाने वाले तरीक़े से चल रही है। 33 लाख से ज़्यादा वोटरों को बेहद कमजोर आधार पर नोटिस भेजे गए हैं। प्रशांत भूषण से सहमति जताते हुए जस्टिस बागची ने कहा, 'लगभग मशीनी तरीक़े से नोटिस जारी हो रहे हैं। संभावना है कि ये मशीन से जनरेटेड नोटिस हों...'। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से कहा, "आपको ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ को थोड़ा और स्पष्ट करना होगा।”

ECI का जवाब और कोर्ट के सवाल

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दमा शेषाद्री नायडू ने बताया कि काम का बोझ संभालने के लिए कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई है। नोटिसों में कारण दिए गए हैं। इस बीच कोर्ट ने पूछा कि 30-33 लाख नोटिस भेजे गए हैं तो इतने बड़े काम के लिए कितने बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO लगाए गए हैं?

नायडू ने बताया कि क़रीब 14000 BLO और 1200 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ERO तैनात किए गए हैं। 29 अक्टूबर की समय सीमा है। अगर प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हुई तो चुनाव आयोग समय बढ़ाने पर विचार कर सकता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि 'एक भी वोटर का नाम नहीं काटा जाएगा'।

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि 14000 BLO होने से वोटरों को नोटिस का जवाब देने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने पूछा कि नोटिस में पूछे गए सवालों का जवाब देने के लिए वोटर को कितनी जानकारी देनी होगी। नायडू ने जवाब दिया कि नोटिस में बताए गए 12 दस्तावेज अंतिम नहीं हैं।

कैसी-कैसी दिक्कतें आएंगी?

नोटिस के जवाब देने में कई तरह की दिक्कतें आने की बात भी रखी गई। प्रशांत भूषण ने मिसाल दी कि कुछ नोटिस में लिखा है कि वोटर और उसके माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर है। उन्होंने सवाल किया कि वोटर इसे कैसे साबित करे, क्योंकि चुनाव आयोग के बताए 12 दस्तावेजों में माता-पिता की जानकारी नहीं होती। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पहले ही एन्युमरेशन फॉर्म भर चुका है और उम्र व निवास का सबूत दे चुका है तो फिर और दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि दिल्ली में ऊंची इमारतें हैं। क्या BLO हर घर जाएंगे? उन्होंने यह भी बताया कि कुछ नोटिस में सिर्फ इतना लिखा है कि अधिकारी से मिलें, लेकिन जगह का जिक्र नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली की स्थिति को खास बताया। उन्होंने कहा कि यहां बड़ी संख्या में मूल निवासी दिल्ली वाले हैं, लेकिन बहुत से लोग दूसरे शहरों से आकर रहते हैं। ऐसे में यह तय करना ज़रूरी है कि कोई दो जगह वोट न डाले।

कोर्ट ने की पश्चिम बंगाल SIR से तुलना

जस्टिस बागची ने कहा कि दिल्ली का काम पश्चिम बंगाल से आसान है। मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि अधिकारियों को थोड़ी ओरिएंटेशन की ज़रूरत है ताकि वोटरों में विश्वास पैदा हो। 15-20 तरह के सवाल-आपत्तियां हो सकती हैं। उनके मानक जवाब तैयार कर सभी को भेजे जा सकते हैं। जहां मोबाइल नंबर हैं, वहाँ बता दिया जाए कि इतनी जानकारी काफी है।
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चुनाव आयोग ने बताया कि शिविर और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाए गए हैं। वार्ड ऑफिस पर भी BLO उपलब्ध कराए गए हैं।

कोर्ट ने बिहार और पश्चिम बंगाल के SIR मामलों में दिए गए अंतरिम आदेशों का हवाला दिया। उनमें बाहर किए गए लोगों के नाम और कारण प्रकाशित करने का निर्देश था। दिल्ली में भी उन्हीं दिशा-निर्देशों का पालन करने को कहा गया। कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया और अधिकारियों से पहला स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा, जिसमें उठाए गए कदमों का जिक्र हो।

यह पूरा मामला दिल्ली की मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया से जुड़ा है। कोर्ट ने साफ़ संकेत दिया है कि बड़े पैमाने पर नोटिस भेजने की प्रक्रिया पारदर्शी और वोटर-हितैषी होनी चाहिए।